नीतीश कुमार के बेटे निशांत क्या जेडीयू में अपनी पहचान बना पाएंगे?

इमेज स्रोत, JDU
- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- ........से, पटना
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के यहां इफ़्तार की दावत थी. 19 मार्च की शाम 6 बजे के आस-पास मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने कैबिनेट सहयोगी विजय कुमार चौधरी के साथ पहुंचे थे.
महज़ कुछ मिनट रुककर नीतीश वापस लौट गए. नीतीश के वापस लौटने के एक मिनट के भीतर ही निशांत अपनी सफेद गाड़ी में कड़ी सुरक्षा के बीच इस दावत में पहुंचे.
निशांत की गाड़ी जीतन राम मांझी के आवास के अंदर लगी हुई थी. इसके चलते सम्राट चौधरी, मंगल पांडेय से लेकर सभी नेताओं को अपनी गाड़ी आवास के बाहर छोड़कर पैदल ही इफ़्तार की दावत में शामिल होने आना पड़ा.
इस बीच जब सम्राट चौधरी आए तो कुर्सियां कम पड़ गई. निशांत उनके स्वागत के लिए उठे और एक साधारण सी काली कुर्सी पर बहुत सहज भाव से बैठ गए.
बीती 8 मार्च को जेडीयू में शामिल हुए निशांत कुमार इस वक़्त बिहार की राजनीति का 'मोस्ट वॉच्ड' कैरेक्टर हैं.
ऊपर लिखे वाकये में निशांत की राजनीति में इंट्री को लेकर करीने से बनाई गई 'नीतीश स्ट्रैटेजी' दिखती है. साथ ही नीतीश कैबिनेट के मंत्रियों का निशांत को दिया जा रहा स्पेस और निशांत का सहज–सरल स्वभाव है.
ऐसे में सवाल ये है कि निशांत क्या अपने पिता की विरासत को संभाल पाएंगे? साल 2003 में अस्तित्व में आई जेडीयू और उसकी वैचारिक ज़मीन समाजवाद को बचा पाएंगे और नीतीश के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद निशांत की सरकार में क्या भूमिका होगी?
संकोची, सरल, आध्यात्मिक निशांत
ईद के दिन मुख्यमंत्री आवास पर अचानक निशांत ने पार्टी के प्रवक्ताओं की बैठक दोपहर साढ़े तीन बजे बुला ली थी. ये बैठक तकरीबन दो घंटे चली. बीच में नीतीश कुमार भी आए लेकिन वह इस बैठक में शामिल नहीं हुए. प्रवक्ताओं के साथ हल्की-फुल्की बातचीत के बाद वह चले गए.
इस बैठक के बाद एक प्रवक्ता ने बैठक के बारे में बीबीसी से कहा, "पार्टी, सरकार पर ही बात होती रही. अभी तो उनको बहुत कुछ जानना है लेकिन उनको देखकर मोह लगता है. वह राजनीति की कंटीली जमीन पर कैसे फिट होंगें?"

इमेज स्रोत, HAM
साल 1980 में जन्मे निशांत कुमार संकोची, सरल और आध्यात्मिक स्वभाव के हैं. नीतीश कुमार जब 1985 में पहली बार विधायक बने तो उन्हें सरकारी फ्लैट मिला.
नीतीश कुमार के मित्र उदय कांत अपनी किताब ' नीतीश कुमार- अंतरंग दोस्तों की नज़र में' लिखते हैं, "नीतीश कुमार को 94 और 95 नंबर के कमरों की यूनिट मिली जबकि उनके मित्र जगतानन्द को 83 और 84 नंबर की. दोनों अच्छे मित्र थे और दोनों ने पारस्परिक समझौता करके ऊपर और नीचे का एक-एक कमरा अदल-बदल कर लिया. इस तरह दोनों के दफ़्तर नीचे और रिहायशी कमरे ऊपर हो गए."
निशांत की शुरुआती पढ़ाई पहले पटना के सेंट कैरेंस स्कूल में, फिर मसूरी के मानव भारती स्कूल में हुई. मसूरी में हॉस्टल में रहते हुए उनकी तबियत खराब रहने लगी तो उन्हें पटना वापस बुला लिया गया. निशांत का दाखिला बेली रोड (पटना) स्थित केन्द्रीय विद्यालय में कराया गया.
साल 1988 के आसपास राजद नेता जगतानन्द सिंह के बेटे अजीत कुमार गांव से पटना इस फ्लैट में रहने आते हैं. दरअसल जगतानन्द ने शर्त रखी थी कि उनके बच्चों में जो बच्चा अपनी क्लास में अव्वल आएगा, उसकी पढ़ाई-लिखाई पटना में होगी. अजीत क्लास में अव्वल आए और उनका दाखिला निशांत के स्कूल यानी केन्द्रीय विद्यालय में हुआ.
कभी जेडीयू में रहे और बाद में राजद के टिकट पर विधानसभा लड़ चुके अजीत बीबीसी न्यूज़ हिंदी से कहते हैं, "नीतीश जी, निशांत को बहुत नियंत्रण में रखते थे. उसके दोस्त बहुत कम थे और वह संकोची स्वभाव का था. मैं जब गांव से पटना आया तो पहली बार मैं निशांत के ही बर्थडे में गया था. तब ही मुझे पहली बार मालूम चला था कि बर्थडे मनाया भी जाता है. वह 'ए' सेक्शन में था और मैं 'सी' सेक्शन में. उसकी क्लास में सिर्फ़ उसी के पास क्रिकेट किट थी जिसके चलते कई बच्चे उसके साथ लगे रहते थे."
साल 2025 में जब निशांत कुमार की पार्टी में ज्वाइनिंग की चर्चा थी, उस वक़्त नीतीश कुमार के करीबी और मंत्री श्रवण कुमार ने बीबीसी से कहा था, "निशांत को हम लोग सिर्फ़ अपने दादा–दादी या मां की पुण्यतिथि पर ही देखते हैं. बाकी वह घुलते-मिलते नहीं हैं."
निशांत एक विकट पहेली हैं...
राजनीति में व्यस्त नीतीश कुमार से ज्यादा निशांत अपनी मां मंजू कुमारी सिन्हा के ज्यादा करीब रहे. मंजू पेशे से शिक्षिका थी.
जेपी आंदोलन के समय से ही नीतीश के साथ रहे अशोक कुमार, फिलवक़्त पटना स्थित जेडीयू कार्यालय में कार्यालय सचिव हैं. उन्होंने निशांत को अपनी गोद में खिलाया है और ज़रूरत पड़ने पर डांटा भी है.
75 साल के अशोक कुमार बीबीसी न्यूज़ हिंदी को बताते हैं, "साहेब ( नीतीश कुमार) तो व्यस्त रहते थे. इसलिए निशांत का लगाव मां के प्रति ज्यादा हो गया. केन्द्र में मंत्री थे तो साहब भी पटना आते थे और ये लोग भी दिल्ली जाते थे."

इमेज स्रोत, Rajkamal Prakashan
अजीत भी बताते हैं, "मेरी मां तो गांव में रहती थी तो मंजू आंटी ही हम लोगों की गार्जियन की तरह थी. कई बार ऐसा होता था कि मंजू आंटी हमको अपने मायके (कंकड़बाग) तक ले जाती थीं और हम वहीं रह जाते थे. 2005 में मेरी शादी रांची में हुई थी तो निशांत आया था. इसके बाद मैं और मेरी पत्नी भी मंजू आंटी से मिलने दिल्ली गए थे और तब उन्होनें निशांत से कहा था कि तुम भी शादी कर लो. उसके बाद एक दो बार निशांत से मिलना हुआ लेकिन बाद में संपर्क टूट गया."
ढीला-ढाला कुर्ता पहने निशांत स्लीपर्स में भी सार्वजनिक आयोजनों में चले जाते हैं. वह बार-बार नीतीश कुमार के लिए 'पिता जी' और उनके सहयोगियों के लिए 'अंकल' शब्द का इस्तेमाल करते हैं.
पाटलिपुत्र यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर जय देव कहते हैं, "अभी उन्हें अपनी बॉडी लैंग्वेज और वर्बल लैंग्वेज पर काम करना होगा. चिराग, तेजस्वी सभी अपने माता-पिता का आदर के साथ नाम लेते हैं. पब्लिक लाइफ में और अपने वोटरों के साथ कनेक्ट करने के लिए यह ज़रूरी है. यहां नवीन पटनायक का एक उदाहरण लिया जा सकता है, वह शांत रहते हैं लेकिन उनकी बॉडी लैंग्वेज से अंदाजा लग जाता है कि उनको काम–काज से मतलब है. वह दृढ़ दिखते हैं लेकिन निशांत अभी आज्ञाकारी ज्यादा दिखते हैं. उनको अपनी एक स्वतंत्र पर्सनैलिटी डेलवेप करनी होगी."
पत्रकार संकर्षण ठाकुर अपनी किताब 'अकेला आदमी' में निशांत को 'एक विकट पहेली' बताते हैं जिसे समझना उसके पिता नीतीश कुमार के लिए अक्सर उलझन बन जाता है.
संकर्षण ठाकुर इस किताब में लिखते हैं, "इसका कारण शायद ये हो सकता है कि लड़कपन के दौरान या जब वह बालिग हो रहा था उस दौरान पिता उसे कदाचित ही देखने आते थे. ऐसा लगता है कि एक विरक्त मां और गैर हाजिर पिता के बीच बड़े होते होते निशांत के अंदर कुछ इस कदर टूट गया जिसकी मरम्मत नहीं की जा सकती. निशांत ने बीआईटी मेसरा से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. लेकिन उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि कुछ न कुछ करना ज़रूरी था."
वह आगे लिखते हैं, "जब से उसके पिता मुख्यमंत्री बने हैं तब से उसने अपना अधिकतर समय मौन रहकर बिताया है. 1, अणे मार्ग (मुख्यमंत्री आवास) में उस भाग में रहते हैं जहां कोई आता-जाता नहीं."
सक्रिय होते निशांत बने कार्यकर्ताओं की उम्मीद

इमेज स्रोत, JDU
लेकिन अधिकतर शांत रहने वाले निशांत अब धीरे-धीरे बोलने लगे हैं. बीती 8 मार्च को जेडीयू ज्वाइन करने के बाद वह लगातार एक्टिव हैं.
यहां दिलचस्प है कि लालू परिवार पर परिवारवाद को लेकर आक्रामक रहने वाले नीतीश कुमार बहुत स्ट्रैटेजिकली निशांत को लॉन्च और मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं.
मसलन जिस दिन निशांत ने जेडीयू ज्वाइन किया, उस वक़्त नीतीश कुमार जेडीयू दफ़्तर में मौजूद नहीं रहे. जेडीयू की इफ़्तार पार्टी में भी निशांत कुमार की मौजूदगी देखने के बाद नीतीश कुमार, इफ़्तार पार्टी में नहीं रुके. इस बीच एक फोटो फ्रेम में दोनों साथ-साथ दिखे लेकिन ये फ़ोटो जारी करने से पहले भी सीएम सेल में बहुत विचार हुआ.
इसी तरह गांधी मैदान में ईंद की नमाज़ में भी नीतीश कुमार ख़ुद नहीं गए, निशांत कुमार को वहां देखा गया. नीतीश कुमार के बिहार की सत्ता संभालने के बाद ये पहला मौका था जब नीतीश कुमार पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में ईद की नमाज़ में शामिल नहीं हुए.
समाजशास्त्री और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस (टिस) के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेन्द्र कहते हैं, "नीतीश स्ट्रैटेजिकली ख़ुद को शर्मिन्दगी से बचाने के लिए ऐसा कर रहे हैं. वह चाहते है कि निशांत राजनीति में सक्रिय भी हों और उन पर परिवारवाद का आरोप भी न लगे."
समाज विज्ञानी बिहार में घट रहे इस घटनाक्रम को जिस भी आईने में देखें लेकिन निशांत की इंट्री आम जेडीयू कार्यकर्ताओं के लिए उम्मीद है.
पार्टी से 18 साल से जुड़े सीतामढ़ी के नीरज कुमार झा कहते हैं, "हाल के दिनों में निशांत कुमार जी में जो परिवर्तन दिखा है, उससे उम्मीद लगती है."
वहीं पटना के कार्यकर्ता राम कुमार राम कहते हैं, "निशांत जी सभ्य हैं, सरल हैं. हम लोग सिर्फ़ निशांत को ही सीएम देखना चाहते हैं. पूरा चुनाव 25 से 30 फिर से नीतीश के नारे पर लड़ा गया था. तो जब नीतीश जी जा रहे हैं तो उनके बेटे को सीएम बनाना चाहिए."
पार्टी के आम कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि हाल के दिनों में जेडीयू के नौजवान विधायकों ने टीम निशांत नाम से एक अनौपचारिक टीम तैयार कर ली है. इसी टीम के एक मेंबर और इस्लामपुर से विधायक रूहैल रंजन भी है. रूहैल रंजन बीआईटी मेसरा में निशांत कुमार के बैचमेट थे.
बीबीसी से बातचीत में रूहैल कहते हैं, "मैं चाहता हूं कि निशांत बिहार को लीड करें. वह पढ़े-लिखे और संवेदनशील हैं. लोग कहते हैं कि वह इंट्रोवर्ट हैं, लेकिन ऐसा नहीं है. वह बहुत समझदारी से वक़्त और जगह के हिसाब से अपनी बात रखते हैं और उनमें नेतृत्व करने की सारी ख़ूबियां हैं. अभी हाल ही में बख्तियारपुर गए थे तो तकरीबन 20 हज़ार लोग जुट गए थे. साफ़ है कि लोगों में उनका क्रेज़ बढ़ा है."
क्या निशांत संभाल पाएंगे नीतीश की विरासत को?

इमेज स्रोत, Rajkamal Prakashan
यह सही है कि निशांत कुमार आजकल जहां जा रहे हैं, वहीं उत्सुकतावश लोगों की भीड़ उमड़ती है. उनके साथ सेल्फ़ी लेने और हाथ मिलाने वालों की भीड़ रहती है.
किसी भी दूसरे नेता से इतर निशांत बहुत सहजता के साथ लोगों से मिलते हैं.
लेकिन पॉलिटिक्स में सहजता नहीं बल्कि वोटों का गणित और सरकार की जनपक्षीय नीतियों का एक बैलेंस साधना महत्वपूर्ण होता है, जो नीतीश कुमार ने अपनी जाति से इतर अपनी पॉलिटिकल कान्स्टीट्यूंसी बनाकर साबित किया.
यही वजह है कि नीतीश के कई करीबियों से जब ये सवाल पूछा जाता है कि क्या निशांत, नीतीश की विरासत को संभाल पाएंगे? तो उनके लिए सीधा जवाब देना मुश्किल होता है.
यह सवाल पूछे जाने पर अशोक कुमार बिना निशांत का नाम लिए कहते हैं, "साहेब (नीतीश कुमार) जैसा तो कोई नहीं है. कोई आदमी नीतीश कुमार नहीं बन पाएगा. वह अपने भाषणों में किसी शब्द को दो बार रिपीट नहीं करते थे. जितनी अच्छी हिंदी, उतनी अच्छी अंग्रेजी."
वहीं अजीत कुमार कहते हैं, "निशांत को पॉलिटिक्स की बेसिक समझ तो है और उनके अंदर संभावना है."
लेकिन अकादमिक लोगों के लिए यह वेट एंड वॉच का समय है.
समाज विज्ञानी पुष्पेन्द्र कहते हैं, "रीजनल पार्टीज़ के साथ यह दिक्कत है कि उनकी विरासत को संभालने वाला परिवार से ही आता है. नीतीश की विरासत को संभालना है तो निशांत को आगे आना होगा. लेकिन वह कितना सफल होंगें–कितना असफल होगें, यह अभी तय नहीं किया जा सकता. फ़िलहाल इतना कहा जा सकता है कि निशांत का पब्लिक एपीयरेंस बहुत आश्वासन नहीं देता कि वह पार्टी संभाल पाएंगे."
जेडीयू और राजद की वैचारिक ज़मीन समाजवाद पर है.
नीतीश के राज्यसभा जाने के बाद और राजद खासतौर पर तेजस्वी की चुनावी हार के बाद लगातार निष्क्रियता में समाजवाद का क्या भविष्य है?
इस सवाल पर पुष्पेन्द्र कहते हैं, "60 के दशक में बिहार में जो समाजवाद मजबूत हुआ था, उस धारा के यह अवसान का टाइम है. नीतीश उसका चेहरा थे लेकिन तेजस्वी समाजवादी विचार के व्यक्ति नहीं है. लेकिन ऐसी धाराएं मृत नहीं होती बल्कि नए चेहरों के साथ जीवित हो जाती हैं. बिहार में फिलहाल वह चेहरे नहीं दिख रहे लेकिन आगे नए चेहरे उभरेंगें."
सीएम कोई बने, नीतीश रहेंगे सुपर सीएम

इमेज स्रोत, Rajkamal Prakashan/ Prabhat Prakashan
नीतीश कुमार राज्यसभा सांसद निर्वाचित हुए हैं. ऐसा लगता है कि वह अप्रैल माह में अपने पद से इस्तीफ़ा दे सकते हैं.
ऐसे में अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? बीस साल तक जो पद जेडीयू ने अपने पास सुरक्षित रखा, वह क्या अब बीजेपी के पास चला जाएगा?
लोजपा (आर) प्रमुख चिराग पासवान ने इस संबंध में पूछने पर कहा, "अगला मुख्यमंत्री बीजेपी से होना चाहिए. मुख्यमंत्री को लेकर औपचारिक सहमति बन गई है और जल्द ही इसकी घोषणा हो जाएगी."
फ़िलवक्त इस रेस में सबसे आगे नाम सम्राट चौधरी का माना जा रहा है. खुद नीतीश कुमार कई बार सम्राट चौधरी की तरफ़ इशारा करके कह चुके है कि अब आगे यह (सम्राट चौधरी) ही देखेंगे.
इस बीच जेडीयू में निशांत की इंट्री के बाद से ही कार्यकर्ता और टीम निशांत लगातार निशांत कुमार को सीएम बनाने की मांग कर रही है. लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता इस संबंध में चुप्पी साधे हैं और डिफेंसिव नज़र आ रहे हैं.
जेडीयू के एमएससी और नीतीश कुमार के करीबी संजय गांधी बीबीसी से कहते हैं, "सारे फ़ैसले एनडीए विधायक दल की बैठक में होंगे. निशांत को सीएम बनाने की मांग स्वाभाविक है लेकिन सारे फ़ैसले बैठक में होंगे."
हालांकि इतने साल तक नीतीश कुमार के साए में रहा बिहार का शासन, कम से कम साल 2030 तक उनके नक्शे कदम पर चलेगा, ऐसे संकेत जेडीयू नेता देते हैं.
जैसा कि विधायक रूहैल रंजन कहते हैं, "इतनी बात तय मानिए कि सीएम कोई भी बनें, सुपर सीएम नीतीश जी ही रहेंगे. "
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



































