महिला वोटरों की तादाद बढ़ी लेकिन संसद में कहां तक पहुंची है भागीदारी?

    • Author, संजय कुमार
    • पदनाम, प्रोफ़ेसर और राजनीतिक विश्लेषक
    • Author, विभा अत्री
    • पदनाम, लोकनीति-सीएसडीएस के साथ काम कर रहीं शोधकर्ता
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर यह समझना ज़रूरी है कि भारत की महिलाएं राजनीति में बतौर हिस्सेदार कहां तक पहुंची हैं और उनकी भागीदारी के सामने आज भी कौन-सी बाधाएं हैं.

पिछले छह दशकों में महिलाओं का चुनावी राजनीति से रिश्ता काफ़ी बदला है. आज महिलाएं लगभग पुरुषों जितनी संख्या में वोट डालती हैं, और कई राज्यों में तो उनसे भी ज़्यादा.

लेकिन भागीदारी में यह ज़बरदस्त बढ़ोतरी प्रतिनिधित्व या राजनीतिक ताक़तवर में उसी अनुपात में नहीं बदल पाई है.

भारत का अनुभव एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाता है. वोट देने में बराबरी है, लेकिन राजनीतिक ढांचे में बराबरी अब भी नहीं है.

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हाशिए से बराबरी तक- कहां हैं महिला वोटर

आज़ादी के बाद के दशकों में चुनावों में हिस्सा लेने को लेकर महिलाओं और पुरुषों के बीच साफ़ अंतर दिखता था.

औपचारिक तौर पर महिलाएं चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा तो थीं, लेकिन वोट डालने वाली महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में काफ़ी कम रहती थी.

1967 के लोकसभा चुनाव में पुरुषों का मतदान प्रतिशत 66.7 था, जबकि महिलाओं का सिर्फ़ 55.5 प्रतिशत, यानी 11.2 प्रतिशत का फ़र्क. 1970 के दशक में भी यह अंतर जारी रहा.1971 में तो यह थोड़ा बढ़कर 11.8 प्रतिशत हो गया.

इसके पीछे कई वजहें थीं, महिलाओं में कम साक्षरता, बाहर आने-जाने पर सामाजिक रोक, घरेलू ज़िम्मेदारियां और राजनीतिक दलों की ओर से महिलाओं तक कम पहुंच.

1980 के दशक से यह फ़र्क लगातार कम होने लगा. 2009 में यह घटकर 4.4 प्रतिशत रह गया.

सबसे बड़ा बदलाव पिछले दस साल में देखने को मिला. 2014 में यह अंतर सिर्फ़ 1.5 प्रतिशत रह गया, और 2019 और 2024 दोनों में महिलाओं ने लगभग पुरुषों जितनी ही संख्या में वोट डाले.

इसी तरह का रुझान 1990 से 2025 के बीच विधानसभा चुनावों में भी दिखाई देता है.

1990 के शुरुआती सालों में महिलाओं का मतदान औसतन पुरुषों से 4-5 प्रतिशत कम था.

यह अंतर 2000 के दशक में लगातार घटता गया, 2005-07 के चुनावों में यह- 1.8 प्रतिशत पर पहुंच गया और 2008-10 में 1 प्रतिशत रह गया.

2011 के बाद हालात पलट गए. महिलाओं ने पुरुषों से थोड़ा ज़्यादा वोट डालना शुरू कर दिया.

2011-13 के बीच महिलाओं का औसत मतदान पुरुषों से 1.13 प्रतिशत ज़्यादा रहा और 2015–16 में यह बढ़कर 2.82 प्रतिशत तक पहुंच गया.

हालांकि बाद के वर्षों में यह अंतर थोड़ा कम हुआ, फिर भी 2020–25 के दौरान महिलाओं का वोट 1.6 प्रतिशत ज़्यादा रहा.

कुल मिलाकर 1990 से 2025 तक के विधानसभा चुनाव साफ़ दिखाते हैं कि पहले तो लैंगिक अंतर लगातार कम हुआ, और फिर महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से थोड़ा आगे निकलकर स्थिर हो गई.

मतदान से आगे: चुनावी भागीदारी

भले ही वोटिंग में महिलाएं लगभग बराबरी पर आ गई हों, लेकिन चुनाव अभियान में भागीदारी को लेकर लैंगिक अंतर अब भी साफ़ दिखता है.

2009 से 2024 के बीच हुए लोकसभा चुनावों में पुरुष लगातार ज़्यादा संख्या में सार्वजनिक राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेते रहे.

महिलाओं की चुनावी गतिविधियों में भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ी है, पर लैंगिक अंतर अब भी स्पष्ट तौर पर मौजूद है.

2009 में केवल चुनावी सभाओं या रैलियों में महिलाओं के शामिल होने का प्रतिशत नौ था, जो हाल के चुनावों में बढ़कर करीब 16 प्रतिशत तक पहुंच गया है लेकिन पुरुषों की भागीदारी आज भी लगभग दोगुनी है.

इसी तरह जुलूसों और घर-घर प्रचार में भी महिलाओं की भागीदारी 5-6 प्रतिशत से बढ़कर 11 प्रतिशत तक पहुंची है. फिर भी पुरुषों की तुलना में काफ़ी कम है.

इन रुझानों से साफ़ है कि महिलाएं सार्वजनिक राजनीतिक गतिविधियों में तो ज़्यादा दिखाई देने लगी हैं, लेकिन अब भी चुनावी अभियानों में उनकी सक्रियता सीमित है.

महिलाओं की सार्वजनिक राजनीतिक भागीदारी को सबसे ज़्यादा सीमित करने वाला कारण है, परिवार की अनुमति की ज़रूरत.

लोकनीति-सीएसडीएस के 2019 के 'महिलाएं और राजनीति' सर्वेक्षण से पता चलता है कि अधिकतर महिलाओं को रैलियों में जाने, उम्मीदवार से मिलने या चुनाव प्रचार करने के लिए परिवार की मंज़ूरी लेनी पड़ती है.

इससे साफ़ होता है कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में दिखने वाला लैंगिक अंतर केवल रुचि या क्षमता की वजह से नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक नियमों से भी गहराई से प्रभावित है.

भागीदारी से प्रतिनिधित्व तक

हालांकि वोट डालने के मामले में महिलाएं आज बराबरी पर पहुंच चुकी हैं, लेकिन संसद में प्रतिनिधित्व की तस्वीर कुछ और ही कहानी बताती है.

1952 में पहली लोकसभा में सिर्फ़ 22 महिलाएं चुनी गई थीं. कई दशकों तक महिलाओं का प्रतिनिधित्व इसी तरह कम रहा. 1977 में तो यह संख्या घटकर 19 ही रह गई.

एक बड़ा बदलाव 21वीं सदी में दिखा. 2009 में 59 महिलाएं सांसद बनीं, 2014 में यह संख्या बढ़कर 62 हो गई, और 2019 में यह ऐतिहासिक रूप से बढ़कर 78 तक पहुंच गई. 2024 में यह थोड़ा घटकर 74 रह गई.

लेकिन अपने सर्वोच्च स्तर पर भी पहुंचकर भी महिलाओं का लोकसभा में हिस्सा लगभग 14 प्रतिशत ही रहा, जबकि मतदाताओं में उनकी हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत है.

नामांकन की रुकावट

महिलाओं के प्रतिनिधित्व की समस्या तब और साफ़ दिखती है जब हम उम्मीदवारी को देखते हैं.

1957 में सिर्फ़ 45 महिलाओं ने लोकसभा चुनाव लड़ा था. 1996 तक यह संख्या बढ़कर 599 हो गई.

हाल के चुनावों में महिलाओं की उम्मीदवारी लगातार बढ़ती रही, 2014 में 668, 2019 में 726 और 2024 में 800 महिलाओं ने चुनाव लड़ा.

लेकिन इन आंकड़ों को संदर्भ में समझना ज़रूरी है, पुरुष उम्मीदवार आज भी हज़ारों की संख्या में होते हैं. इस लिहाज़ से महिलाएं अब भी कुल दावेदारों का बहुत छोटा हिस्सा हैं.

राजनीतिक दल अक्सर कम टिकट देने को यह कहकर सही ठहराते हैं कि महिलाओं के जीतने की 'संभावनाएं' कमज़ोर होती हैं.

लेकिन सफलता का आंकड़ा इस दावे को सवालों के घेरे में डाल देता है. 1957 में 49 प्रतिशत महिला उम्मीदवार जीतीं, जबकि पुरुषों में जीत का प्रतिशत सिर्फ़ 33 प्रतिशत था.

1962 में महिलाओं की सफलता दर 47 प्रतिशत थी जबकि पुरुषों की सिर्फ़ 25 प्रतिशत.

हाल के चुनावों में भी महिलाओं की सफलता दर बराबर या थोड़ा बेहतर ही रही .

2019 में 11 प्रतिशत जीतीं, जबकि पुरुषों में यह दर 6 प्रतिशत थी. 2024 में महिलाओं की सफलता दर 9 प्रतिशत और पुरुषों की 6 प्रतिशत रही.

इन आंकड़ों से साफ़ है कि जब महिलाओं को टिकट मिलता है तो वे चुनाव जीत सकती हैं.

स्वायत्तता और राजनीतिक समाजीकरण

संसद, विधानसभाओं में महिलाओं की कम मौजूदगी सिर्फ़ कम टिकटों या उम्मीदवार बनने के सीमित मौकों की वजह से नहीं है, बल्कि यह उनकी राजनीतिक स्वायत्तता और समाजीकरण से जुड़ी बाधाओं को भी दर्शाती है.

हालांकि महिलाएं अब लगभग पुरुषों जितनी संख्या में वोट डालती हैं, लेकिन उनका निर्णय हमेशा पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होता.

2014 में 51 प्रतिशत महिलाओं ने कहा था कि वे बिना किसी सलाह के वोट डालती हैं, लेकिन 2024 तक यह आंकड़ा थोड़ा घटकर 50 प्रतिशत रह गया.

यह पैटर्न परिवार में राजनीतिक झुकाव को लेकर महिलाओं की सोच में भी दिखता है.

ज़्यादातर महिलाएं (52 प्रतिशत) मानती हैं कि परिवार के राजनीतिक विचारों से मेल रखना ज़रूरी है.

राजनीतिक व्यवस्था के ढांचे में ख़ामियां

परिवार और समाज की रोक-टोक से इतर भी, राजनीतिक संस्थाओं के भीतर महिलाओं को कई तरह की प्रणालीगत रुकावटों का सामना करना पड़ता है.

कई महिलाएं महसूस करती हैं कि राजनीतिक अवसर सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं.

लोकनीति-सीएसडीएस के महिलाओं और राजनीति पर किए गए एक अध्ययन के अनुसार 58 प्रतिशत महिलाओं का मानना है कि राजनीतिक परिवार से आने वाली महिलाओं के लिए राजनीति में प्रवेश आसान होता है.

जबकि 57 प्रतिशत का मानना है कि आर्थिक रूप से मज़बूत परिवारों की महिलाओं को बढ़त मिलती है. लगभग आधी महिलाएं (44 प्रतिशत) मानती हैं कि राजनीतिक दल टिकट देते समय पुरुषों को प्राथमिकता देते हैं.

लगभग इतनी ही महिलाएं यह भी मानती हैं कि मतदाता भी पुरुष उम्मीदवारों को महिलाओं से ज़्यादा तरजीह देते हैं.

जब महिलाओं से पूछा गया कि राजनीतिक भागीदारी में सबसे बड़ी बाधाएं क्या हैं, तो उन्होंने कई ढांचागत और सामाजिक कारणों की ओर इशारा किया.

22 प्रतिशत ने कहा कि पितृसत्तात्मक ढांचा सबसे बड़ी रुकावट है. इसके बाद 13 प्रतिशत ने घरेलू ज़िम्मेदारियों को मुख्य कारण बताया.

12 प्रतिशत ने व्यक्तिगत स्तर की कमियों, जैसे कि आत्मविश्वास की कमी, जागरूकता की कमी या अनुभव की कमी, को बड़ी बाधा माना. सात प्रतिशत ने सांस्कृतिक मान्यताओं को समस्या बताया.

छह प्रतिशत ने आर्थिक या संस्थागत बाधाओं की ओर इशारा किया.

चाहे महिलाएं अब वोटिंग में लगभग बराबरी पर हों, लेकिन असली राजनीतिक शक्ति और प्रतिनिधित्व अब भी सीमित है. महिला आरक्षण बिल का पारित होना इस अंतर को कम करने का एक संरचनात्मक रास्ता ज़रूर खोलता है,

लेकिन असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि महिलाओं की बढ़ती भागीदारी वास्तविक अधिकार और निर्णय लेने की शक्ति में बदल सके.

इस लेख में लेखकों के निजी विचार व्यक्त किए गए हैं. ये उनके संबद्ध संस्थानों के विचारों को नहीं दिखाते.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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