मुंबई मेयर- बीजेपी के शिवसेना को दरियादिली दिखाने की वजह

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- Author, निखिल दीक्षित
- पदनाम, मुंबई से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
हाल तक जो शिवसेना की जीत लग रही थी वो जीएसटी बिल के पास होने के बाद पार्टी के लिए घाटे का सौदा बनती दिख रही है.
हाल में हुए चुनाव में लगभग शिवसेना के बराबर सीटें पाने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने मेयर ने लिए अपना उम्मीदवार नहीं खड़ा किया.
इसे कुछ लोगों ने शिवसेना की जीत के तौर पर देखा. हाल के दिनों में शिवसेना और बीजेपी में तनाव का माहौल रहा है.
एक समय तो ये अफ़वाहें थी कि महाराष्ट्र में उनका गठबंधन टूट जाएगा. मुंबई मेयर की कुर्सी हाथ लगने से ज़ाहिर है शिव सेना में ख़ुशी थी.
दुनिया की सबसे बड़ी महानगरपालिकाओं में से एक मुंबई नगरपालिका का सालाना बजट 37,000 करोड़ रुपये का है.

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ये कई भारतीय राज्यों के सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी से ज़्यादा है. मुंबई महानगरपालिका को ऑक्ट्रॉय टैक्स यानी चुंगी कर से ही सालाना 7,000 करोड़ रुपये की आमदनी होती है.
जेटली से मुलाकात
ख़तरा ये है कि जीएसटी के लागू होने से ये ख़त्म हो जाएगा. मुंबई नगरपालिका पर शिवसेना का वर्चस्व रहा है और वो ऑक्ट्रॉय को हटाए जाने का विरोध करती रही है.
शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने चंद दिनों पहले दिल्ली में केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली से मुलाक़ात की थी.
उद्धव ठाकरे के नज़दीकी और शिवसेना के मीडिया एडवाइजर हर्षल प्रधान का कहना है, "केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने उद्धव ठाकरे को आश्वासन दिया है कि ऑक्ट्रॉय हटाया नहीं जाएगा और ऑक्ट्रॉय से जुड़ी सारी समस्याओं को सुलझाया जाएगा."

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जिन बातों को लेकर दोनों पुराने राजनीतिक साझेदारों में मतभेद है उसमें जीएसटी भी एक मुद्दा है.
आर्थिक राजधानी
अधिकारियों का कहना है ऑक्ट्रॉय बंद होने की हालत में बीएमसी को फंड के लिए केंद्र पर निर्भर रहना होगा और ज़ाहिर है कि शिवसेना को ये गवारा नहीं होगा.
पिछले साल जब संसद में जीएसटी पर चर्चा शुरू हुई थी तब शिवसेना ने बयान दिया था कि वह जीएसटी के हक़ में है.
लेकिन उसने शर्त रखी थी कि देश की आर्थिक राजधानी बीएमसी को जीएसटी के दायरे से बाहर रखना होगा.
शिवसेना का ये भी कहना था कि जीएसटी के लागू होने के बाद सरकार को बीएमसी को मुआवज़ा देना होगा.

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केंद्रीय कैबिनेट ने जीएसटी से जुड़े बिलों को मंज़ूरी दे दी है और अब उसे संसद में पेश किया जा रहा है. इसके कुछ माह में ही लागू किए जाने की बात कही जा रही है.
मेयर चुनाव
सूत्रों की मानें तो शायद यही करण है की बीजेपी ने हाल ही में हुए महानगर पालिका चुनाव के बाद अपना महापौर खड़ा नहीं किया.
गौरतलब है कि चुनाव में शिवसेना को 84 और बीजेपी को 82 सीटें मिली थीं. चूंकि दोनों में कोई गठबंधन नहीं था इसलिए बीजेपी भी मेयर चुनाव में शामिल हो सकती थी.
लेकिन बीजेपी ने ऐसा नहीं किया और शिवसेना ने आसानी से अपना महापौर बिठा दिया.

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सूत्रों का कहना है कि बीजेपी ने ऐसा जानबूझ कर किया. यह एक राजनितिक चाल थी ताकि जब जीएसटी लागू करने और ऑक्ट्रॉय हटाने की बात आएगी तब बीजेपी का पलड़ा भारी होगा और बीजेपी शिवसेना पर दबाव डाल पाएगी.
शहर का विकास
शिव सेना ने ये भी दावा किया है कि मुंबई से सालाना 30 फीसदी कर सरकार को जाता है जबकि उसमें से मुंबई के हिस्से में सिर्फ 2.5 फीसदी वापस मिलता है.
ऐसी हालत में ऑक्ट्रॉय से जो पैसा आता है उससे मुंबई शहर के विकास में लगाया जा सकता है.
ऐसा कहा जा रहा है कि जीएसटी के ज़रिए बीजेपी शिवसेना पर अपना शिकंजा कसना चाहती है. बीएमसी का सालाना बजट तकरीबन 37,000 करोड़ रुपये का है.

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देश के चार-पांच राज्यों का बजट भी इतना नहीं होता जितना BMC का है और इसीलिए शिवसेना BMC को लेकर कोई छेड़खानी बर्दाश्त करने के मूड में नहीं दिखती.
वहीं काँग्रेस पार्टी का मनना है कि बीजेपी और शिवसेना दोनों ही ऑक्ट्रॉय के मुद्दे को लेकर सिर्फ राजनीति कर रहे हैं जबकि दोनों को मुंबई शहर और लोगों के बारे में सोच विचारकर सही कदम उठाने चाहिए.
मुंबई कांग्रेस के प्रवक्ता संजय निरुपम ने कहा, "बीजेपी और शिवसेना आपस में खींचतान कर रहे हैं. ज़्यादा बेहतर होगा अगर वह मुंबई के विकास के बारे में सोचें. केंद्र सरकार, महाराष्ट्र राज्य सरकार, शिवसेना और बीएमसी के अधिकारियों को मिलकर फैसला करना चाहिए."
उन्होंने कहा, "अगर जीएसटी के ज़रिए बीएमसी को ऑक्ट्रॉय का मुआवज़ा मिलेगा तो मेरे ख्याल में शिवसेना या बीएमसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए."
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