एनसीईआरटी की किताब पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला: क्या अदालत की आलोचना करना अब मुश्किल होगा?

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- Author, उमंग पोद्दार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- ........से, दिल्ली
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की किताब पर सुप्रीम कोर्ट ने दो सख़्त आदेश जारी किए हैं.
इस किताब (एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियोंड) में न्यायपालिका के बारे में एक अध्याय था. इसमें एक हिस्से का शीर्षक था- 'करप्शन इन द ज्यूडिशियरी' यानी न्यायपालिका में भ्रष्टाचार. इसमें लिखा था कि लोगों को न्यायपालिका में अलग-अलग स्तरों पर भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ता है.
इस किताब के बारे में एक ख़बर अंग्रेज़ी अख़बार 'द इंडियन एक्सप्रेस' में छपी. इसके बाद कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे वरिष्ठ वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ के सामने इस अध्याय का मुद्दा उठाया था. कपिल सिब्बल ने कहा था, "हम काफ़ी परेशान हैं. आठवीं कक्षा के बच्चे-बच्चियों को पढ़ाया जा रहा है कि न्यायपालिका भ्रष्ट है…"
इसके तुरंत बाद, सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद से मामले का संज्ञान लिया और कुछ दिनों के अंदर दो आदेश दिए. 26 फ़रवरी को अपने पहले आदेश में ही कोर्ट ने इस किताब पर पाबंदी लगा दी और तब तक छपी सभी किताबों को वापस लेने को कहा.
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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा और क्या आदेश दिया?
सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि हमें यह ध्यान रखना होगा कि देश भर के मिडिल स्कूलों के पाठ्यक्रम में इस तरह के संदर्भ से काटे गए पाठ को शामिल करना ठीक नहीं है. यह संतुलित शिक्षा के सुरक्षा उपायों को नज़रंदाज़ करना है.
कोर्ट के मुताबिक़, ''इससे विद्यार्थियों के मन में, उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों, छोटे बच्चे-बच्चियों के माता-पिता, पूरे समाज में और अंततः अगली पीढ़ी तक… न्यायपालिका जैसी संस्था के प्रति भरोसे के धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ने का ख़तरा पैदा होता है.''
साथ ही एनसीईआरटी के निदेशक और 'स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग' के सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी किए. कोर्ट ने पूछा कि क्यों न उनके ख़िलाफ़ अदालत की अवमानना की कार्यवाही चलाई जाए.

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वहीं, अपने दूसरे फ़ैसले में 11 मार्च को कोर्ट ने उन तीन लोगों पर भी पाबंदी लगा दी जिन्होंने इस अध्याय को लिखा था.
कोर्ट ने केंद्र सरकार, सभी राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों और उन सारे विश्वविद्यालयों और संस्थानों को जिन्हें सरकार से पैसे मिलते हैं, उनसे कहा कि वे इन तीन लोगों से आगे किसी भी तरह का रिश्ता न रखें.
अपने फ़ैसले में कोर्ट ने लिखा, "हमारे पास इस बात पर शक करने की कोई वजह नहीं है" कि या तो इन्हें भारत में न्यायपालिका के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है या उन्होंने जान-बूझकर तथ्यों को ग़लत तरीक़े से प्रस्तुत किया है ताकि विद्यार्थियों को न्यायपालिका की ग़लत छवि दिखाई जा सके.
कोर्ट ने यह भी कहा कि ये तीन लोग कोर्ट के सामने आकर अपना पक्ष रख सकते हैं. फिर आगे देखा जाएगा कि इस फ़ैसले में कोई बदलाव आना चाहिए या नहीं.
इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि उनके 26 फ़रवरी वाले फ़ैसले के बारे में बात करते हुए सोशल मीडिया पर कुछ लोग 'ग़ैर ज़िम्मेदाराना' तरीक़े से पेश आ रहे हैं. कोर्ट ने कहा कि सरकार ऐसी वेबसाइट और अकाउंट की जानकारी उन्हें दे. उसके बाद वे उनके ख़िलाफ़ पर्याप्त क़दम उठाएंगे.
हालांकि, कोर्ट ने अपने फ़ैसले में 'ग़ैर ज़िम्मेदाराना' की व्याख्या नहीं की है.
साथ ही, इस अध्याय को वापस लिखने के लिए कोर्ट ने कुछ शर्तें भी तय की हैं.
इन दोनों फ़ैसलों को क़ानून के माहिर आलोचना के नज़रिए से भी देख रहे हैं. समझते हैं, उनकी आलोचनाएं क्या हैं और इससे आगे क्या फ़र्क़ पड़ सकता है.
एनसीईआरटी की किताब पर फ़ैसला: आवाज़ दबाने की कोशिश?
कोर्ट ने 26 फ़रवरी के अपने फ़ैसले में लिखा कि वे इसके ज़रिए आलोचना को दबाना नहीं चाहते. लेकिन, बच्चे-बच्चियों को एकतरफ़ा जानकारी देने से उनमें ज़िंदगी भर न्यायपालिका के ख़िलाफ़ ग़लतफ़हमियां घर कर जाएंगीं. कोर्ट के इस फैसले का कई वरिष्ठ वकीलों ने समर्थन किया.
हालांकि, कई क़ानूनी जानकारों का यह भी कहना है कि इस फ़ैसले से लोग न्यायपालिका पर किसी तरह का सवाल उठाने से घबराएंगे, ख़ासकर भ्रष्टाचार के मामलों में. इनका मानना है कि वैसे ही बहुत कम लोग हैं जो न्यायपालिका की आलोचना खुल कर करते हैं. ऐसे फ़ैसले से वे लोग और भी कम हो जाएंगे.
प्रोफ़ेसर शुभांकर दाम इंग्लैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ़ पोर्ट्समथ में क़ानून पढ़ाते हैं. इन्होंने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर कई शोध किए हैं.

प्रोफ़ेसर शुभांकर ने बीबीसी हिन्दी से कहा, "मुझे इस बात पर कोई संदेह नहीं है कि इससे लोग न्यायपालिका के ख़िलाफ़ बोलने से घबराएंगे. ख़ासकर वे लोग जो भारत में रहते और काम करते हैं."
उनका मानना है कि उन पर इस फ़ैसले का कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि वे भारत के बाहर रहते हैं और वहीं काम करते हैं.
प्रोफ़ेसर शुभांकर के मुताबिक़, "अभी भी कई पत्रकार और अकादमिक विशेषज्ञ न्यायपालिका पर लिखने से घबराते हैं. मुझे आज के दिन भारत में ऐसे किसी भी विश्वविद्यालय के बारे में नहीं पता जो अपने यहां फ़ैकल्टी के सदस्य को इन बातों पर गंभीर रूप से शोध करने की इजाज़त देता हो."
उनके मुताबिक़, ऐसा इसलिए क्योंकि विश्वविद्यालयों के कई कामकाज में कोर्ट के जजों की अहम भूमिका होती है.
उन्होंने कहा, "आप आज के दिन कोई किताब या लेख देखिए. आपको ऐसे बहुत ही कम लेख मिलेंगे जो गंभीरता से न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पड़ताल करते हों. ऐसा होना कोई संयोग नहीं है. लोगों को पता है कि इस विषय पर बात करने से क्या हो सकता है."
वह मानते हैं कि अगर वह भी भारत में होते तो ऐसे शोध नहीं कर सकते थे जो अब तक करते आए हैं.
प्रशांत रेड्डी क़ानून के जानकार और शोधकर्ता हैं. इन्होंने हाल में ही भारत की निचली अदालतों के बारे में अंग्रेज़ी में एक किताब 'तारीख़ पे जस्टिस' लिखी है. उन्होंने भी बीबीसी हिन्दी से कहा, "कोर्ट की अवमानना के क़ानून के दुरुपयोग की वजह से कई संपादक और समाचार संस्थान न्यायपालिका पर लिखने में सतर्क रहते हैं. इससे अब उनका डर और बढ़ जाएगा."
उनका कहना था, "अगर आप पिछले कुछ दशक में न्यायपालिका में 'कुप्रशासन' और 'भ्रष्टाचार' पर ख़बरें या स्तंभों को देखें तो ऐसे लेख बहुत कम मिलेंगे."
उनका मानना है कि ऐसे फ़ैसले के बाद लोग ऐसी बातों के बारे में लिखने से ख़ुद को रोकेंगे.
उनकी यह आशंका है कि अब सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को देखते हुए, हाईकोर्ट भी कोर्ट की अवमानना के लिए सख़्त आदेश देंगे.
फ़ैसले पर और क्या कह रहे हैं जानकार?
क़ानून के जानकारों ने इन दोनों फ़ैसलों की वैधता पर भी सवाल उठाए हैं. संविधान के जानकार गौतम भाटिया ने इन फ़ैसलों के बाद दो लेख लिखे हैं. उन्होंने लिखा कि किताबों और लोगों पर पाबंदी लगाना, एक संवैधानिक कोर्ट के दायरे के बाहर है.
उन्होंने लिखा कि जब किसी मौलिक अधिकार की बात आती है तो कोई भी संवैधानिक कोर्ट केवल यह देख सकता है कि सरकार द्वारा लिया गया कोई फ़ैसला संविधान के ख़िलाफ़ है या नहीं.
उन्होंने लिखा कि किसी व्यक्ति के रोज़गार पर पाबंदी लगाना, उनके मौलिक अधिकार पर हमला है. साथ ही, यह बात भी साफ़ नहीं है कि उन्होंने कौन से क़ानून तोड़े हैं. यही नहीं, ऐसा आदेश देते हुए कोर्ट ने न कोई सुनवाई की और न ही अपने फ़ैसले में सही से कारण बताए.
प्रोफ़ेसर शुभांकर दाम का भी कहना था कि उन तीनों लोगों के आगे के काम पर पाबंदी लगाने का फ़ैसला 'ग़ैर-कानूनी' है. उन्होंने कहा, "मुझे ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं पता जो ऐसे फ़ैसले को वैधता दे सकता है. ख़ासकर तब जब यह फ़ैसला दूसरे पक्ष को सुने बिना दिया गया हो."
वहीं, प्रशांत रेड्डी का भी मानना है, "मुझे उस अध्याय में कुछ ग़लत नज़र नहीं आया. उसमें कोई भी तथ्य ग़लत नहीं था. अगर कोई पूरा अध्याय पढ़े तो उससे न्यायपालिका की बुरी छवि पेश नहीं होती है."
दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मदन लोकुर से जब हमने इस फ़ैसले के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, ''मुझे लगता है कि तीनों विद्वानों को किसी भी सार्वजनिक विश्वविद्यालय से जुड़ने से रोकने का यह आदेश ज़रूरत से ज़्यादा सख़्त है. इस बारे में कोई शक नहीं है.''
''हालाँकि, मुझे नहीं लगता कि यह फ़ैसला किसी को न्यायपालिका की आलोचना करने से रोकेगा. अदालत का ध्यान उन संवेदनशील छोटी उम्र के विद्यार्थियों से भ्रष्टाचार के बारे में बात करने पर था.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















