आत्महत्या करते नाबालिग
क्या आपके बच्चे 10 से 15 साल की आयु के हैं? क्या वे अक्सर उदास रहते हैं? क्या वे गुस्से में अपनी जान लेने की धमकी देते हैं? क्या वे इस कम उम्र में ग़म के गाने ज़्यादा सुनते हैं? अगर हाँ, तो आपको उनकी तरफ ज़्यादा ध्यान देना पड़ेगा.
भारत में नाबालिग बच्चों द्वारा आत्महत्या करने के मामलों की तादाद बढ़ती जा रही है. हाल में आई एक रिपोर्ट के अनुसार अमरीका की तरह भारत में भी 10 से 15 साल के लड़के और लड़कियों द्वारा आत्महत्या के मामलों में 2004 से 75 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई है.
इसका उदाहरण हमें मुंबई में नए वर्ष के पहले सप्ताह में देखने को मिला. नए वर्ष के पहले कुछ दिनों में दो आत्महत्याओं की ख़बर ने मुंबई शहर के लोगों को झकझोर कर रख दिया है.
आत्महत्याओं की ख़बरें यूँ भी हमें उदास कर देती हैं लेकिन नाबालिग बच्चों द्वारा की गई आत्महत्याओं की ख़बरें हमें बड़ा झटका देती हैं.
नया साल शुरू होने के दुसरे दिन यह खबर आई कि 11वर्षीय नेहा सावंत ने अपने ही दुपट्टे से लटककर आत्महत्या कर ली. नेहा ने टीवी प्रोग्राम बूगी-वूगी में एक साल पहले भाग लिया था.
ख़बरों के अनुसार वो डांस के अन्य प्रोग्रामों में भाग लेना चाहती थी लेकिन घरवालों ने मना कर दिया और पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा था. उसके माता-पिता इस बात से इनकार करते हैं कि उनकी 11वर्षीय बेटी पर किसी तरह का दबाव था.
इस ख़बर के झटके से शहर संभल भी नहीं सका था कि 12 वर्ष के सुशंत पाटिल द्वारा दादर में अपने स्कूल में ही आत्महत्या की ख़बर ने सनसनी फैला दी. वो छह में से चार विषयों में फ़ेल हो गया था. सवाल यह है कि इन दो नाबालिग बच्चों को अपनी जान लेने पर किस चीज़ ने मजबूर किया..?
आमतौर पर इस उम्र के बच्चों में जीने की उमंग होती है और वो मौत से घबराते हैं. यह दो आत्महत्याएं मुंबई में चर्चा का विषय हैं.
कोई कहता है सिस्टम की ग़लती है तो कोई माँ बाप को ज़िम्मेदार मानता है और कुछ लोगों के अनुसार आजकल के बच्चे छोटी-छोटी नाकामयाबियों के कारण उदास हो जाते हैं और डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं.
एक दो नाबलिग बच्चों की माँ ने मुझसे कहा कि उसके हिसाब से मुंबई में जगह की कमी है जिसके कारण बच्चे स्कूल के बाद खेलने घर से बाहर नहीं जा पाते और घरों में रहकर बोर हो जाते हैं. एक अन्य माँ ने कहा कि परिवार वाले इसके ज़िम्मेदार हैं क्योंकि वे बच्चों पर 90 प्रतिशत अंक हासिल करने के लिए भरपूर दबाव डालते हैं.
कारण जो भी हो, इन दो नाबालिग बच्चों द्वारा आत्महत्या हमारे लिए खतरे की घंटी की तरह है. मेरी भी एक कम उम्र की बेटी है. अब मैं ख़ुद से यह सवाल करने लगा हूँ कि कहीं बच्चों की परवरिश में हम से या समाज से चूक तो नहीं हो रही है.

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देखिए ज़ुबैर साहब, आपके विश्लेषण से मैं व्यक्तिगत तौर पर इत्तेफाक तो रख सकता हूँ, लेकिन इस ब्लॉग में बच्चों द्वारा खुदकुशी की अधूरी तस्वीर पेश की गई है. यदि अब से क़रीब 15 साल पहले की पीढ़ी को देखें तो मैंने कभी नहीं सुना कि कोई अभिभावक बच्चों की काउंसिलिंग के लिए मनोवैज्ञानिक के पास जा रहे हों, लेकिन अब शहरों में यह आम बात है. बच्चों को दादा या बुज़ुर्ग अक्सर मार्निग वाक पर ले जाते थे, दौड़ाते थे, अब अच्छा पढने वाले बच्चे को भी ट्यूशन या कोचिंग पर इसलिए भेजते है ताकि कम्पीट कर सकें. इसलिए भी ताकि घर पर अभिभावक कुछ वक़्त शोरगुल के बिना गुज़ारने को मिले.
दरअसल चाहे परीक्षाओं में फ़ेल होने के चलते बच्चों में ख़ुदकुशी के मामले बढे हों या किसी और दबाव के चलते आप भी मानेंगे कि ये छात्र शहरी या मेट्रोपोलिटन इलाक़ो के होते हैं. यहाँ बच्चों पर भले ही कोई दबाव न हो लेकिन न्यूक्लियर परिवार के अभिभावक अपनी-अपनी नौकरी में लग जाते हैं. वे अपनी ज़रूरतें इतनी बढ़ा लेते हैं कि बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते हैं. बच्चों को जो कुछ भी मिलता है स्कूल या समाज ही दे पाता है. बस यहीं से शुरू होता है कुंठा का दौर. सच्चाई यह है कि आज भी गाँवों में आज़ादी है, बच्चों और अभिभावक के बीच बातचीत होती है. इसलिए ज़रुरत है लाइफ़ स्टाइल बदलने की. अगर माता-पिता दोनों ही कामकाजी हो गए हैं और परिवार न्यूक्लियर है तो शहरी परिवारों को अपना पुराना रवैया भी बदलना होगा.
आज के बच्चे कल के भविष्य हैं. अभिभावकों को अपने बच्चे की मानसिकता को पढ़ना चाहिए. उन्हें करिअर की अंधी दौड़ में शामिल होने से रोकना चाहिए.
आपका चिंतन जायजा है, 'थ्री इडियट्स' में भी कुछ ऐसा ही दिखाया गया है. सच में बहुत बुरी ख़बरें होती है. कुछ दिन पहले मैंने एक खबर पढ़ी थी कि बलात्कार कर पाने में असफल लड़कों ने नाबालिग लड़की को ज़िंदा जलाया.
मूलतः यह हमारे पारिवारिक और सामाजिक परिवेश के सिकुड़ते हुए दायरों का परिणाम है. पिछले साल मुझे एक पारिवारिक मरीज के साथ न्यूरोसकियाट्रिस्ट के पास जाने का मौक़ा मिला. बातों ही बातों में डॉक्टर ने बताया कि कुछ दिन पहले दुनिया भर के साकियाट्रिस्ट डॉक्टरों के सम्मलेन में यह बात उभर कर आई कि दुनिया में 99 फ़ीसदी लोग अवसाद और चिंता से पीड़ित हैं. बाकी के एक फ़ीसदी लोग झूठ बोलते हैं कि उन्हें अवसाद और चिंता नहीं है. कारण पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों में गिरावट और अत्यंत महत्वाकांक्षाओं का बोझ लादकर जीवनयापन करना है. एक कक्षा में हर विद्यार्थी प्रथम नहीं आ सकता और अभिभावकों को अपनी इच्छाएँ बच्चों पर नहीं थोपनी चाहिए. अपना अनुभव है कि आज कल अभिभावक-शिक्षक मीटिंग भी लगभग शिकायत दिवस बनकर रह गई है. मेरा बच्चा जब प्रथम कक्षा में था तो उसकी ही कक्षा का एक विद्यार्थी पढ़ाई में थोड़ा कमज़ोर था और अभिभावक-शिक्षक मीटिंग में टीचर ने उस समय मौजूद उस बच्चे के पिता से शिकायत की कि यह पढ़ने में कमज़ोर है. बच्चे के पिता ने बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों के सामने ही बच्चे की बुरी तरह पिटाई कर दी. हमें समझना चाहिए कि हर छोटे-बड़े इंसान का अपना आत्मसम्मान होता है. इसको ठेस पहुँचना अक्सर घातक सिद्ध होता आया है. मेरे विचार से इस समस्या के समाधान हेतु पारिवारिक जवाबदेही सर्वप्रथम बनती है. अब यह निर्भर करता है हम पारिवारिक और सामाजिक अभिभावकों पर कि हम क्या चाहते हैं?
ज़ुबैर साहब, आपने ब्लॉग तो शानदार लिखा है लेकिन इन सब के लिए सिर्फ़ माँ-बाप को दोषी मान बैठना ठीक नहीं है. अगर कोई भी बच्चा बिना माँ-बाप के दिशानिर्देश के किसी भी काम को करता है तो मेरे ख़्याल में वह बच्चा ग़लत है और मैं स्वयं भी इस बीमारी से पीड़ित हूँ. लेकिन इलाज नहीं है मेरे पास इस बीमारी का. दरअसल आज कल के बच्चों की हाईफ़ाई ज़िंदगी हो गई है.
इस तरह की घटनाएँ वास्तव में बहुत परेशान करने वाली हैं. हमें इसका कारण ढूढ़ना होगा. मुझे लगता है कि यह अभिभावकों की महत्वाकांक्षी होने का नतीज़ा है. वे केवल बच्चों के नंबर लाने के बारे में ही सोचते रहते हैं. जब बच्चा अभिभावकों की महत्वाकांक्षा पूरी नहीं कर पाता है तो यह उसके लिए शर्मिंदगी की बात होती है. यह उन्हें इस तरह के क़दम उठाने के लिए प्रेरित करता है. यह लगातार होता रहता है, बाद में यह सामान्य बात बन जाएगी.
देखिए जुबैर साहब, आपने जिस मुद्दे को बीबीसी के ब्लॉग पर लिखा वह इतना छोटा नहीं है जितने में आपने समेट दिया. मै एक पत्रकारिता का छात्र, जिसने इसी साल सीबीएसई बोर्ड की 12वीं की परीक्षा विज्ञान विषय से दिया था और भौतिकी में फ़ेल हो गया था लेकिन पूरक परीक्षा देकर मै एक महीने बाद ही पास हो गया बहुत ज्यादा ही इन विषयों पर सोचता हूँ. किसी ने प्रतिक्रिया में लिखा की आज के बच्चे हाई फ़ाई सोचते है, वह बच्चों की ग़लती है, इसका क्या जवाब हो सकता है बच्चे क्यों वैसा सोचते है? देखिए इसमें माँ-बाप की ही सिर्फ़ ग़लती नहीं है? क्योंकि माँ-बाप भी वही करते हैं जो समाज में होता है? समाज में वैसा इसलिए होता है क्योंकि हम नक़ल करते है किसी और समाज का जो हमसे भिन्न है हम उसकी अच्छाई को तो कम पर उसकी बुराइओ की ज्यादा नक़ल कर लेते है, लेकिन इसे ठीक करने के लिए तो माता-पिता को ही सही से काम करना होगा. आज के माँ-बाप कहते हैं, तुम्हे और कोई काम नहीं है सिर्फ़ पढ़ना है, हम जब पढ़ते थे तो इतनी सुविधा बिलकुल नहीं थी जब हम तुम्हे सारी सुविधा दे रहे हैं तो अच्छे नंबर क्यों नहीं लाओगे मतलब 99 फ़ीसदी. दूसरी बात है बहुत ज्यादा उम्मीद लगा बैठते है जो किसी भी नजरिए से जायज नहीं होता. मुझे और कुछ नहीं कहना है अब. मै तो आपसे बस इतना ही पूछना चाहता हूँ की मीडिया क्या कर रही है? जैसा उसे करना चाहिए वैसा क्यों नहीं कर रही है, इस मुद्दे पर? क्या इसलिए क्योंकि बच्चे कल के भविष्य नहीं है या उन्हें मत देने का अधिकार नहीं है लोकतंत्र में इसलिए ? या क्या आप मानते हैं कि मीडिया ठीक काम कर रही है? इस मुद्दे को लेकर. माफ़ कीजिएगा आपने तो ब्लॉग लिखा जो कहीं से भी आपके रिपोर्टिंग आगे नहीं जाती दीखती.
सच में यह बहुत ग़लत और दुर्भाग्यपूर्ण है. आज ज़रूरत इस बात की है कि सभी अभिभावक अपने बच्चों के साथ सप्ताह में कम से कम एक बार दोस्तों की तरह बातचीत करें. हम 'हम तारे ज़मीन पर' और ' 3 इडियट्स ' जैसी फ़िल्मों पर तो काफ़ी समय खर्च करते हैं लेकिन अपने बारे में सोचने के लिए थोड़ा भी समय नहीं देते हैं. मेरी सभी अभिभावकों से गुज़ारिश है कि वे अपने बच्चों के अंर्तमन में झांकने की कोशिश करें, उनकी पसंद-नापसंद जानने की कोशिश करें और उनसे अपने अनुभव साझा करें.
आपके ब्लॉग लिखने से या कुछ लोगों की राय देने से, हल नहीं निकलने वाला है. ये एक गंभीर मसला बनता जा रहा है. ऐसे में इसपर गंभीरता से सोचने की अत्यंत आवश्यकता है. बात छोटी नहीं है बल्कि गंभीर है. इससे ये बात स्पष्ट है कि बच्चों की देखभाल एक अहम मुद्दा है. परिवारिक मूल्य भी इससे जुडा हुआ है उसपर नज़र डालने की ज़रूरत है तब ही मसले का हल निकल सकता है.
यह अत्यंत दुखद घटना है. इसे ख़तरे की घंटी की तरह लेना चाहिए. महानगरों में बड़े तो बड़े बच्चे भी बहुत तनाव में रहते हैं. प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गई है कि लोग फ़ेल होने पर सहन नहीं कर पाते हैं. हमारे समय में बुरा नंबर आने से घर में पिटाई भी होती थी लेकिन फिर भी हालात इतने ख़राब नहीं थे, आज तो बच्चों को ख़राब नंबर पर कुछ बोलना भी मुश्किल हो गया है. बच्चों को परोत्साहित करने की ज़रूरत है. कच्चे मन जल्दी हार मान जाते हैं.