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मतदाता सूची पर विवाद क्या बदल देगा पश्चिम बंगाल में चुनाव का खेल?
- Author, शुभज्योति घोष
- पदनाम, बीबीसी न्यूज बांग्ला, दिल्ली
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
भारत की संघीय लोकतांत्रिक प्रणाली में चुनाव एक नियमित प्रक्रिया है. हर पांच साल के बाद देश में संसदीय चुनाव तो होते ही हैं. इसके अलावा लगभग हर साल किसी न किसी राज्य में विधानसभा चुनावों का आयोजन अब एक रूटीन बन गया है.
इतिहास गवाह है कि यह चुनाव कभी विकास तो कभी सत्तारूढ़ पार्टी के भ्रष्टाचार, कभी जात-पात और संरक्षण और कभी प्याज की बढ़ती कीमतों के मुद्दे पर होते रहे हैं.
लेकिन भारतीय लोकतंत्र के लंबे इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब एक विधानसभा चुनाव में मतदाता सूची के संशोधन के मुद्दे पर होने वाला विवाद ही सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है.
पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची के संशोधन की प्रक्रिया पर होने वाले विवाद ने तमाम मुद्दों को पीछे छोड़ दिया है.
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चुनाव आयोग ने इस प्रक्रिया को औपचारिक तौर पर स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर का नाम दिया है.
चुनाव आयोग ने शनिवार (28 फरवरी) को जो मतदाता सूची प्रकाशित की है उसमें पहले हटाए गए 58 लाख वोटरों के अलावा और 60 लाख लोगों के नाम 'अंडर एडजुडिकेशन' यानी विचाराधीन हैं. इसके अलावा पांच लाख और नाम भी सूची से हटा दिए गए हैं.
इन 60 लाख वोटरों में से करीब एक तिहाई नाम राज्य के दो मुस्लिम बहुल ज़िलों, मालदा और मुर्शिदाबाद से हैं.
चुनाव आयोग के सूत्रों से पता चला है कि जिन लोगों के नाम विचाराधीन श्रेणी में हैं उनमें से किसी ने भी कोई जरूरी दस्तावेज जमा नहीं किया है.
ऐसे में इस बात की संभावना बेहद कम है कि ऐसे लोग सही दस्तावेज जमा कर अपना नाम मतदाती सूची में बरकरार रख सकेंगे.
विश्लेषकों का कहना है कि अगर यह मान लिया जाए कि विचाराधीन श्रेणी के आधे वोटर भी सूची में नाम शामिल कराने में कामयाब रहते हैं तो भी एक करोड़ से भी ज्यादा नाम कट जाएंगे.
पश्चिम बंगाल में हर चुनाव में पिछले चुनाव के मुकाबले वोटरों की संख्या तेजी से बढ़ती रही है. लेकिन इस बार एक झटके में एक करोड़ से ज्यादा वोटर कम होना एक अभूतपूर्व घटना होगी. इसी वजह से इस समय बंगाल की राजनीति में उठापटक तेज हो रही है.
एसआईआर का राजनीतिक समीकरण क्या है?
एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान अपना और अपने परिवार के सदस्यों के नाम मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए आम लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा है.
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिका पर खुद सुप्रीम कोर्ट में बहस कर चुकी हैं.
उन्होंने चुनाव आयोग को बीजेपी का दलाल कहते हुए सीधा टकराव मोल लिया है.
उनके इन कदमों से साफ़ है कि एसआईआर के कारण लोगों को हुई भारी परेशानी को ही अगले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस अपना सबसे बड़ा हथियार बनाएगी.
टीएमसी के नेताओं को भरोसा है कि बीते 15 साल से लगातार सत्ता में रही तृणमूल सरकार की नाकामियां, शिक्षक भर्ती घोटाला, कोलकाता के आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में युवा डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या जैसे मुद्दे अब पीछे छूट जाएंगे.
एसआईआर के कारण आम लोगों को होने वाली भारी परेशानी ने भाजपा को बैकफुट पर धकेल दिया है. इसकी वजह यह है कि यही पार्टी एसआईआर की मांग में सबसे ज्यादा सक्रिय थी.
बीजेपी नेतृत्व स्वीकार करता है कि इस असंतोष का झटका पार्टी को संभालना होगा.
लेकिन पार्टी नेतृत्व का दावा है कि मतदाता सूची से करीब एक करोड़ फर्जी या मृत वोटरों के नाम कटने से आखिर में उसे ही फायदा होगा. उनका तर्क है कि पहले यह वोट तृणमूल कांग्रेस की झोली में जाते थे.
भाजपा अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं के जरिए राज्य के हिंदू वोटरों को एकजुट होने का संदेश देने का भी प्रयास कर रही है. उसका कहना है कि कथित बांग्लादेशी और रोहिंग्या वोटरों के नाम सूची से हटा कर एक साफ-सुथरी और त्रुटिमुक्त मतदाता सूची के बिना राज्य में परिवर्तन संभव नहीं है.
यह दिलचस्प बात है कि पश्चिम बंगाल में दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियां मानती हैं कि अगर वो चुनाव जीते तो एसआईआर ही उनको जिताएगा.
तृणमूल कांग्रेस ने हिसाब लगाया है कि एसआईआर की प्रक्रिया से परेशान लोग पार्टी की तमाम गलतियों को माफ कर, एक बार फिर उसी पर भरोसा जताएंगे.
दूसरी ओर, बीजेपी को लगता है कि तृणमूल कांग्रेस के फर्जी वोटरों के बड़ी तादाद में मतदाता सूची से हटने के कारण इस बार उनकी पार्टी के ना जीतने की कोई वजह नहीं है.
यही वजह है कि विश्लेषक इस बार बंगाल विधानसभा चुनाव में एसआईआर को 'गेम चेंजर' मुद्दा मान रहे हैं.
ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति
ममता बनर्जी एसआईआर के मुद्दे पर चुनाव आयोग से शिकायत करने और सुप्रीम कोर्ट में बहस करने जब दिल्ली आई थीं तो उन्होंने एक छोटी-सी किताब हाथ में पकड़ा दी थी.
उस किताब का नाम था एसआईआर-26 इन 26.
अंग्रेजी की यह किताब ममता की लिखी 26 छोटी कविताओं का संकलन था.
उन्होंने वह किताब 'विनाश के इस खेल में जान गंवाने वाले' लोगों को समर्पित की है. अब यह कहने की जरूरत नहीं है कि विनाश के खेल से उनका मतलब एसआईआर की कवायद है.
यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि एसआईआर के काम का दबाव नहीं सह पाने के कारण अब तक कई बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) की मौत या उनके गंभीर रूप से बीमार होने के आरोप लगते रहे हैं. इसके अलावा कई बुज़ुर्ग और बीमार लोगों के भी सुनवाई की नोटिस मिलने के बाद दिल का दौरा पड़ने के आरोप हैं.
ममता बनर्जी ने बताया था कि इस साल गंगासागर मेला जाते समय उन्होंने हेलीकाप्टर में बैठे-बैठे ही उन कविताओं को लिखा था.
तृणमूल कांग्रेस एसआईआर को ही अगले चुनाव में सबसे प्रमुख या एकमात्र मुद्दा बनाना चाहती है.
ममता बनर्जी ने एसआईआर को हथियार बना कर केंद्र की राजनीति में हलचल मचाने के साथ ही चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ लगभग युद्ध का एलान कर दिया है.
अब उनकी यह रणनीति सही है या ग़लत, इसका पता तो दो महीने के भीतर ही चल जाएगा. लेकिन यह तो साफ़ हो गया है कि 2026 का चुनाव वो इसी हथियार से लड़ेंगी.
दिल्ली में ममता की प्रेस कांफ्रेंस में तृणमूल के दूसरे बड़े नेता अभिषेक बनर्जी भी उनके साथ ही थे.
वो बार-बार यह कहते रहे कि मतदाता सूची को त्रुटिमुक्त करने के प्रयास का पार्टी भी समर्थन करती है. इसलिए ऐसा नहीं है कि तृणमूल कांग्रेस एसआईआर का सीधा या बेवजह विरोध कर रही है.
लेकिन उनका सवाल था, "जिस काम को धीरे-धीरे दो साल में पूरा करना था, उसे दो महीने के भीतर इतनी हड़बड़ी में करने की क्या जरूरत थी?"
लेकिन इतनी बड़ी संख्या में वोटरों के नाम कटने से क्या तृणमूल कांग्रेस को नुकसान नहीं होगा?
पार्टी के प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती इस सवाल पर कहते हैं, "मान लेते हैं कि चार वैध वोटरों के किसी परिवार के किसी एक सदस्य का नाम बेवजह मतदाता सूची से कट जाता है. अब परिवार के बाकी तीन लोग अगर तृणमूल के वोटर नहीं भी हों तो क्या इस बार वो बीजेपी के ख़िलाफ़ नहीं जाएंगे, आप ही बताएं."
भाजपा कैसे संभालेगी यह झटका?
बीबीसी ने एसआईआर पर पैदा होने वाले विवाद के विभिन्न पहलुओं पर पार्टी के मुख्य प्रवक्ता देवजीत सरकार के साथ लंबी बातचीत की है.
पेशे से एडवोकेट इस बीजेपी नेता ने स्वीकार किया है कि एसआईआर के कारण राज्य के कई निरीह लोगों को भारी परेशानी झेलनी पड़ी है.
कई लोगों को अपने बुज़ुर्ग माता-पिता के साथ सुनवाई केंद्र में पहुंच कर घंटों इंतजार करना पड़ा है.
किसी मतदान केंद्र पर चार पीढ़ियों से वोट देने वाले लोगों को भी सब काम छोड़ कर सुनवाई के दौरान इस बात का सबूत देना पड़ा है कि वह मतदाता सूची में शामिल रहने का पात्र है.
उनका कहना था, "इसके बावजूद हमें भरोसा है कि एक त्रुटिमुक्त मतदाता सूची के हित में लोग इस सामयिक परेशानी को स्वीकार कर लेंगे."
सरकार कहते हैं, "कोलकाता के बाहरी इलाके में स्थित मिठू कॉलोनी जब रातों रात मसूद कॉलोनी बन जाती है और अवैध घुसपैठियों के कारण राज्य में डेमोग्राफ़ी बदल जाती है, तो ऐसे में एसआईआर के अलावा कोई उपाय नहीं था. हमें भरोसा है कि राज्य के जागरूक लोग इस बात को जरूर समझेंगे."
देवजीत सरकार ने इसके साथ ही एसआईआर के मुद्दे पर विवाद, देरी और भ्रम की स्थिति पैदा होने के लिए भी तृणमूल कांग्रेस को ही जिम्मेदार ठहराया है.
उनकी दलील है कि देश के जिन राज्यों में एसआईआर की कवायद हुई है उनमें सबसे ज्यादा विवाद सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही हुआ है.
देवजीत सरकार कहते हैं, "भाजपा-शासित राज्यों की बात छोड़ देते हैं. लेकिन केरल और तमिलनाडु में भी यह कवायद समय पर और सुचारू रूप से पूरी हुई है. हो सकता है वहां इसके तौर-तरीकों पर सवाल उठे हों, लेकिन उनका फौरन समाधान हो गया. लेकिन पश्चिम बंगाल में देखें तो तृणमूल कांग्रेस समर्थक डेटा एंट्री आपरेटरों के असहयोग के कारण काम आगे नहीं बढ़ सका. सत्तारूढ़ पार्टी ने जानबूझ कर मतदाता सूची के संशोधन की प्रक्रिया में बाधा पहुंचाई है."
क्या चुनाव आयोग का मतलब भाजपा है?
ममता बनर्जी ने अपने पिछले दिल्ली दौरे में मुख्य चुनाव आयुक्त पर बीजेपी का पक्ष लेने का आरोप लगाया था. उन्होंने चुनाव आयोग के सीधे बायकाट का भी एलान किया है.
लेकिन बीजेपी ने बंगाल में एसआईआर की कवायद के दौरान ढिलाई और प्रशासनिक नाकामी के आरोपों के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर भी निशाना साधा है.
पार्टी के प्रवक्ता सरकार कहते हैं, "हमने उनसे बार-बार कहा था कि दिल्ली में बैठ कर ज्ञान देने से काम नहीं चलेगा. आप बंगाल आकर जांच करें. लोगों की शिकायतों और आरोपों का समाधान करें. लेकिन उन्होंने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया."
पश्चिम बंगाल में कई लोग आयोग की नाकामी को भाजपा की नाकामी के तौर पर देख रहे हैं. भाजपा चुनाव मैदान में इस धारणा का कैसे मुकाबला करेगी?
पश्चिम बंगाल बीजेपी को उम्मीद है कि दस साल पहले नरेंद्र मोदी की ओर से की गई नोटबंदी के समय लोगों ने देश के हित में जिस तरह धैर्य के साथ कतार में खड़े रह कर परेशानी झेली थी, इस बार भी उसकी पुनरावृत्ति होगी.
लेकिन पश्चिम बंगाल में एसआईआर के बारे में हज़ारों शिकायतें सुनने को मिल रही हैं?
इस पर बीजेपी नेता का कहना था, "आप देखिएगा, ईवीएम का बटन दबाते समय लोग उन परेशानियों को भूल जाएंगे. वाम मोर्चा के 34 साल के शासन के दौरान उसकी सबसे बड़ी रैली सातवीं सरकार के कार्यकाल के आखिरी दिनों में हुई थी. तब उसमें लाखों लोग जुटे थे."
"उस समय किसी ने इस बात की कल्पना तक नहीं की होगी कि कुछ महीनों के भीतर ही उस सरकार के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य अपनी सीट पर 60 हज़ार से ज्यादा वोटों से हार जाएंगे और आठवीं वाममोर्चा सरकार का कभी गठन नहीं हो सकेगा."
बीजेपी नेताओं का कहना है कि इस बार भी ममता बनर्जी सरकार के ख़िलाफ़ लोगों के मन में इतना ज्यादा आक्रोश है कि उन्होंने 'परिवर्तन' का मन बना लिया है. उनको उम्मीद है कि एसआईआर के दौरान होने वाली परेशानियों का इस पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
कई लोगों को याद होगा कि पांच साल पहले हुए विधानसभा चुनाव के समय 'खेला होबे' नारा बेहद लोकप्रिय हुआ था. बीजेपी वह लड़ाई नहीं जीत सकी थी.
लेकिन इस बार अगर राज्य में चुनाव का खेल कोई बदल सकता है तो वह शायद एसआईआर ही है.
अब वह चाहे वो बीजेपी के पक्ष में हो या टीएमसी के.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.