असम में 'स्वदेशी मुसलमानों' के सर्वे से क्यों डरे हुए हैं 'मियां मुसलमान'? - ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, असम के धेपारगांव से बीबीसी हिंदी के लिए
"मैं बंगाली मूल का मुसलमान हूं. कुछ लोग हमें मियां मुसलमान भी कहते हैं. मुझे नहीं पता सरकार किसे स्वदेशी मुसलमान मानती है? गांव के कुछ लोग गोरिया-मोरिया मुसलमानों के सर्वे की बात कर रहें है. ये सब बातें मुसलमानों की अशांति के लिए हो रही हैं."
ये बातें काफ़ी नाराज़गी के साथ 60 साल के मोहम्मद उमर अली ने बताईं.
असम के बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र के तामुलपुर ज़िले के एक बेहद अंदरूनी गांव धेपारगांव के निवासी मोहम्मद उमर अली राजमिस्त्री का काम कर आठ लोगों का परिवार चलाते हैं. लेकिन उनके गांव में इन दिनों 'इंडिजिनस' यानी 'स्वदेशी मुसलमानों' के सामाजिक-आर्थिक सर्वे को लेकर हो रही चर्चा ने उन्हें चिंता में डाल दिया है.
वो कहते हैं, "असल में सरकार हमारे साथ क्या करना चाहती है, यह समझ नहीं आ रहा है. पहले एनआरसी में नाम शामिल करने के लिए इतनी भाग-दौड़ करनी पड़ी. अब फिर से स्वदेशी के नाम पर पता नहीं मुसलमानों से कौन सा काग़ज़ मांग लें.''
हमारा जीवन अब इन कागजों पर ही टिका है. यहां के लोग बाढ़ के समय अपनी जान बचाने से ज्यादा कागजातों को बचाकर रखने की कोशिश करते हैं.
''हमें डर इस बात का नहीं है कि काग़ज़ातों की जांच होगी लेकिन हर बार जिस कदर परेशान होना पड़ता है उससे डर लगता है. एनआरसी के समय काम-धंधा छोड़कर गांव से 80 किलोमीटर दूर जाकर काग़ज़ातों की जांच करवानी पड़ी थी.''
''हमारा जीवन अब इन काग़ज़ों पर ही टिका है. यहां के लोग बाढ़ के समय अपनी जान बचाने से ज़्यादा काग़ज़ातों को बचाकर रखने की कोशिश करते है."
कौन हैं 'स्वदेशी मुसलमान'

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दरअसल असम सरकार के कैबिनेट ने हाल ही में राज्य की स्वदेशी मुस्लिम आबादी के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण को मंज़ूरी दी है. राज्य की सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार ने डेढ़ साल पहले पांच समुदायों को 'स्वदेशी असमिया मुसलमानों' के रूप में मान्यता दी थी.
असम सरकार ने जिन पांच मुस्लिम समुदाय को स्वदेशी मुसलमान माना है, वे राज्य में गोरिया, मोरिया, जोलाह, देसी और सैयद समुदाय के तौर पर जाने जाते है. इनमें गोरिया, मोरिया, जोलाह चाय बागानों के आस-पास बसे हैं, जबकि देसी मुसलमान निचले असम में रहते हैं.
वहीं सैयद को असमिया मुसलमान माना जाता है. ऐसा दावा किया जाता है कि इन पांच समुदाय का तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से प्रवास का कोई इतिहास नहीं है.
लेकिन सरकार के इस सर्वे की बात सामने आने के बाद ख़ासकर बंगाली मूल के मुसलमानों में फिर से डर और चिंता का माहौल है. गुवाहाटी से क़रीब 62 किलोमीटर दूर धेपारगांव में मुसलमानों के करीब 500 परिवार बसे हैं, जिनमें ज़्यादातर बंगाली मूल के मुसलमान हैं.
पुथीमारी नदी से आने वाली बाढ़ ने यहां के लोगों के आशियाने कई बार उजाड़े हैं. इस गांव तक पहुंचने के लिए करीब दो किलोमीटर धूल-मिट्टी वाली जिस कच्ची सड़क से गुज़रना पड़ता है, वो इनके रोज़मर्रा के संघर्ष की गवाह है.
असम में बंगाली मूल के मुसलमानों को बोलचाल की भाषा में मियां कहकर संबोधित किया जाता है. असम में मियां मुसलमान का मतलब पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आए हुए मुसलमानों से है.
पहले कुछ लोग इन्हें चरुवा कहकर बुलाते थे तो कुछ लोग पोमपोमवा कहते थे. फिर इनके लिए मियां शब्द का इस्तेमाल होने लगा. राजनीतिक आरोपों में इन्हें आज भी 'बांग्लादेशी' कहा जाता है. यह वही मियां मुसलमान हैं जिसके बारे में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा कहते रहे हैं कि उनको मियां लोगों के वोट की ज़रूरत नहीं है.
धेपारगांव के रहने वाले 65 साल के आवेद अली भी इस सर्वे से थोड़ा चिंतित हैं. वो कहते हैं, "मुसलमानों के सर्वे का मक़सद तो नहीं पता लेकिन यह सबकुछ हमें मुसीबत में डालने के लिए किया जा रहा है. ''
''हमारा अल्लाह एक है तो इस तरह हमें बांटने का क्या मतलब हुआ? सरकार की क्या मंशा है जब कुछ पता ही ना हो तो चिंता होनी वाजिब है."
हमारा अल्लाह एक है तो इस तरह हमें बांटने का क्या मतलब हुआ? सरकार की क्या मंशा है जब कुछ पता ही ना हो तो चिंता होनी वाजिब है
मियां समुदाय से ताल्लुक रखने वाले मुजीबुर रहमान खुद को स्वदेशी मुसलमान में नहीं गिने जाने से बेहद नाराज़ हैं. 52 साल के मुजीबुर कहते है, "हम असम के मुसलमान हैं और हमारी मातृ भाषा असमिया है. फिर भी हमें स्वदेशी मुसलमानों में नहीं गिना जाता. मियां मुसलमानों को परेशान करने के लिए राजनीति हो रही है. सरकार ने एनआरसी बनाई उसे भी लागू नहीं किया. अब सर्वे के नाम पर हमें सताने की तैयारी हो रही है."
सरकार को जो सर्वे करना है करें. मुझे इससे कोई लेना-देना नहीं. हम जिस हाल में हैं,उसी में अच्छे हैं. मेरे पति मधुमेह से पीड़ित हैं. हम अब किसी भी सरकारी उलझनों में पड़ना नहीं चाहते.
51 साल की इलसिनी बेगम गौरिया समुदाय से हैं लेकिन उनकी शादी मियां मुसलमान से हुई है. अपने सात बच्चों के साथ धेपारगांव में रहने वाली इलसिनी कहती हैं, "सरकार को जो सर्वे करना है करे. मुझे इससे कोई लेना-देना नहीं. हम जिस हाल में हैं, उसी में अच्छे हैं. मेरे पति मधुमेह से पीड़ित हैं. हम अब किसी भी सरकारी उलझनों में पड़ना नहीं चाहते."
असम में सर्वे कैसे करेगी सरकार

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असम सरकार ने इन पांच उप-समूहों को स्वदेशी के रूप में पहचानने के लिए पहले छह उप-समितियों का गठन किया था. इन उप-समितियों के सिफारिशों के आधार पर समुदाय को वर्गीकृत किया गया है.
सरकार ने अल्पसंख्यक मामले और चर क्षेत्र निदेशालय को "स्वदेशी" मुसलमानों का सामाजिक-आर्थिक मूल्यांकन करने की ज़िम्मेवारी सौंपी है.
इस सर्वे को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए अल्पसंख्यक मामले और चर क्षेत्र निदेशालय के निदेशक सैयद ताहिदुर रहमान ने बीबीसी से कहा, "हमने सर्वे को लेकर सरकार को एक एसओपी अर्थात मानक संचालन प्रक्रिया बनाकर भेजी है. सरकार जैसे ही इस एसओपी को मंज़ूरी देगी, हमारी टीम सर्वे के लिए जनगणना का काम शुरू कर देगी. पहले हम किसी एक या दो ज़िले में इसकी शुरुआत करेंगे."
रहमान कहते हैं, "ये सरकार तय करेगी कि सर्वे में बंगाली मूल के मुसलमानों से बात की जाएगी या नहीं. अभी केवल स्वदेशी मुसलमानों को चिन्हित करने के लिए घर-घर जाकर सर्वे करने के कुछ तौर-तरीके तैयार किए गए है."
दरअसल मियां मुसलमानों के सर्वे की बात का ज़िक्र इसलिए आ रहा है क्योंकि स्वदेशी मुसलमानों में जैसे गौरिया, देसी समुदाय की महिलाओं की शादी मियां मुसलमानों के साथ हुई है. अगर इन लोगों की पहचान करनी होगी तो मियां मुसलमानों के यहां भी सर्वेक्षण करना होगा.
असम में 40 लाख से अधिक स्वदेशी मुसलमान

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राज्य में 1 करोड़ 7 लाख (2011 की जनगणना) मुसलमानों में 40 लाख से अधिक स्वदेशी मुसलमान बताए जाते हैं. हालांकि इन स्वदेशी मुसलमानों की संख्या को लेकर किसी के पास भी पुख्ता कोई दस्तावेज़ नहीं है. राज्य में स्वदेशी मुसलमानों का रहन-सहन, पहनावा और पहचान बंगाली मूल के मुसलमान से काफी अलग है.
जोरहाट ज़िले के मरियानी शहर में रहने वाले ज़ाकिर हुसैन (बदला हुआ नाम) बीए के छात्र हैं और वे खुद को बंगाली मूल के मुसलमानों से अलग मानते हैं. इस सर्वे को लेकर ज़ाकिर कहते हैं, "हम लोग शुरू से असमिया हैं और हमें कोई बांग्लादेशी नहीं कहता. यह सर्वे हमारी पीढ़ी के लिए ज़रूरी है. क्योंकि सर्वे के बाद स्वदेशी मुसलमानों की पहचान आसान हो जाएगी जिससे हर क्षेत्र में आगे बढ़ने का मौक़ा मिलेगा."
सदो असोम गोरिया-मोरिया-देसी जातीय परिषद के अध्यक्ष नूरुल हक की मानें तो पिछले कई दशकों से राज्य के स्वदेशी मुसलमानों के साथ अन्याय होता आ रहा है.
वो कहते हैं, "मियां मुसलमान हम लोगों को मुसलमान नहीं समझते. हमारा समुदाय असुरक्षित है. हम एक ऐसी स्थिति में हैं, जहां न तो मुसलमान हैं और न ही असमिया हैं. सरकार ने अल्पसंख्यकों के नाम पर अब तक जो भी विकास किया उसका सबसे ज्यादा फायदा मियां मुसलमानों को ही मिला है. क्योंकि बंगाली मूल के 70 लाख मुसलमान हैं इसलिए राजनीतिक ताकत उनके पास ही रही है."
नूरुल हक कहते है, "यह सर्वे केवल स्वदेशी मुसलमानों के लिए है. इसमें बंगाली मूल के मुसलमानों को शामिल नहीं किया जाएगा. मियां मुसलमानों का एक तबका खुद को जोलाह समुदाय का बताकर स्वदेशी बनने की कोशिश में लगा है. लेकिन सरकार को इन बातों पर गौर करना है."
नदी तटीय इलाकों में बंगाली मूल के मुसलमानों के बीच असमिया संस्कृति को बढ़ावा देने का काम कर रहे चर चापोरी परिषद के अध्यक्ष डॉक्टर हाफ़िज़ अहमद की मानें तो यह सर्वे मुसलमानों को बांटने वाली राजनीति का हिस्सा है.
वो कहते हैं, "सरकार स्वदेशी मुसलमान की परिभाषा तय किए बिना सर्वे कराना चाहती है. इस तरह के सर्वे की कानूनी मान्यता अदालत में टिक पाएंगी, यह कहना मुश्किल है."
सर्वे में किस तरह की दिक़्क़त है?

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लंबे समय से स्वदेशी मुसलमानों की वकालत करते आ रहे गौहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील नेकिबुर ज़मान कहते हैं, "बीजेपी की पहली सरकार ने स्वदेशी मुसलमानों के लिए एक सौ करोड़ रुपए का बजट निर्धारित किया था. लेकिन सर्वे प्रक्रिया शुरू नहीं होने से ये पैसा स्वदेशी लोगों के काम नहीं आ सका."
नेकिबुर ज़मान इस सर्वे की जटिलता बताते हैं, "यह सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण है लिहाज़ा सभी मुसलमानों के ऊपर ही किया जाएगा. जब बात स्वदेशी मुसलमान की आएगी तो उनके पूर्वजों के लिंक से जुड़े काग़ज़ मांगे जाएंगे. फैमिली ट्री की जांच होगी. गोरिया-मोरिया समुदाय की पहचान आसान होगी. लेकिन जो देसी समुदाय हैं वो मियां मुसलमानों के साथ मिश्रित हैं. ऐसे में बंगाली मुसलमानों के बीच से देसी मुसलमानों को चिन्हित करना बड़ी चुनौती होगी. देसी लोगों की बड़ी आबादी ग्वालपाड़ा से लेकर धुबड़ी तक बसी हुई है."
देसी मुसलमानों के बारे में दावा किया जाता है कि यह समुदाय कोच राजवंशी आदिवासी समूह से थे जो वर्षों पहले धर्म बदल कर मुसलमान हो गए. इसके अलावा देसी मुसलमानों की रिश्तेदारी, शादियां मियां मुसलमानों के साथ हुई हैं. ऐसे में सरकार के लिए उनको चिह्नित करना बड़ी चुनौती होगी.
मियां मुसलमानों के डर पर क्या बोली बीजेपी

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बीजेपी का कहना है कि यह सर्वे स्वदेशी मुसलमानों की शिनाख्त करने के लिए किया जा रहा है. इसमें बंगाली मूल के मुसलमानों को डरने या घबराने की कोई बात ही नहीं है.
असम प्रदेश बीजेपी के नेता प्रमोद स्वामी कहते हैं, "इंडिजिनस' मुसलमानों को कुछ सुविधाएं देने के लिए सरकार यह क़दम उठा रही है. लिहाज़ा उनकी पहचान करने के लिए सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण करना होगा.''
''इसमें किसी को भी डरने की क्या ज़रूरत है. कुछ लोग दुष्प्रचार करते हैं कि बीजेपी सरकार में मियां मुसलमानों के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है. जबकि केंद्र और राज्य सरकार की जितनी भी योजनाएं हैं उसका सबसे ज़्यादा लाभ मुस्लिम समाज की महिलाओं को ही मिला है."
असम सरकार के इस फैसले को गौहाटी हाई कोर्ट में बराक वैली इलाके में बसे मुसलमानों के कुछ समूह ने चुनौती दी है.
असम के कछार ज़िले में रहने वाले मणिपुरी मुस्लिम पंगाल और अनुसूचित जनजाति के दायरे में आने वाले मुसलमानों को इन पांच स्वदेशी मुसलमानों के समूह में शामिल नहीं किया गया है. लिहाज़ा असम सरकार के सामने अभी कानूनी अड़चन भी खड़ी हो गई हैं.
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