'दिल्ली नहीं, ढाका': क्या बांग्लादेश की युवा पीढ़ी में भारत विरोधी भावना बढ़ रही है?

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इमेज कैप्शन, ढाका में प्रदर्शनकारियों ने अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के प्रत्यर्पण की मांग की. (फ़ाइल फोटो)
    • Author, सौतिक बिस्वास
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
    • ........से, ढाका
  • पढ़ने का समय: 12 मिनट

ढाका यूनिवर्सिटी की दीवारों पर एक बार फिर हलचल बढ़ गई.

दीवारों और गलियारों में फैली ग़ुस्से, चुटीली और शायराना ग्रैफ़िटी जेन ज़ी के नेतृत्व वाले जुलाई 2024 के उस आंदोलन की गूंज है, जिसने 15 साल सत्ता में रहीं शेख़ हसीना को अपदस्थ कर दिया था.

कभी बांग्लादेश की लोकतंत्र समर्थक की प्रतीक रहीं हसीना को लेकर आलोचकों का कहना है कि वह समय के साथ ज़्यादा तानाशाह होती चली गईं थीं. इस्तीफ़ा देने के बाद वह भारत चली गईं.

यूनिवर्सिटी में छात्र छोटे-छोटे समूहों में खड़े होकर राजनीति पर बहस करते दिखते हैं. एक बेतरतीब घास वाले मैदान में, ऊपर झूल रहीं लाल लालटेनें चीनी नववर्ष उत्सव का संकेत दे रही हैं.

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यह एक छोटा लेकिन अहम संकेत है, ऐसे देश में जहां चीन और भारत दोनों असर बढ़ाने की होड़ में हैं. यहां मौजूद कई लोगों की 12 फ़रवरी को होने वाले चुनाव में बैलट बॉक्स से पहली बार भेंट होगी.

नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस ने शेख़ हसीना के हटने के कुछ ही दिनों बाद ज़िम्मेदारी संभाली. हसीना अब दिल्ली में रह रही हैं. भारत ने उन्हें लौटाने से इनकार कर दिया है. शेख़ हसीना को 2024 की कठोर कार्रवाई के मामले में उनकी ग़ैर-मौजूदगी में ही कोर्ट ने मौत की सज़ा सुनाई है.

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़, इस हिंसा में क़रीब 1,400 लोग मारे गए, जिनमें ज़्यादातर मामले सुरक्षा बलों की कार्रवाई के हैं.

देश की सबसे पुरानी पार्टी, हसीना की अवामी लीग के पास क़रीब 30 फ़ीसदी जनसमर्थन था लेकिन उसे चुनाव लड़ने से रोक दिया गया है. विश्लेषकों का कहना है कि मुख्य विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, बीएनपी, अब उस उदार-मध्यमार्गी जगह को भरने की कोशिश कर रही है.

मुख्य इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी ने छात्र आंदोलन से निकली एक पार्टी के साथ हाथ मिला लिया है.

लेकिन कैंपस के भीतर और बाहर दिखने वाले नारे सिर्फ़ देश के भीतर लोकतंत्र तक सीमित नहीं हैं. इनका रुख़ अब तेज़ी से सीमा के उस पार की ओर भी है.

दिल्ली से नाराज़गी

फ़ातिमा तसनीम जुमा

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इमेज कैप्शन, फ़ातिमा तसनीम जुमा का कहना है कि उनका विरोध भारत सरकार से है न कि लोगों से.
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"ढाका, नॉट दिल्ली" दीवारों पर लिखा हुआ है और साड़ियों पर भी दिखता है, जो कि दक्षिण एशियाई महिलाओँ का प्रमुख परिधान है.

नौजवानों के बीच "हेजेमनी" (वर्चस्व) रोज़मर्रा की बातचीत का हिस्सा बन गया है, जो बांग्लादेश पर भारत के लंबे प्रभाव के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

24 साल के समाजशास्त्र के छात्र मोशर्रफ़ हुसैन कहते हैं, "युवा पीढ़ी को लगता है कि भारत हमारे देश में कई सालों से दख़ल देता रहा है. ख़ास तौर पर 2014 के चुनाव के बाद, जोकि मूल रूप से एक-दलीय चुनाव था."

बांग्लादेश में लोकतांत्रिक गिरावट में दिल्ली की कथित भूमिका को लेकर नाराज़गी, दरअसल भारत विरोधी भावना में तेज़ बढ़ोतरी की जड़ में है.

नतीजा यह है कि भारत-बांग्लादेश रिश्ते, जिन्हें कभी पड़ोसी कूटनीति का आदर्श बताया जाता था, अब दशकों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं.

लंदन की एसओएएस यूनिवर्सिटी में राजनीति और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन पढ़ाने वाले अविनाश पालीवाल कहते हैं, "बांग्लादेश में गहरी भारत-विरोधी भावना और भारत के अपने घरेलू राजनीतिक बहसों में पड़ोसी देश के प्रति सख़्ती, कई बार खुली दुश्मनी, के चलते दिल्ली को ढाका में मुश्किलें उठानी पड़ रही हैं."

कई लोग शेख़ हसीना के आख़िरी सालों में उनके बढ़ते तानाशाही रवैये के लिए दिल्ली के समर्थन को ज़िम्मेदार मानते हैं और भारत को एक हावी पड़ोसी के रूप में देखते हैं.

वो 2014, 2018 और 2024 के विवादित आम चुनाव और उन पर दिल्ली की "मंज़ूरी" की बात करते हैं.

हुसैन कहते हैं, "भारत ने हसीना के शासन का बिना किसी दबाव, बिना किसी सवाल के समर्थन किया.

लोग मानते हैं कि लोकतंत्र की बर्बादी को भारत का समर्थन मिला."

विश्वासघात का यह एहसास, लंबे समय से चली आ रही शिकायतों, सीमा पर हत्याएं, पानी के बंटवारे को लेकर विवाद, व्यापार पर पाबंदियां और भारतीय नेताओं व टीवी स्टूडियो से आने वाली भड़काऊ बयानबाज़ी के साथ मिलकर ज़्यादा हानिकारक धारणा में बदल गया है.

यह धारणा है कि भारत बांग्लादेश को एक संप्रभु और बराबरी के देश की तरह नहीं, बल्कि एक आज्ञाकारी पड़ोसी के रूप में देखता है.

स्थानीय मीडिया में ऐसी ख़बरें भरी पड़ी हैं कि बांग्लादेश को बिजली सप्लाई करने वाला एक भारतीय समूह देश के साथ धोखाधड़ी कर रहा है, हालांकि समूह इन आरोपों से इनकार करता है.

एक प्रमुख अख़बार को "भारतीय एजेंट" बताकर उस पर पाबंदी लगाने का फ़ेसबुक पर अभियान चल रहा है. दोनों देशों ने ज़्यादातर वीज़ा सेवाएं निलंबित कर रखी हैं.

दिल्ली के उस फ़ैसले ने भी सीमा पार नाराज़गी को बढ़ाया है, जिसमें एक बांग्लादेशी क्रिकेटर को इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में खेलने से रोका गया और बांग्लादेश के टी20 वर्ल्ड कप मैच भारत से श्रीलंका ले जाने से इनकार किया गया.

रिश्ते सुधारने की भारत की कोशिश

बांग्लादेश पहुंचे जयशंकर

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इमेज कैप्शन, भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर हाल ही में ढाका गए थे जहां उन्होंने बीएनपी नेता तारिक़ रहमान से मुलाक़ात की.

पालीवाल कहते हैं, "यह तय है कि बांग्लादेश के सभी पक्षों से भारत के संपर्क के चैनल हैं. लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में इस तरह की भागीदारी को सकारात्मक राजनीतिक नतीजों में बदलना चुनौतीपूर्ण है."

हालांकि भारत ने अपनी पहुंच को बढ़ाने की कोशिशें बढ़ा दी हैं.

पिछले महीने विदेश मंत्री एस जयशंकर पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की नेता ख़ालिदा ज़िया के अंतिम संस्कार में शामिल होने ढाका गए और इसी मौके पर पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक़ रहमान से मुलाक़ात की.

ज़िया ख़ानदान के 60 वर्षीय वारिस रहमान हाल ही में लंदन में 17 साल के निर्वासन के बाद लौटे हैं और अब इस अहम चुनाव में सबसे आगे माने जा रहे हैं.

भारत ने इस्लामी ताक़तों से भी संपर्क के रास्ते खोले हैं. जमात-ए-इस्लामी के एक वरिष्ठ नेता ने मुझे बताया कि पिछले एक साल में भारतीय अधिकारियों ने पार्टी नेतृत्व से चार बार बातचीत की है, जिसमें हाल ही में ढाका के एक होटल में भारतीय उच्चायोग के गणतंत्र दिवस समारोह का न्योता भी शामिल है.

फिर भी ये रणनीतिक बदलाव व्यापक गिरावट को रोकने में नाकाम रहे हैं. द डेली स्टार अख़बार के कंसल्टिंग एडिटर कमाल अहमद कहते हैं कि रिश्तों में मौजूदा ठंडापन पहले के संकटों के दौर में भी कभी नहीं देखा गया.

वह बीबीसी से कहते हैं, "इसमें कोई शक नहीं कि यह द्विपक्षीय रिश्तों का सबसे निम्नतम स्तर है."

शेख़ हसीना के दौर से इसका फर्क़ साफ़ दिखता है.

17 सालों में बांग्लादेश ने "भारत के लिए लगभग सभी मोर्चे खोल दिए थे", सुरक्षा सहयोग, ट्रांज़िट, व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और लोगों के आपसी रिश्ते. लेकिन आज, अहमद कहते हैं, "कुछ भी आगे नहीं बढ़ रहा है, न लोग और न ही सद्भावना."

बयानबाज़ी ने हालात और बिगाड़े

ढाका नॉट देल्ही

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इमेज कैप्शन, साड़ियों पर 'ढाका, नॉट डेल्ही' का स्टिकर लगा हुआ है.

जो बात संदेह को ग़ुस्से में बदलती दिखी, वह हसीना के हटाए जाने के बाद दिल्ली की प्रतिक्रिया थी.

कई बांग्लादेशियों का कहना है कि उन्हें उम्मीद थी कि भारत उस बांग्लादेश नीति को नए सिरे से तय करेगा, जो लगभग पूरी तरह एक ही पार्टी के समर्थन पर टिकी थी. इसके बजाय भारत ने रुख़ और सख़्त कर लिया, हसीना को पनाह दी और वीज़ा व व्यापार पाबंदियां और कड़ी कर दीं. ढाका में जो संदेश पहुंचा, अहमद के मुताबिक़, वह यह था कि बांग्लादेशियों को "पड़ोसी के तौर पर अहमियत नहीं दी जा रही है."

जब भारतीय नेता बांग्लादेशी प्रवासियों को "दीमक" कहते हैं या बांग्लादेश को "ग़ज़ा में इसराइल की तरह सबक़ सिखाने" की बात करते हैं, तो अहमद सवाल उठाते हैं, "आप बांग्लादेश के लोगों से कैसी प्रतिक्रिया की उम्मीद करते हैं?"

इसके बाद सांस्कृतिक जवाबी कार्रवाई हुई, भारतीय सामान के बहिष्कार की अपीलें, आईपीएल प्रसारण पर रोक लगाई गई और ये सब नाराज़गी से प्रेरित प्रतिक्रिया थी. अहमद कहते हैं, "संस्कृति, व्यापार, सम्मान, कुछ भी एकतरफ़ा नहीं होता. दुर्भाग्य से मौजूदा भारतीय नेतृत्व इसे इसी तरह लागू कर रहा है."

फिर भी ढाका के अधिकारी रिश्तों को सिर्फ़ संकटों के नज़रिये से देखने के ख़िलाफ़ चेताते हैं.

यूनुस के प्रेस सचिव शफ़ीक़ुल आलम भारत के साथ संबंधों को "बहुआयामी" बताते हैं, जो राजनीति जितना ही भूगोल पर भी टिके हैं.

वह कहते हैं, "हम 54 नदियां साझा करते हैं. हम भाषा साझा करते हैं, हम एक ही इतिहास साझा करते हैं और 4,096 किलोमीटर, 2,545 मील, लंबी सीमा पर व्यापार और रोज़मर्रा की आवाजाही होती है."

फिर भी आलम मानते हैं कि जनभावना काफ़ी सख़्त हो चुकी है.

वह कहते हैं, अगर बांग्लादेशियों से पूछा जाए कि वे 15 साल से ज़्यादा समय तक आज़ादी से वोट क्यों नहीं कर पाए, तो कई लोग एक ही जवाब देते हैं, शेख़ हसीना की तानाशाही और भारत का उनको "समर्थन".

2024 की हिंसा के बाद हसीना का भारत भाग जाना अब भी एक बेहद चुभने वाला मुद्दा बना हुआ है.

भारत को लेकर धारणा

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इमेज कैप्शन, भारत और बांग्लादेश 4,096 किलोमीटर की सीमा साझा करते हैं.

आलम कहते हैं, "सैकड़ों युवा मारे गए... और फिर वह भारत भाग गईं." यह धारणा कि उनके साथ एक बदनाम नेता की जगह "सरकार की मुखिया" जैसा व्यवहार किया गया, ग़ुस्से को और गहरा कर गई.

आलम भारतीय मीडिया की कवरेज की भी आलोचना करते हैं और अल्पसंख्यक हिंदुओं के व्यवस्थित उत्पीड़न के दावों को "एक बड़ा दुष्प्रचार अभियान" बताते हैं. वह कहते हैं कि अलग-थलग घटनाएं होती हैं, लेकिन उन्हें नियमित रूप से धार्मिक हिंसा के रूप में पेश किया जाता है. वह भारतीय पत्रकारों से अपील करते हैं, "आइए और ख़ुद देखिए. लोगों से मिलिए और देखिए कि असल में क्या हुआ."

इस बीच, भारत का कहना है कि स्वतंत्र स्रोतों ने अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दौरान अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ 2,900 से ज़्यादा हिंसक घटनाओं का दस्तावेज़ीकरण किया है, जिनमें हत्याएं, आगज़नी और ज़मीन पर क़ब्ज़ा शामिल है.

भारत का कहना है कि इन्हें सिर्फ़ "मीडिया की बढ़ा-चढ़ाकर की गई बातें" नहीं कहा जा सकता और न ही इन्हें राजनीतिक हिंसा बताकर ख़ारिज किया जा सकता है.

यूनुस के विशेष सहायक के रूप में काम कर रहे शिक्षाविद अली रियाज़ मानते हैं कि दरार ग़लतफ़हमी से कहीं ज़्यादा गहरी है.

वह कहते हैं, "यह सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है."

उनका मानना है कि समय के साथ यह रिश्ता "बांग्लादेश और भारत के बीच संबंध" की जगह "किसी एक पार्टी या व्यक्ति और भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान के बीच संबंध" तक सिमट गया.

पुराने विवाद

ढाका में भित्त चित्र

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इमेज कैप्शन, ढाका में एक दीवार पर लिखा है, 'हमने पाकिस्तान की गुलामी का बंधन तोड़ा. हम दिल्ली के वर्चस्व को नहीं स्वीकारेंगे.'

पुराने विवादों ने नुकसान को और बढ़ाया. रियाज़ के मुताबिक़, पानी का बंटवारा एक तरह का भेदभाव पैदा करता है. वह कहते हैं, "अगर आप पानी पर नियंत्रण रखते हैं, तो रिश्ता तुरंत असमान हो जाता है."

सीमा पर हत्याएं और भी गहरा ज़ख़्म देती हैं. वह कहते हैं, "इसे इस तरह देखा जाता है कि भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान बांग्लादेशियों की ज़िंदगियों को किस नज़र से देखता है." भारत ने सीमा पर हुई कुछ मौतों में अपनी सेनाओं की ग़ैर-क़ानूनी हत्याओं से इनकार किया है.

विश्लेषकों का कहना है कि ये मुद्दे कभी-कभार उभरने वाली परेशानियां नहीं, बल्कि असंतुलन के प्रतीक हैं.

आलोचकों के मुताबिक़ हसीना के पतन के बाद यह असंतुलन और मज़बूत हुआ. यूनुस के विदेश मामलों के सलाहकार मोहम्मद तौहीद हुसैन कहते हैं कि भारत रुख़ में बदलाव करने में नाकाम रहा और अंतरिम सरकार के साथ रिश्तों को नए सिरे से शुरू करने का मौक़ा चूक गया. वह कहते हैं, "हमने कई मौक़ों पर आगे बढ़ने की कोशिश की, लेकिन भारत की प्रतिक्रिया कभी हां, कभी ना जैसी रही."

भारत की तरफ़ से बांग्लादेश के "बिगड़ते सुरक्षा माहौल" पर चिंता जताई गई है और "मुक्त, निष्पक्ष, समावेशी और भरोसेमंद चुनाव" शांतिपूर्ण तरीक़े से कराने की मांग की गई है.

राजनीतिक तनाव अब आर्थिक रिश्तों में भी झलकने लगा है. थिंक टैंक सेंटर फ़ॉर पॉलिसी डायलॉग (सीपीडी) की फ़हमीदा खातून कहती हैं कि 13.5 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार कहीं ज़्यादा हो सकता है, अगर शुल्क और गैर-शुल्क बाधाएं कम की जाएं और कूटनीतिक रिश्ते सुधरें.

वह कहती हैं, "राजनीतिक तनाव ने आर्थिक तनाव को जन्म दिया है."

फिर भी राज्य स्तर पर आई यह सख़्ती हमेशा सड़क पर उसी तरह नहीं दिखती.

राष्ट्रवादी भारत-विरोधी रुख़ के लिए जाना जाने वाले इंक़लाब मंच से जुड़ी फ़ातिमा तसनीम जुमा कहती हैं, "जब भी मैं भारत का नाम सुनती हूं, तो मुझे लगता है कि वह मेरा दुश्मन है...लेकिन जब बात लोगों की आती है, तो ऐसा नहीं होता."

जुमा कहती हैं कि वह हिंदू बहुल इलाके में पली-बढ़ी हैं. रिश्तेदार आसानी से सीमा पार आते-जाते हैं. "हमारा टकराव भारत सरकार या उसके ढांचे से है. लोगों से नहीं."

रिश्तों को सुधारने की ज़िम्मेदारी

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इमेज कैप्शन, दिल्ली में हिंदू संगठनों ने बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन भी हुआ.

चुनावी प्रचार में भारत-विरोधी तेवर काफ़ी दबे हुए दिखे हैं, इसलिए नहीं कि वे ख़त्म हो गए हैं, बल्कि इसलिए कि हर राजनीतिक दावेदार जानता है कि भारत के साथ रिश्ते को टालना नामुमकिन है.

फिर भी भारत-बांग्लादेश रिश्तों की मरम्मत न तो जल्द होगी और न ही ऊपरी तौर पर.

आलम कहते हैं, "सिर्फ़ चुनाव या नई सरकार की वजह से रिश्ता करना रीसेट (नए सिरे से बनाना) आसान नहीं होगा. पृष्ठभूमि से जुड़े मुद्दे बने रहेंगे."

फिर भी यह टूटन स्थायी नहीं है. रियाज़ कहते हैं, "कोई भी देशों के बीच का रिश्ता ऐसा नहीं होता. लेकिन सुधार की ज़िम्मेदारी ज़्यादातर दिल्ली पर है और इसके लिए ढाका को पसंदीदा मध्यस्थों के इस्तेमाल की आदत से आगे बढ़ना होगा.

अहमद कहते हैं कि बांग्लादेश रिश्तों को सामान्य बनाने के लिए तैयार है, लेकिन भारत को ऐसा रीसेट चाहिए जो ढाका में सत्ता में बैठे किसी भी पक्ष के साथ काम कर सके.

राजनीतिक नेता इस रीसेट को रणनीति के साथ नैतिकता के सवाल के रूप में भी देखते हैं.

बीएनपी नेता रहमान के अहम सलाहकार महदी अमीन साफ़ शब्दों में कहते हैं, "जितना बड़ा देश, उतनी बड़ी ज़िम्मेदारी."

उनके मुताबिक़, लोगों के बीच रिश्ते तभी मज़बूत हो सकते हैं, जब भारत अपनी नीति को बांग्लादेशियों की आकांक्षाओं के साथ जोड़े, न कि सिर्फ़ सरकारों की पसंद के साथ.

जमात-ए-इस्लामी के सहायक महासचिव अहसानुल महबूब ज़ुबैर भी सतर्क आवाज़ में यही बात दोहराते हैं, "अगर दोनों देशों में ज़िम्मेदारी संभालने वाले लोग ईमानदारी दिखाएं, मौजूदा हालात को स्वीकार करें और एक-दूसरे के साथ आपसी सम्मान और गरिमा से पेश आएं, तो रचनात्मक रिश्ता संभव है."

सुधार की वह गुंजाइश अब भी मौजूद है और नई सरकार फ़र्क़ ला सकती है.

पालीवाल कहते हैं, "मौजूदा स्थिति कूटनीतिक ठंडेपन से ज़्यादा है, लेकिन ढांचागत टूटन से कम."

"भूगोल, इतिहास और साझा सांस्कृतिक विरासत का मतलब यह है कि भारत और बांग्लादेश एक-दूसरे को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते."

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