'पत्नी का रेप' जैसे मुद्दे पर वेब सिरीज़ चिरैया ने फिर छेड़ी बहस

    • Author, गीता पांडे
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

हाल में आई एक वेब सिरीज़ ने भारत में मैरिटल रेप (पत्नी का बलात्कार) जैसे गंभीर मुद्दे की ओर एक बार फिर लोगों का ध्यान खींचा है.

यह ऐसा मुद्दा है जिसे भारत अब तक अपराध घोषित करने से हिचकता रहा है.

'चिरैया', नाम की ये सिरीज हाल ही में जियोहॉटस्टार पर रिलीज हुई है और इसे अब तक लाखों लोग देख चुके हैं. ये हाल के महीनों में इस प्लेटफ़ॉर्म की सबसे लोकप्रिय हिंदी सिरीज़ में शामिल हो गई है.

मीडिया आलोचकों ने इस सिरीज़ की तारीफ़ की है क्योंकि यह एक ऐसे विषय को सामने लाती है जिसे आमतौर पर समाज में छिपाकर रखा जाता है. इसने सोशल मीडिया पर सहमति और महिला विरोधी सोच पर बहस छेड़ दी है. हालांकि कुछ लोगों ने इसे 'पुरुष विरोधी' और 'शादी की पवित्रता' को कमजोर करने की 'कोशिश' भी बताया है.

सिरीज़ की स्क्रिप्ट राइटर दिवी निधि शर्मा बताती हैं कि कहानी दो महिलाओं-कमलेश और पूजा के इर्द-गिर्द घूमती है.

कमलेश का किरदार दिव्या दत्ता ने निभाया है.

कमलेश एक मिडिल क्लास हाउसवाइफ हैं, जो मानती हैं कि महिलाओं को घर और रसोई तक ही सीमित रहना चाहिए.

वहीं पूजा (ये किरदार प्रसन्ना बिष्ट ने निभाया है) पढ़ी-लिखी, जागरूक और बराबरी में विश्वास रखने वाली महिला है.

दोनों की दुनिया तब टकराती है जब पूजा की शादी कमलेश के देवर अरुण से होती है.अरुण को कमलेश ने बेटे की तरह पाला है.

अरुण एक आदर्श पति लगता है, लेकिन शादी की पहली रात ही वह पूजा के साथ बलात्कार करता है, जिससे उसके सपने टूट जाते हैं.

जब पूजा इसका विरोध करती है, तो अरुण कहता है,"मैंने वही लिया जो मेरा हक़ है."

वह यह भी कहता है कि भारत में मैरिटल रेप अपराध नहीं है, इसलिए इसके ख़िलाफ़ कोई क़ानून नहीं है.

सहमति की अहमियत दिखाती है सिरीज़

दिव्या दत्ता कहती हैं कि यह सिरीज़ सहमति की अहमियत दिखाती है.

ख़ासकर शादी जैसे रिश्ते में, जिसे बहुत पवित्र माना जाता है.

वह कहती हैं, "मैरिटल रेप पर बात करना बहुत मुश्किल है. हर महिला जिसे यह झेलना पड़ता है, सोचती है कि यह सिर्फ़ उसकी अपनी कहानी है. उसे डर रहता है कि अगर वह बोलेगी तो बदनामी होगी और घर टूट जाएगा."

सिरीज़ में जब जख़्मी और परेशान पूजा अपने साथ हो रहे व्यवहार के बारे में बोलती है तो उसे अपने ही परिवार से "समझौता करने" की सलाह मिलती है. उसे कहा जाता है कि सच बोलने से केवल बदनामी होगी.

कमलेश शुरुआत में मानती है कि शादी में सेक्स के लिए सहमति अपने आप मिल जाती है.

लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उसका नज़रिया बदलता है और वह सच का साथ देने का फ़ैसला करती है, भले ही उसे अपने 'कम्फर्ट ज़ोन' से बाहर आना पड़े. अंत में वह पूजा का साथ देती है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, भारत में शादीशुदा महिलाओं में से लगभग 6.1 फ़ीसदी को कभी-ना-कभी यौन हिंसा झेलनी पड़ी है.

लेकिन वर्षों से चल रहे आंदोलनों के बावजूद भारत उन तीन दर्जन देशों में शामिल है, जहां मैरिटल रेप को अपराध नहीं माना जाता.

पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और सऊदी अरब जैसे देशों में भी ये अपराध नहीं माना जाता.

इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई हैं. लेकिन सरकार, धार्मिक संगठनों और पुरुष अधिकार संगठनों ने क़ानून में बदलाव का विरोध किया है.

इस मामले में मौजूदा क़ानून औपनिवेशिक दौर का है. अगर पत्नी नाबालिग नहीं है तो ये पति को पत्नी के साथ जबरन संबंध बनाने को अपराध नहीं मानता.

पिछले साल एक मामले को लेकर काफ़ी आक्रोश दिखा था.

उस मामले में पत्नी के साथ 'बलात्कार के दोषी' शख़्स को अदालत ने इस आधार पर बरी कर दिया कि भारत में मैरिटल रेप को अपराध नहीं माना जाता.

स्क्रिप्ट राइटर दिवी निधि शर्मा कहती हैं, "यह अन्याय हमारे घरों और आसपास ही हो रहा है. सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि इसके ख़िलाफ़ कोई क़ानूनी या सामाजिक सहारा नहीं है. इसलिए एक लेखक के रूप में मैंने इस पर काम करना जरूरी समझा

'दुनिया बदल सकती हैं ऐसी कहानियां'

यह सिरीज़ बांग्ला शो 'संपूर्णा' पर आधारित है जिसे उत्तर भारत के सामाजिक माहौल में फिट किया गया है. वो समाज जहां पितृसत्ता ज्यादा गहरी है.

शर्मा कहती हैं, "संपूर्णा की मुख्य किरदार एक फेमिनिस्ट है."

वो कहती हैं, "हमारी नायिका कमलेश ऐसी महिला है, जिसे 'मिसोजिनी' (स्त्री-विरोध) शब्द की स्पेलिंग तक नहीं पता. वह पितृसत्तात्मक सोच में इतनी गहराई तक डूबी हुई है कि उसका नैतिक नज़रिया पूरी तरह बिगड़ चुका है."

"लेकिन अंत में, वह उठ खड़ी होती है और गलत के ख़िलाफ़ लड़ती है."

निर्देशक शशांत शाह कहते हैं कि कमलेश का किरदार ऐसा बनाया गया है जिससे भारत की कई महिलाएं खुद को जोड़ सकें.

वो कहते हैं, "वह परिवार पर विश्वास करती है, लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ आता है कि सब कुछ एक दिखावा है, जिसमें लोग भीतर ही भीतर पीड़ित हैं."

उनका कहना है कि इस सिरीज़ का मक़सद सरकार या क़ानून पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि समाज को सोचने पर मजबूर करना है.

शाह कहते हैं, "हमने यह भी ध्यान रखा कि पुरुष किरदारों को खलनायक की तरह न दिखाया जाए.वे आम लोग हैं, जैसे हम रोज़ देखते हैं. पितृसत्ता इतनी गहरे पैठ कर चुकी है कि लोग खुद नहीं समझ पाते कि वे गलत कर रहे हैं."

दिव्या दत्ता बताती हैं कि इस सिरीज़ को जबरदस्त रेस्पॉन्स मिला है. उन्हें आधी रात में भी लोगों के मैसेज और कॉल आते हैं. लोग शुक्रिया कह रहे हैं. कविताएं लिखकर भेज रहे हैं.''

हालांकि कुछ नकारात्मक प्रतिक्रियाएं भी आई हैं.

शर्मा कहती हैं कि कुछ लोग इसे "पुरुषों को गलत तरीके से दिखाने" वाली सिरीज़ मानते हैं.

लेकिन उनका कहना है, "हमारा मक़सद सिर्फ़ बातचीत शुरू करना था. हम क़ानून नहीं बना सकते, लेकिन कला के जरिए हम ऐसे मुद्दों को समाज के सामने ला सकते हैं."

दिव्या दत्ता कहती हैं कि वह नकारात्मक प्रतिक्रियाओं को नजरअंदाज कर रही हैं और सकारात्मक प्रतिक्रिया पर ध्यान दे रही हैं.

अंत में वह कहती हैं, "मुझे लगता है कि ऐसी कहानियां दुनिया बदल सकती हैं. यह हमें दिखाती हैं कि हम कहां गलत हैं. और बदलाव की शुरुआत हमें अपने घर से ही करनी होगी.यही पहला और सबसे मजबूत कदम है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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