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ऋषभ पंत अपनी चोट ठीक करने के लिए किस थेरेपी का सहारा ले रहे हैं?
मार्च के आख़िर में शुरू होने जा रहे आईपीएल 2026 से पहले भारतीय विकेटकीपर और बल्लेबाज़ ऋषभ पंत हाइपरबेरिक ऑक्सीजन थेरेपी ले रहे हैं.
बीते साल जुलाई महीने में भारत-इंग्लैंड टेस्ट सिरीज़ के दौरान ऋषभ पंत को पैर में गंभीर चोट लग गई थी. इस दौरान फिजियो के कंधे पर हाथ रखकर एक पैर के सहारे मैदान से बाहर का उनका वीडियो काफी चर्चा में रहा था. उससे पहले लॉर्ड्स टेस्ट की पहली पारी में विकेटकीपिंग करते हुए उनकी बाएं हाथ की उंगली पर चोट लग गई थी.
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, मैच के दौरान एक के बाद एक लगी इन्हीं चोटों और आईपीएल में बमुश्किल एक महीना बचे होने के कारण ऋषभ पंत ने हाइपरबेरिक ऑक्सीजन थेरेपी लेनी शुरू की है.
पर आईपीएल में वापसी के लिए पंत जिस थेरेपी का सहारा ले रहे हैं, वो है क्या? ये कितना कारगर है और किन परिस्थितियों में ली जाती है. यही समझने के लिए हमने बीएचयू के इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ में ट्रॉमा सेंटर के प्रोफ़ेसर डॉ सौरभ सिंह से बात की.
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हाइपरबेरिक ऑक्सीजन थेरेपी क्या है?
हाइपरबेरिक दो शब्दों से मिलकर बना है - हाइपर और बेरिक.
हाइपर का मतलब है सामान्य से ज़्यादा और बेरिक का मतलब है दबाव. दोनों को जोड़कर बनता है हाइपरबेरिक और जिसका मतलब है एक ऐसा वातावरण, जहां हवा का दबाव सामान्य से ज़्यादा होता है. वहीं हाइपरबेरिक ऑक्सीजन थेरेपी एक ऐसा इलाज, जहां मरीज़ को सामान्य से ज़्यादा मात्रा में ऑक्सीजन दी जाती है, ताकि रिकवरी जल्दी हो.
विज्ञान के अनुसार, हमारे वातावरण में 78 प्रतिशत नाइट्रोजन और 21 प्रतिशत ऑक्सीजन है.
लेकिन इस थेरेपी में मरीज़ को सौ फ़ीसदी शुद्ध ऑक्सीजन दी जाती है और यह ऑक्सीजन एक विशेष दबाव वाले चैंबर में दी जाती है, जहां हवा का दबाव सामान्य से 2 से 3 गुना ज़्यादा होता है. जब दबाव ज़्यादा होता है, तो आपके फेफड़े सामान्य से कहीं अधिक ऑक्सीजन को अपने अंदर ले पाते हैं.
यह अतिरिक्त ऑक्सीजन खून के ज़रिए शरीर के उन हिस्सों तक पहुंचती है जहां चोट, घाव या संक्रमण होता है.
डॉ सौरभ बताते हैं कि इससे शरीर के टिश्यू या वो हिस्सा जहां चोट लगी है, जल्दी रिकवर होते हैं क्योंकि इन हिस्सों तक ऑक्सीजन की सप्लाई ज़्यादा होने लगती है. शरीर में नई कोशिकाएं बनने की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है.
पश्चिमी देशों में इसे पहले फेफड़े से जुड़ी समस्याओं के मामले में इस्तेमाल में लाया जाता था.
वह कहते हैं, ''हाइपरबेरिक ऑक्सीजन थेरेपी एक विकसित हो रही साइंस है, जिसमें लगातार शोध हो रहा है. अभी तक सीमित क्षेत्रों में ही इसका इस्तेमाल किया जा सकता था, जैसे पश्चिमी देशों में पहले इसकी मदद केवल फेफड़ों से जुड़ी समस्याओं के मामले में ली जाती थी लेकिन बीते कुछ सालों में दूसरी कई समस्याओं में इस थेरेपी को डॉक्टर या मरीज़ ऑप्ट कर रहे हैं.''
कितना कारगर?
डॉ. सौरभ के मुताबिक, यह थेरेपी काफ़ी सकारात्मक नतीजे दे रही है. उनका कहना है कि शरीर के जिन हिस्सों में कोशिकाएं तेज़ी से बनती और टूटती हैं...जिसे हाई टिश्यू टर्नओवर कहते हैं और जहां ठीक होने के लिए ज़्यादा ऑक्सीजन की ज़रूरत होती है, वहां यह इलाज खास तौर पर असरदार साबित हो रहा है.
वह कहते हैं, ''अगर किसी को दिखाई देना बंद हो जाए, रेडिएशन से टिश्यू को नुकसान हो गया हो, ख़ून की बहुत ज़्यादा कमी के केस में, स्किन ग्राफ्टिंग के लिए (शरीर के किसी हिस्से की ख़राब त्वचा को हटाकर दूसरी जगह की त्वचा लगाने की प्रक्रिया), शरीर के किस्से हिस्से पर गंभीर चोट या हड्डियों या त्वचा में गंभीर संक्रमण के मामले में इस थेरेपी की मदद ली जा सकती है.
इसी के साथ जलने के कारण त्वचा या टिश्यू को हुए नुकसान में, ऑस्टियोमायलाइटिस यानी हड्डी के गंभीर संक्रमण में, यहां तक कि सुनने की क्षमता कम होने पर भी इसका प्रयोग हो रहा है.''
थेरेपी कितनी किफ़ायती?
डॉ सौरभ से हुई बातचीत के अनुसार, भारत में ऐसे सेंटर या स्पेशलिस्ट की तादाद बहुत कम हैं, जो इस थेरेपी की सुविधा उपलब्ध कराते हैं. रहा सवाल किफ़ायती होने का तो सरकारी सेंटर्स में यह फ्री ऑफ़ कॉस्ट यानी मुफ़्त है. पर क्योंकि डिमांड बहुत ज़्यादा बढ़ गई है इसलिए बीएचयू सेंटर में प्रति सेशन मरीज़ से सौ रुपये लिए जाते हैं.
वहीं प्राइवेट सेंटर में प्रति सेशन ढ़ाई हज़ार से चार हज़ार रुपये लिए जाते हैं. सेशन कितना लंबा चलेगा ये आपकी चोट या समस्या पर निर्भर करता है लेकिन औसतन हर सेशन 45 मिनट से लेकर डेढ़ घंटे का होता है.
हर सेशन से पहले डॉक्टर मरीज़ का बीपी चेक करते हैं. यह सुनिश्चित करना अनिवार्य होता है कि कहीं मरीज़ को हाइपरटेंशन या क्लॉस्ट्रोफ़ोबिया (बंद या तंग जगहों में घुटन महसूस होना) तो नहीं है.
कॉस्मेटोलॉजी में भी इस्तेमाल
इंटरनेट पर ऐसी कई रिपोर्ट्स मौजूद हैं जहां बढ़ती उम्र के कारण चेहरे पर नज़र आने वाले साइन्स को कम करने के लिए भी लोग इस थेरेपी का इस्तेमाल करते नज़र आते हैं. कई ब्यूटी या वेलनेस सेंटर भी इसकी सुविधा मुहैया कराते हैं, पर क्या ये वाकई सुरक्षित तरीका है?
इस सवाल के जवाब में डॉ सौरभ कहते हैं, ''दरअसल इसका कोई प्रूफ़ नहीं है कि इस थेरेपी को लेने के बाद आपकी त्वचा जवान नज़र आने लगती है. हाइपरबेरिक ऑक्सीजन थेरेपी के कुछ ऐसे उपयोग भी किए जा रहे हैं जिन्हें आधिकारिक मंज़ूरी नहीं मिली है. कई मेडिकल स्पा या वैकल्पिक चिकित्सा केंद्र दावा करते हैं कि यह थेरेपी बढ़ती उम्र से जुड़े लक्षणों और अन्य कई समस्याओं के इलाज में मदद करती है, लेकिन इन तरीकों को आधिकारिक रूप से स्वीकृति नहीं मिली है. कुछ लोगों ने यह भी कहा है कि थेरेपी के बाद उनके चेहरे पर निखार या चमक दिखी, लेकिन ये सिर्फ व्यक्तिगत अनुभव और ऑब्ज़र्वेशन्स हैं. इन दावों को लेकर पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं.''
बहरहाल, ऋषभ पंत और उनके जैसे दूसरे खिलाड़ी चोट से जल्द रिकवरी के लिए इस थेरेपी का सहारा ले रहे हैं.
साल 2022 में दिल्ली से रुड़की जाते समय ऋषभ पंत एक गंभीर सड़क हादसे का शिकार हो गए थे. चोटें इतनी गंभीर थीं कि आशंका जताई गई थी उन्हें दो से तीन साल तक मैदान पर वापसी करने में कठिनाई हो सकती है.
पर पंत ने साल 2024 में न केवल अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में वापसी की, बल्कि धमाकेदार वापसी की.
लेकिन खेल के दौरान चोट लगने का सिलसिला रुका नहीं, यही कारण है कि अब हाइपरबेरिक ऑक्सीजन थेरेपी की मदद से वह जल्द से जल्द मैदान में वापसी करने की कोशिश में जुटे हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.