रूस-यूक्रेन लड़ाई से क्यों रो रहा भागलपुर का सिल्क उद्योग

आलिम अंसारी कपड़ा दिखाते हुए
इमेज कैप्शन, अलीम अंसारी चार दशकों से सिल्क के कारोबार से जुड़े हैं.
    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, भागलपुर बिहार से

बिहार राज्य का भागलपुर ज़िला अपने सिल्क उद्योग के लिए मशहूर रहा है. यहां के हैंडलूम से लेकर पावरलूम तक के कपड़ों की मांग भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों में है.

लेकिन रूस और यूक्रेन के बीच जंग शुरू होते ही यहां के सिल्क उद्योग को बड़ा झटका लगा है. इस कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि इस लड़ाई की वजह से भागलपुर के सिल्क उद्योग का निर्यात क़रीब 25 फ़ीसदी तक कम हो गया है.

यहां के व्यवसायियों और बुनकरों के लिए यह एक बड़ा झटका है. भागलपुर के सिल्क उद्योग को वहां से हज़ारों मील दूर होने वाली इस लड़ाई के ऐसा असर का कोई अंदाज़ा तक नहीं था.

मधुबनी चित्रकला से लेकर आधुनिक मांग के मुताबिक़ कपड़े तैयार करने में भागलपुर के बुनकरों की ख़ासियत मानी जाती है. सिल्क की चादरों से लेकर साड़ियां, दुपट्टे, शॉल, कुर्ते, स्कार्फ और बाक़ी कपड़ों के शौकीन भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों में मौजूद हैं.

गोदाम में पड़ा है कारोबारियों का माल

गोदाम में रखा माल
इमेज कैप्शन, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में मांग कम होने की वजह से कारोबारियों का तैयार माल गोदामों में पड़ा है.

भागलपुर के अलीम अंसारी चार दशकों से सिल्क उद्योग के कारोबार से जुड़े हुए हैं. यह उनका पुश्तैनी काम है. तरह-तरह की नक्काशी और डिज़ाइन के साथ तैयार उनका माल विदेशों तक जाता है.

हथकरघा से तैयार उनके प्रोडक्ट की मांग देश-विदेश तक है. पिछले ही सीज़न में तैयार क़रीब 25 लाख रुपए का माल अब तक उनके पास अटका पड़ा है. अलीम अंसारी ने यह माल विदेशी ग्राहकों के लिए बनवाया था. लेकिन जंग शुरू होते ही इसे भेजने का ऑर्डर कैंसिल हो गया.

ऐसी हालत हमें भागलपुर के कई और व्यवसायियों के यहां देखने को मिली. किसी के गोदाम में माल अटका पड़ा है तो किसी की दुकान में.

दरअसल क़रीब नौ महीने पहले रूस और यूक्रेन के बीच लड़ाई शुरू हो गई. इस लड़ाई ने बुनकरों से बड़ा काम छीन लिया है और कारोबारियों से व्यवसाय का एक बड़ा हिस्सा भी.

यूक्रेन और रूस के आसपास के मुस्लिम देशों में भागलपुर के सिल्क की खूब मांग रही है. वहां हर मौसम के लिए भागलपुर के लिनन के शर्ट बनाए जाते हैं.

विदेश में पसंद किया जाता है भागलपुर का सिल्क

सिल्क का कपड़ा
इमेज कैप्शन, भागलपुर में तैयार सिल्क के कपड़ों को यूरोप और मध्य एशिया के देशों में ख़ूब पसंद किया जाता है.
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बिहार के भागलपुर सिल्क उद्योग के ऐसे प्रोडक्ट की मांग यूक्रेन, तजाकिस्तान, तंजानिया, जर्मनी, इटली और आस पास के कई देशों में रही है. यहां के सिल्क के कपड़े खाड़ी देशों में भी खूब पसंद किए जाते हैं.

व्यापार के आधुनिक तरीकों की वजह से खाड़ी देशों से भी भागलपुर के कपड़े रूस और उसके आसपास के देशों तक पहुंचते थे. लेकिन युद्ध की वजह से इसकी मांग काफ़ी कम हो गई है. कपड़े तैयार करने के जो आर्डर युद्ध शुरू होने के पहले दिए गए थे, उनका भी एक बड़ा हिस्सा कैंसिल कर दिया गया.

इस तरह से भागलपुर सिल्क उद्योग से जुड़े लोगों पर रूस और यूक्रेन के बीच की लड़ाई का सीधा असर हो गया. अलीम अंसारी खादी ग्रामोद्योग से जुड़े हुए हैं. वो बुनकर कल्याण समिति के सदस्य भी रहे हैं.

अलीम अंसारी ने बीबीसी को बताया, “युद्ध का ख़ामियाज़ा हम सभी को भुगतना पड़ रहा है. रूस के आस-पास के देशों में जो स्कार्फ इस्तेमाल होता है उसका 90 फ़ीसदी भागलपुर से जाता था.”

"युद्ध शुरू हो गया और हम अपना माल भेज नहीं पाए. यहां से उन देशों में सालाना 150 करोड़ रुपये का स्कार्फ और 100 करोड़ का लिनेन का एक्सपोर्ट होता था.”

अलीम अंसारी के मुताबिक़ रूस और यूक्रेन के बीच लड़ाई शुरू होने से भागलपुर के सिल्क का एक्सपोर्ट 25 फ़ीसदी तक प्रभावित हुआ है. रूस के आसपास के देशों से नए ऑर्डर तो छोड़ दीजिए, सारे पुराने ऑर्डर कैंसिल कर दिए गए.

धंधे से जुड़े लोगों के परिवारों पर मार

सिल्क का कपड़ा बनता हुआ
इमेज कैप्शन, सिल्क का कपड़ा तैयार करता एक कारीगर

अलीम अंसारी बताते हैं कि भागलपुर में करीब 25 हज़ार परिवार सिल्क उद्योग से जुड़े हुए हैं. इनमें क़रीब 10 हज़ार परिवार जो माल तैयार करते हैं वह मूल रूप से एक्सपोर्ट के काम में आता है.

अलीम अंसारी की तरह ही भागलपुर के बाक़ी कई सिल्क कारोबारियों और बुनकरों को इस रूस-यूक्रेन जंग ने प्रभावित किया है.

इसलिए जिन गलियों में जहां कभी हर तरफ सूत कारोबार की चमक देखने को मिलती थी वहां अभी उदासी पसरी हुई है.

यहां कई मुहल्लों में तो हर तरफ से सिल्क के काम की झलक और आवाज़ सुनाई देती थी लेकिन आज इसकी रोनक कम हो गई है.

रंग-बिरंगे कपड़ों और सूत से चमकने वाले भागलपुर के कई इलाक़ों को यह लड़ाई घायल कर रही है.

भागलपुर के सिल्क उद्योग का सालाना कारोबार फ़िलहाल घटकर डेढ़ हज़ार करोड़ रुपये का हो गया है. इसमें सात सौ करोड़ का माल भारत में ही बिकता है.

अलीम अंसारी के मुताबिक़ युद्ध से पहले यहां से एक हज़ार करोड़ रुपये का माल निर्यात होता था, जबकि अभी यह साढ़े सात सौ करोड़ का रह गया है.

कोविड ने भी तोड़ दी थी कमर

भागलपुर

भागलपुर में नाथनगर, चंपानगर, हसनाबाद, नरता, गढ़कछारी, मुजाहिदपुर, खंजरपुर, लोदीपुर और बाक़ी कई इलाक़ों तक सिल्क उद्योग फैला हुआ है.

लेकिन रूस-यूक्रेन जंग की वजह से यहां कइयों का कारोबार मंद पड़ा है. यहां के बुनकरों के हाथ धीमें चल रहे हैं और मशीनें सुस्त पड़ी हैं.

सिल्क के कारोबार से जुड़े मोहम्मद हिकमतुल्लाह ने बीबीसी को बताया, “पहले औसतन पांच हज़ार तक का काम हो जाता था लेकिन रूस और युक्रेन की लड़ाई शुरू होते ही दो हज़ार की कमाई भी मुश्किल से हो पाती है. पार्टी से काम नहीं मिल पा रहा है और हमारा धंधा 50 फ़ीसदी तक ख़राब हो गया है.”

दरअसल एक्सपोर्ट के माल में मुनाफ़ा थोड़ा ज़्यादा होता है. इसलिए उसके प्रभावित होने से लोगों की कमाई पर इसका सीधा असर पड़ा है.

भागलपुर सिल्क उद्योग के लिए कॉटन ज़्यादातर भारत के दक्षिणी राज्यों से आता है और ढुलाई की वजह से यह दक्षिणी राज्यों के मुक़ाबले महंगा हो जाता है.

इसलिए जो चीज़ भागलपुर के सिल्क उद्योग को बाक़ी राज्यों से अलग करती है वो है यहां के बुनकरों का हुनर. इसी हुनर की बदौलत भागलपुर के सिल्क उद्योग के प्रोडक्ट की मांग अब भी बरक़रार है.

दक्षिणी राज्यों में कपास कम कीमत पर मिल जाने से वहां के बुनकरों को मज़दूरी के तौर पर ज़्यादा कमाई हो जाती है. लेकिन प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए भागलपुर के बुनकरों को अपनी कमाई पहले से ही कम करनी पड़ी है.

हाल के बरसों में पहले जीएसटी ने यहां कच्चे माल की कीमतों को बढ़ा दिया है और फिर कोविड महामारी के दौरान भी यह उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुआ.

दरअसल कोविड के दौरान दुनिया के कई देशों ने भागलपुर से सिल्क मंगाना बंद कर दिया था. उस दौरान मांग की कमी की वजह से ऐसा हुआ था.

सिल्क उद्योग इस सबसे बाहर निकल ही रहा था कि रूस-यूक्रन युद्ध ने उसे जकड़ लिया है. ऐसे में सिल्क उद्योग के ऊपर एक बार फिर से संकट के बादल मंडराने लगे हैं.

मोहम्मद मुजम्मिल ख़ुद बुनकर भी हैं और कपड़े तैयार कर इसका व्यवसाय भी करते हैं. उनका कहना है कि युद्ध का इस कारोबार पर बुरा असर पड़ा है और दिन रात मेहनत करके भी चार-पांच सौ रुपए की कमाई नहीं हो पाती है.

फिलहाल युद्ध के माहौल और इसके अंत को लेकर किसी को कोई अंदाज़ा नहीं है. इसलिए यहां के कारोबारियों को नया माल बनाने के कई ऑर्डर नहीं मिल रहे है.

यहां सूत बनाने के काम से लेकर इसे रंगने और कपड़े तैयार करने वाले तक भी असमंजस में हैं. जब तक युद्ध नहीं रुकता, जब तक यूक्रेन और इसके आस पास के देशों से मांग नहीं आती है तब तक यहां से निर्यात का एक बड़ा हिस्सा भी अटका ही रहेगा.

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