सऊदी अरब के शाह फ़ैसल की कहानी जिनकी उनके भतीजे ने की थी हत्या - विवेचना

शाह फ़ैसल हाथ उठाए हुए

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इमेज कैप्शन, शाह फ़ैसल जो 'सामंतवाद का सहारा लेते हुए अपने देश को कई झंझावातों से उबार ले गए थे'
    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी
  • पढ़ने का समय: 11 मिनट

अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने अपनी आत्मकथा 'इयर्स ऑफ़ रिन्युअल' में लिखा था, "शाह फ़ैसल उन बारीक समझ वाले राजनेताओं में से थे जो सामंतवाद का सहारा लेते हुए अपने देश को कई झंझावातों से उबार ले गए थे. मैं उनका बहुत सम्मान करता था और उनके लिए मेरे मन में बहुत स्नेह था."

उनकी हत्या से एक सप्ताह पहले किसिंजर ने रियाद में उनके महल में उनके साथ पुदीने वाली चाय पी थी.

जब 69 वर्ष की उम्र में शाह फ़ैसल की हत्या हुई तो वह न सिर्फ़ सऊदी अरब की तेल समृद्धि के कारण दुनिया के सबसे रईस आदमियों में से एक थे बल्कि शायद दुनिया के आखिरी पूर्ण सम्राट थे और अरब देशों में परंपरावाद की सबसे ताक़तवर आवाज़ थे.

जेम्स एड्मंड्स शाह फ़ैसल की जीवनी 'किंग फ़ैसल अ लाइफ़' में लिखते हैं, "अपनी दौलत और ताक़त के वावजूद फ़ैसल सादा और संयमी जीवन जीने में यकीन करते थे. वह कुरान में लिखी बातों पर चलते थे और एक परंपरावादी अरब क़बायली व्यक्ति जैसा जीवन बिताते थे."

"वह न तो धूम्रपान करते थे और न ही शराब पीते थे. दिन में पांच बार नमाज़ पढ़ते थे और हमेशा जनता के बारे में सोचा करते थे. उन्होंने आधुनिक युग में भी हर सप्ताह अपने लोगों से मिलने की परंपरा जारी रखी थी."

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शाह फ़ैसल (दाएं) तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर के साथ

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24 वर्ष की उम्र में बने विदेश मंत्री

शाह फ़ैसल की शख़्सियत में दयालुता और कठोरता का अद्भुत मिश्रण था.

गेराल्ड डे गोरी अपनी किताब 'फ़ैसल किंग ऑफ़ सऊदी अरबिया' में लिखते हैं, "एक बार शाह फ़ैसल के एक सहयोगी ने उनसे पूछा, आप उन लोगों की तारीफ़ क्यों नहीं करते जिन्होंने आपके लिए काफ़ी काम किया है?"

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शाह ने इसका मुंहफट जवाब देते हुए कहा था, "यह तो उनका कर्तव्य है."

गोरी लिखते हैं, "शाह फ़ैसल को अरब मूल्यों से हमेशा लगाव रहा. उन्होंने इस बात की पूरी कोशिश की कि बाहरी प्रभाव उनके देश को भ्रष्ट न कर सकें."

सऊद परिवार का देश पर शासन 150 सालों से अधिक समय से चल रहा है लेकिन 1891 में उनके परिवार को मज़बूत क़बीलों ने सत्ता से बेदख़ल कर दिया था. सन 1901 में इब्न सऊद के नाम से मशहूर फ़ैसल के पिता ने कुवैत से बाहर आकर एक बार फिर सत्ता पर काबिज़ होने की कोशिश शुरू कर दी.

आख़िरकार 45 हज़ार बद्दू क़बायलियों ने जॉर्डन के शाह के परदादा शरीफ़ हुसैन को हराकर मक्का पर कब्ज़ा कर लिया. इब्न सऊद के 36 बेटे थे लेकिन फ़ैसल को वह शुरू से पसंद करते थे.

इसकी वजह यह थी कि फ़ैसल में हमेशा से ही एक तरह का जुझारूपन और अपने पिता के आदेशों को पूरा करने की ललक थी.

इब्न सऊद ने एक बार अपने बेटे फ़ैसल के बारे में कहा था, "काश मेरे पास फ़ैसल जैसे तीन और बेटे होते."

सऊद ने कई बार फ़ैसल को कूटनीतिक मिशनों पर विदेश भेजा और बाद में सिर्फ़ 24 साल की उम्र में उन्हें अपना विदेश मंत्री भी नियुक्त किया.

शाह फ़ैसल

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इमेज कैप्शन, शाह फ़ैसल ने बंदूक़ और तलवार चलाने का हुनर भी सीखा

धर्मनिष्ठ लेकिन मज़ाकिया शख़्स

फ़ैसल को बचपन में कोई औपचारिक शिक्षा नहीं दी गई लेकिन उन्होंने कुरान को शब्दश: याद कर लिया था. उन्होंने बंदूक़ और तलवार चलाने का हुनर भी सीखा.

जेफ़री रॉबिन्सन लिखते हैं, "फ़ैसल एक धर्मनिष्ठ इंसान थे. उनका स्वास्थ्य कभी भी अच्छा नहीं रहा. उनके पेट में अल्सर थे जिनकी वजह ने उन्हें रात में मुश्किल से नींद आती थी. वह एक शरीफ़ आदमी थे जिन्हें किसी पर चिल्लाते या कोई ग़लत बात करते हुए नहीं सुना गया. अगर उन्हें कोई चीज़ पसंद नहीं आती थी तो वह कुछ कहने के बजाए अपना चेहरा घुमा लिया करते थे."

बाहरी रूप से कठोर दिखने के बावजूद निजी जीवन में वो एक मज़ाकिया शख़्स थे.

रॉबिन्सन लिखते हैं, "वह अंग्रेज़ी नहीं बोलते थे लेकिन इतनी अंग्रेज़ी समझते थे कि कई बार जब उनका दुभाषिया ग़लत तर्जुमा करता था तो वह उसे दुरुस्त करते थे. हालांकि उन्होंने पूरी दुनिया घूमी थी लेकिन वह अपने देश में ही सहज महसूस करते थे."

शाह फ़ैसल

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इमेज कैप्शन, शाह फ़ैसल ने सऊदी अरब में अमेरिका के तेल ऑपरेशन से मिलने वाली रॉयल्टी का इस्तेमाल अपने नागरिकों की आर्थिक बेहतरी के लिए किया

1964 में बने सऊदी अरब के शाह

सन 1953 में इब्न सऊद का निधन हो गया. उसके बाद उनके बेटे सऊद सऊदी अरब के शाह बने और फ़ैसल को क्राउन प्रिंस नियुक्त किया गया.

शाह सऊद फ़िज़ूलख़र्ची के लिए मशहूर थे. नतीजा यह हुआ कि सन 1964 तक उनके देश पर बहुत अधिक विदेशी कर्ज़ हो गया. तब सऊदी अरब के राजपरिवार ने उन्हें देश से बाहर जाने के लिए मजबूर कर दिया और फ़ैसल को देश का नया शाह नियुक्त किया गया. सऊद पहले बेरूत गए, फिर वहां से काहिरा और उसके बाद एथेंस जहां उन्होंने बसने का फ़ैसला किया.

फ़ैसल ने अपने भाई के कर्ज़ को बहुत जल्द उतार दिया. साथ ही, उन्होंने सऊदी अरब में अमेरिका के तेल ऑपरेशन से मिलने वाली रॉयल्टी का इस्तेमाल अपने नागरिकों की आर्थिक बेहतरी के लिए किया.

जेम्स एडमंड्स लिखते हैं, "जल्द ही सऊदी अरब के नागरिकों को मुफ़्त मेडिकल सुविधा और शिक्षा दी जाने लगी. उन्होंने अपने आठ बेटों को पढ़ने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन के कॉलेजों में भेजा और वहां से वापस लौटने पर उन्हें सरकारी नौकरियां दीं."

पुराने विचारों वाले आलिमों के विरोध के बावजूद उन्होंने ग़ुलामी की प्रथा समाप्त की.

एडमंड्स लिखते हैं, "उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल के दरवाज़े खोले और देश में टेलीविज़न की शुरुआत की. लेकिन इसके साथ ही उन्होंने देश का शासन शरिया क़ानूनों के अनुसार चलाया. व्यभिचार और शराब पीने वालों को कड़ी सज़ाएं दीं, और सार्वजनिक जगहों पर सज़ा-ए-मौत देना पहले की तरह जारी रखा."

जेम्स एडमंड्स की किताब का कवर

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मिस्र के नासिर से होड़

मुस्लिम धार्मिक स्थलों मक्का और मदीना के संरक्षक के तौर पर इस्लाम में आध्यात्मिक नेतृत्व का शाह फ़ैसल का दावा हमेशा मज़बूत रहा. लेकिन उस ज़माने में जब मिस्र, इराक़ और लीबिया में बादशाहों का तख़्तापलट किया जा रहा था, अरब देशों के राजनीतिक नेतृत्व की शाह फ़ैसल की महत्वाकांक्षा को मिस्र के राष्ट्रपति जमाल अब्दुल नासिर की तरफ़ से बड़ी चुनौती मिली थी.

गेराल्ड डे गोरी लिखते हैं, "जब यमन के इमाम बद्र को एक सैनिक विद्रोह में हटा दिया गया तो नासिर ने नए शासन की मदद के लिए मिस्र से सैनिक भेजे. फ़ैसल ने यमन के राजशाही समर्थक लोगों को बढ़ावा दिया. अंतत: इमाम बद्र ने सत्ता पर अपना दावा वापस ले लिया और विद्रोहियों की जीत हुई लेकिन नासिर को बड़ा सैनिक नुकसान उठाना पड़ा. युद्ध की कीमत ने मिस्र को करीब-करीब दिवालिया बना दिया."

लेकिन 1967 के छह दिन के अरब-इसराइल युद्ध के बाद जब ख़ार्तूम सम्मेलन में मिस्र और दूसरे सीमावर्ती देशों की मदद जारी रखने का फ़ैसला किया गया तो फ़ैसल की भूमिका बदल गई.

शाह फ़ैसल ने इसराइल से लड़ रहे अरब देशों को बड़ी आर्थिक सहायता देने का बीड़ा उठाया.

इसराइल के ख़िलाफ़ उनकी कटुता बढ़ती चली गई. अतिवाद के ख़िलाफ़ अपने खुले विरोध के बावजूद उन्होंने यासिर अराफ़ात और फ़लस्तीनी मुक्ति संगठन का पूरा समर्थन किया.

1973 के योम किप्पुर युद्ध के बाद शाह फ़ैसल ने अमेरिका को तेल निर्यात करने पर प्रतिबंध लगा दिया और तेल को हथियार की तरह इस्तेमाल किया. उसके बाद दूसरे अरब देशों ने भी अमेरिका को तेल भेजना बंद कर दिया था.

शाह फ़ैसल को 1973 में इसराइल पर किए जाने वाले मिस्री हमले की जानकारी थी. अगस्त, 1973 में जब अनवर सादात सऊदी अरब आए थे तो उन्होंने शाह से अकेले में लंबी बातचीत की थी.

जेफ़री रॉबिन्सन अपनी किताब 'यमनी, द इनसाइड स्टोरी' में लिखते हैं, "उस यात्रा में सादात के साथ सऊदी अरब गए वहां के योजना मंत्री हिशम नाज़ेक से सादात ने कहा था, 'शाह फ़ैसल से मिलने के बाद हमेशा लगता है कि कंधे से कोई बोझ उतर गया है."

1974 में टाइम पत्रिका ने उन्हें 'मैन ऑफ़ द इयर' घोषित किया.

टाइम ने अपने 6 जनवरी, 1975 के अंक में लिखा, "फ़ैसल का निजी जीवन उनके अपने लोगों के मुक़ाबले सादा था. उनको विलासिता कभी पसंद नहीं रही. जब वह शाह बने तो उन्होंने ऐलान किया कि जेद्दा में उनके भाई का हमरा महल उनके लिए कुछ ज़्यादा ही आलीशान है. उन्होंने आदेश दिया कि हम इसका इस्तेमाल अपने मेहमानों के लिए करेंगे."

"फ़ैसल का भोजन बहुत फीका हुआ करता था. उसमें चावल की बहुतायत होती थी क्योंकि अलसर के लिए उनके कई ऑपरेशन हो चुके थे. वह दिन में 16 घंटे काम करते थे इसलिए उनके पास निजी जीवन के लिए समय नहीं होता था."

शाह फ़ैसल (बाएं) मिस्र के राष्ट्रपति जमाल अब्दुल नासेर (दाएं) के साथ

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भतीजे ने चलाई तीन गोलियां

25 मार्च, 1975 को कुवैत के तेल मंत्री अब्दुल मुतालेब काज़िमी रियाद में थे. सऊदी अरब के तेल मंत्री अहमद ज़की यमनी को ज़िम्मेदारी दी गई थी कि वह उन्हें और उनके दल को सुबह साढ़े दस बजे शाह फ़ैसल से मिलवाने ले जाएं. ठीक 10 बजकर 25 मिनट पर शाह फ़ैसल अपने एक अंगरक्षक के साथ कमरे में दाख़िल हुए.

यमनी ने कुवैती तेल मंत्री को शाही चीफ़ ऑफ़ प्रॉटोकोल के पास छोड़ा और वह शाह फ़ैसल से अकेले में बातचीत करने के लिए चले गए. तभी कमरे का दरवाज़ा खुला और चीफ़ ऑफ़ प्रोटोकोल ने कुवैती मेहमान को कमरे में दाख़िल करवाया.

शाह फ़ैसल ने काज़िमी का स्वागत किया. तभी फ़ैसल इब्न मुसैद ने तेज़ी से शाह फ़ैसल की तरफ़ दौड़ना शुरू कर दिया. वह शाह फ़ैसल का भतीजा था.

जेफ़री रॉबिन्सन अपनी किताब 'यमनी, द इनसाइड स्टोरी' में लिखते हैं, "वह व्यक्ति दौड़ता हुआ शाह और काज़िमी से दो फ़ीट की दूरी तक पहुंच गया. तभी उसने अपनी पोशाक से .38 बोर की पिस्टल निकाली और उसने शाह फ़ैसल पर गोली चलानी शुरू कर दी."

"उस समय समय था 10 बजकर 32 मिनट. उसने तीन बार गोली चलाई. शाह नीचे गिर गए. शाह के अंगरक्षक ने गोली चलाने वाले शख़्स को पकड़ लिया. उसका हाथ उसकी कलाई पर था जिसकी वजह से उसकी पिस्टल का रुख़ छत की तरफ़ हो गया. उसकी पिस्टल से एक गोली और निकली और वह छत में जा लगी."

तभी वहां और अंगरक्षक पहुंच गए और उन्होंने हत्यारे पर काबू कर लिया. सभी लोगों ने क़ालीन पर गिरे शाह फ़ैसल को घेर लिया. उनके सिर से खून निकल रहा था. फ़ौरन एक एंबुलेंस बुलाई गई और शाह फ़ैसल को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया.

थोड़ी देर बाद रियाद रेडियो ने घोषणा की शाह फ़ैसल का निधन हो गया है.

शाह फ़ैसल

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इमेज कैप्शन, शाह फ़ैसल की मृत्यु के कुछ घंटों के अंदर क्राउन प्रिंस ख़ालेद को सऊदी अरब का नया शाह बनाया गया

शुरुआती रिपोर्ट में कहा गया कि हत्यारा मानसिक रूप से विक्षिप्त है.

शाह फ़ैसल की मृत्यु के कुछ घंटों के अंदर क्राउन प्रिंस ख़ालेद को सऊदी अरब का नया शाह बनाया गया और गृह मंत्री फ़हद को नया क्राउन प्रिंस नियुक्त किया गया.

नए शाह ने ख़ुद हत्यारे से पूछताछ की. शाह की मृत्यु के बाद न्यूयॉर्क टाइम्स ने मुसैद के एक दोस्त को कहते बताया, "मुसैद अक्सर कहा करता था कि उसका परिवार सऊदी अरब की प्रगति में बाधक है. उसने मुझसे कई बार कहा था सऊदी शाही परिवार सिर्फ़ अमेरिका के तेल हितों को साधने में दिलचस्पी रखता है."

बाद में शेख़ यमनी ने एक इंटरव्यू में बताया, "जब 1976 में कार्लोस ने ओपेक तेल मंत्रियों का अपहरण किया था तो उसने मुझे बताया था कि वह शाह के भतीजे को जानता था."

"वह उसकी अमेरिकी गर्लफ़्रेंड के साथ मज़ाक किया करता था कि वह इस प्रतिक्रियावादी के साथ क्यों घूम रही है? उस गर्लफ़्रेंड ने उससे कहा था कि मुसैद प्रतिक्रियावादी नहीं है. वह जल्दी ही कुछ ऐसा करने वाला है जिससे वह हीरो बन जाएगा."

सऊदी अरब के तत्कालीन तेल मंत्री शेख यमनी

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मुसैद को मौत की सज़ा

18 जून को मुसैद को रियाद के मुख्य चौराहे पर गवर्नर के महल के सामने ले जाया गया. वहां हज़ारों लोग खड़े थे. शहज़ादे मुसैद ने सफ़ेद कपड़े पहन रखे थे. उसकी आँखों पर पट्टी बंधी हुई थी.

जुआन दे ओनीस ने न्यूयॉर्क टाइम्स के 19 जून, 1975 के अंक में लिखा, "10 हज़ार लोगों की भीड़ के सामने 27 वर्षीय हत्यारे फ़ैसल बिन मुसैद बिन अब्दुल अज़ीज़ को घुटनों के बल बैठाया गया. इससे पहले जब उसे चौराहे पर ले जाया जा रहा था तो वह बिल्कुल चुप था. जल्लाद ने तलवार से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया."

उस समय दोपहर के साढ़े चार बज चुके थे. इससे पहले एक धार्मिक अदालत ने उसे मौत की सज़ा सुनाई थी जिसको मृत शाह फ़ैसल के भाई और वर्तमान शाह ख़ालेद ने अपनी मंज़ूरी दी थी.

मौत की सज़ा देने से पहले वहां उपस्थित भीड़ के सामने अदालत के आदेश को पढ़कर सुनाया गया जिसने ताली बजाकर उसका स्वागत किया.

यह मृत्यु दंड शाह फ़ैसल के छोटे भाई और रियाद के गवर्नर शहज़ादे सलमान के सामने दिया गया. शाही परिवार के वह ही अकेले सदस्य थे जिन्होंने इस मृत्यु दंड को दिए जाते हुए देखा.

शाह फ़ैसल का हत्यारा फ़ैसल बिन मुसैद बिन अब्दुल अज़ीज़ (दाहिने)

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मुसैद को अमेरिका में किया गया था गिरफ़्तार

मृत्यु दंड दिए जाने से पहले फ़ैसल बिन मुसैद की पृष्ठभूमि की पूरी छानबीन की गई.

जांचकर्ताओं ने पता लगाया कि सन 1969 से 1973 तक अमेरिका में पढ़ने के दौरान उसे प्रतिबंधित दवा एलएसडी बेचने के आरोप में गिऱफ़्तार किया गया था. कुछ समय के लिए बेरूत में उसका मनोवैज्ञानिक उपचार भी किया गया था.

उसको जब सऊदी सरकार ने आठ लाख बारह हज़ार डॉलर का वार्षिक भत्ता दिया था तो उसे उसने लेने से इनकार कर दिया था.

वह इस बात पर भी नाराज़ था कि सऊदी प्रशासन ने उसे विदेश जाने के लिए पासपोर्ट जारी करने से इनकार कर दिया था. इसके पीछे अमेरिका में उसकी गिरफ़्तारी को कारण बताया गया था.

इस बात की भी अटकलें थीं कि मुसैद ने अपने भाई की हत्या का बदला लेने के लिए शाह की हत्या की थी.

नौ वर्ष पूर्व मुसैद के भाई फ़ैसल पुलिस की कार्रवाई में मारे गए थे, वह सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ हुए एक विरोध प्रदर्शन में हिस्सा ले रहे थे जिस पर पुलिस ने गोलियां चलाई थीं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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