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रोबो डॉग के बाद अब सॉकर ड्रोन पर विवाद, चर्चा में रहने वाली गलगोटिया यूनिवर्सिटी की शुरुआत कब और कैसे हुई?
नई दिल्ली में चल रही इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट सुर्ख़ियों में बनी हुई है. एक ओर इस समिट के दौरान अव्यवस्था और कुप्रबंधन के आरोप लग रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर इसमें शामिल होने को लेकर एक निजी विश्वविद्यालय चर्चा में है.
गलगोटिया यूनिवर्सिटी पर आरोप लगा कि उन्होंने चीन निर्मित एक रोबो डॉग को अपना बताकर समिट में पेश किया.
इसकी सोशल मीडिया पर काफ़ी चर्चा रही जिसके बाद बुधवार शाम को गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने बयान जारी कर माफ़ी मांगी है. यूनिवर्सिटी ने कहा है कि यह ग़लतफ़हमी की वजह से हुआ था. साथ ही यूनिवर्सिटी ने बताया है कि उसने समिट से अपना स्टॉल ख़ाली कर दिया है.
सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर अपने बयान में गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने लिखा, "हमारे स्टॉल पर मौजूद हमारी एक प्रतिनिधि को तकनीकी जानकारी सही तरीक़े से नहीं मिली थी. कैमरे पर आने के उत्साह में उन्होंने उत्पाद से जुड़ी कुछ ग़लत जानकारी दे दी, जबकि उन्हें मीडिया से बात करने की अनुमति भी नहीं थी."
"हम आपसे निवेदन करते हैं कि इस स्थिति को समझें, क्योंकि हमारा मक़सद किसी भी तरह से इस इनोवेशन को ग़लत तरीके से पेश करना नहीं था. गलगोटिया यूनिवर्सिटी शैक्षणिक ईमानदारी, पारदर्शिता और अपने काम की ज़िम्मेदार प्रस्तुति को लेकर प्रतिबद्ध है. आयोजकों की भावना का सम्मान करते हुए हमने कार्यक्रम स्थल ख़ाली कर दिया है."
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वहीं मंगलवार को बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में गलगोटिया यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर नेहा सिंह ने कहा था कि इस रोबोट को गलगोटिया यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ़ एक्सिलेंस में डिवेलप किया जा रहा है, न कि इसे बनाया गया है, बिल्ड करना और डिवेलप करने में अंतर है.
प्रोफ़ेसर नेहा सिंह ने ही पहले इस रोबो डॉग को लेकर मीडिया से बात की थी और बताया था कि इसे गलगोटिया यूनिवर्सिटी में डिवेलप किया गया है. इसके बाद ही सोशल मीडिया पर गलगोटिया यूनिवर्सिटी को ट्रोल किया जाने लगा था.
रोबो डॉग के बाद अब सॉकर ड्रोन पर विवाद
गलगोटिया यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर नेहा सिंह का एक वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल है जिसमें वो एक सॉकर ड्रोन को लेकर दावा कर रही हैं कि इसकी एंड टू एंड इंजीनियरिंग से लेकर एप्लिकेशन समेत सभी चीज़ों पर काम यूनिवर्सिटी में हुआ है.
उन्होंने दावा किया कि गलगोटिया के कैंपस में भारत का पहला ड्रोन सॉकर एरीना (किसी ख़ास गतिविधि की जगह) है, इस एरीना में स्टूडेंट्स गेम्स खेलते हैं, इसको फ़्लाई करते हैं और नए तरीक़े से एनहांस्ड फ़ीचर के साथ इसे डिवेलप कर रहे हैं.
इंडिया यूथ कांग्रेस ने इस वीडियो को एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा है, "पहले चीन, अब कोरिया. गलगोटिया 'उधार' लिए गए इनोवेशन के वर्ल्ड टूर पर है. उन्होंने दावा किया कि उन्होंने कैंपस में स्क्रैच से इंडिया का पहला ड्रोन सॉकर बनाया है, लेकिन असल में यह कोरिया का एक स्ट्राइकर वी3 एआरएफ़ है."
इस वीडियो में प्रोफ़ेसर जिस ड्रोन को दिखा रही हैं. उसी से लगभग मिलता-जुलता एक ड्रोन दक्षिण कोरियाई कंपनी हेलसेल बनाती है.
हेलसेल की वेबसाइट के मुताबिक़, फ़ुटबॉल दुनियाभर में सबसे अधिक पसंद किए जाने वाला खेल है, उसी के मद्देनज़र सॉकर और ड्रोन को मिलाकर एक नए तरीक़े का खेल बनाया गया है.
"ड्रोन सॉकर एक उभरता हुआ भविष्यवादी खेल है, जिसे उन्नत कार्बन मटीरियल और ड्रोन टेक्नोलॉजी की मदद से बनाया गया है. इसमें दो टीमें होती हैं और हर टीम में 5-5 खिलाड़ी होते हैं."
इस ड्रोन सॉकर के स्ट्राइकर ग्रुप में अलग-अलग तरह के तक़रीबन 11 ड्रोन हैं. वीडियो में जिस स्ट्राइकर वी3 एआरएफ़ की बात की जा रही है, उसकी क़ीमत तक़रीबन 41 हज़ार रुपये है.
गलगोटिया यूनिवर्सिटी कब शुरू हुई?
गलगोटिया यूनिवर्सिटी की शुरुआत साल 2011 में उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में हुई थी. इसके संस्थापक गलगोटिया पब्लिकेशंस के मालिक सुनील गलगोटिया हैं.
हालांकि विश्वविद्यालय तक पहुंचने का सफ़र छोटे-छोटे संस्थानों से पूरा हुआ है.
गलगोटिया यूनिवर्सिटी की वेबसाइट के मुताबिक़, सुनील गलगोटिया नई दिल्ली के कनॉट प्लेस में अपने ख़ानदानी बुकस्टोर ईडी गलगोटिया एंड संस के काम में लगे हुए थे.
साल 1980 में उन्होंने पब्लिकेशन हाउस की शुरुआत करने का फ़ैसला किया. उन्होंने गलगोटिया पब्लिकेशंस के नाम से अपने पब्लिकेशन हाउस की शुरुआत की.
यूनिवर्सिटी की वेबसाइट के मुताबिक़, सुनील गलगोटिया ने शुरुआती दिनों में पहली किताब छापने के लिए 9000 रुपयों का क़र्ज़ लिया था.
इस पब्लिकेशन हाउस ने तब कामयाबी की उड़ान भरी जब उसे विदेश में पढ़ाई के लिए दी जाने वाली परीक्षा सैट, टॉफ़ेल, जीआरई और जीमैट के लिए बैरंस किताबों का प्रकाशन अधिकार मिला.
इसके बाद सुनील गलगोटिया ने किताब से निकलकर शिक्षा के क्षेत्र में हाथ फैलाने का फ़ैसला किया.
साल 2000 में उन्होंने 40 छात्रों के साथ गलगोटिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी की शुरुआत की. उसी साल गलगोटिया कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी की शुरुआत हुई.
तक़रीबन 200 कोर्स चलाने का दावा
इन्हीं दोनों संस्थानों की बदौलत आगे चलकर साल 2011 में गलगोटिया यूनिवर्सिटी की नींव पड़ी. आज ग्रेटर नोएडा में 52 एकड़ में इसका कैंपस है.
गलगोटिया यूनिवर्सिटी का दावा है कि एक शैक्षणिक सत्र में तक़रीबन 40 देशों के 40 हज़ार छात्र उसके यहां पढ़ते हैं. वहीं पूरी दुनिया के 96 देशों में उसके एक लाख से अधिक पूर्व छात्र हैं.
यूजीसी से मान्यता प्राप्त इस यूनिवर्सिटी में पोलिटेक्नीक, ग्रैजुएशन, पोस्ट ग्रैजुएशन के साथ-साथ पीएचडी भी होती है और यूनिवर्सिटी का दावा है कि उसके 20 स्कूलों में 200 प्रोग्राम चल रहे हैं.
इसके अलावा यूनिवर्सिटी को फ़ार्मेसी काउंसिल ऑफ़ इंडिया, बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया, इंडियन नर्सिंग काउंसिल, नेशनल काउंसिल फ़ॉर टीचर एजुकेशन और नॉर्म्स ऑफ़ नेशनल काउंसिल फ़ॉर होटल मैनेजमेंट से मान्यता मिली हुई है.
सुनील गलगोटिया इस यूनिवर्सिटी के चांसलर और उनके बेटे ध्रुव गलगोटिया इसके सीईओ हैं. वहीं सुनील की बेटी अराधना गलगोटिया इस यूनिवर्सिटी में डायरेक्टर ऑपरेशंस हैं.
पहले भी हो चुके हैं विवाद
गलगोटिया यूनिवर्सिटी का कहना है कि उसका मक़सद इंटरनेशनल लेवल पर एक जाना-माना इंस्टिट्यूशन बनना है जो मल्टीडिसिप्लिनरी और इंटरडिसिप्लिनरी एजुकेशन, रिसर्च और इनोवेशन में बेहतरीन हो.
इसके साथ ही उसका कहना है कि वो ऐसे ग्रेजुएट तैयार करना चाहता है जो दुनिया भर में कॉम्पिटिटिव हों और अपने फील्ड में लीडर बनने के लिए तैयार हों. हालांकि ऐसा नहीं है कि गलगोटिया यूनिवर्सिटी पहली बार विवादों में आया हो.
साल 2024 में लोकसभा चुनाव के दौरान नई दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय के बाहर छात्रों के एक समूह ने वेल्थ डिस्ट्रिब्यूशन और इनहेरिटेंस टैक्स के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन किया था. इस दौरान छात्रों ने ऐसे पोस्टर लिए हुए थे जिसमें लिखा हुआ था- 'पहले लेंगे वोट फिर लेंगे मंगलसूत्र'.
इस दौरान कई छात्रों ने दावा किया कि वे गलगोटिया यूनिवर्सिटी से हैं. इन छात्रों से जब पूछा गया कि वे किस मुद्दे पर प्रदर्शन कर रहे हैं तो उनसे जवाब नहीं दिया गया. इस घटना से जुड़े कई वीडियो सोशल मीडिया पर ख़ासे वायरल थे.
इसके अलावा बीते साल जून में गलगोटिया यूनिवर्सिटी के कैंपस के बी ब्लॉक में छात्रों के दो समूह के बीच मारपीट का वीडियो वायरल हुआ था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.