You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
'मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तीन तलाक़ पर लीपापोती कर रहा है'
- Author, विकास त्रिवेदी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
तीन तलाक़ मुद्दे पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने रविवार को साफ़ किया कि वो शरिया क़ानून में किसी भी सरकारी दखल के ख़िलाफ़ हैं.
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मुताबिक,
- ज़्यादातर भारतीय मुसलमान मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी भी तरह का बदलाव नहीं चाहते हैं.
- बोर्ड में एक महिला विंग का गठन किया गया है जो कि ट्रिपल तलाक़ के मामलों पर निगरानी रखेगी.
- ट्रिपल तलाक़ की वजहों की पड़ताल की जाएगी और महिलाओं को न्याय दिलाया जाएगा.
- बेवजह तलाक़ देने वालों के सामाजिक बहिष्कार की कोशिश की जाएगी.
- हम नहीं चाहते कि धार्मिक मामलों और पर्सनल लॉ से जुड़े मुद्दों यानी निकाह, हलाला और तीन तलाक पर सरकार कोई दखल दे.
बोर्ड की इन बातों पर मुस्लिम महिलाओं की क्या है राय?
हिना (बदला हुआ नाम) का तलाक़ हो चुका है. हिना कहती हैं, ''बोर्ड की सरकारी दखल देने से मना करने की बात सही है. शरीयत में सरकारी दखल नहीं होना चाहिए. अगर बोर्ड कह रहा है कि बिना नियम तीन तलाक़ कहने वालों को समाज से बाहर किया जाएगा तो इस पर अमल भी होना चाहिए.''
दिल्ली में रहने वाली शबनम ख़ान कहती हैं, ''बेवजह तलाक़ देने वालों के समाजिक बहिष्कार करने की बात को बोर्ड कैसे लागू करवाएगा. मुस्लिम बोर्ड ने शरीयत में बदलाव करने के लिए मना किया है लेकिन जिस तरीक़े से तलाक़ दिए जा रहे हैं वो तो शरीयत में भी नहीं हैं.''
शबनम के मुताबिक, ''शरीयत में बदलाव के बिना कोई कानून बनाने की बात बोर्ड क्यों नहीं करता? 'निगरानी रखने वाली विंग' के पास क्या शक्तियां होंगी? अगर निगरानी से मामला निपट सकता है तो ये नौबत आती ही नहीं.''
तीन तलाक़ की पड़ताल महज़ लीपापोती?
बोर्ड के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए शबनम ने कहा, ''बोर्ड मुस्लिम समाज का प्रतिनिधित्व तो करता है लेकिन सिर्फ मर्दवादी सोच को लेकर चलता है. तीन तलाक़ के वजहों की पड़ताल करने की बात लीपापोती है बस. इसमें पड़ताल जैसा कुछ है ही नहीं.
इंस्टैंट तीन तलाक़ मर्द इसलिए देते हैं क्योंकि उन्हें ये समझाया गया है कि वो ऐसा करने की ताक़त रखते हैं. जब उन्हें बताया जाए कि उनका ऐसा करना जुर्म है, तो देखते हैं तीन तलाक़ कैसे बंद नहीं होंगे.''
शिया मुस्लिम महिलाएं और तीन तलाक़
अमरोहा में रहने वाली नाज़िया कहती हैं, ''तीन तलाक को हर कोई गलत ही कहेगा. हर भाषा में एक शब्द के कई अर्थ होते हैं. अहले-सुन्नत में जो तीन तलाक कह देते हैं, वो वैसा नहीं होता है जैसा सिर्फ तीन बार तलाक़ कह देने वाले कह देते हैं. तीन तलाक कहना ही तलाक़ नहीं होता है.''
ज्यादातर मौकों पर अहले-सुन्नत सुन्नियों के लिए इस्तेमाल होता है.
बहिष्कार से महिलाओं का क्या भला होगा?
शिया समुदाय से ताल्लुक़ रखने वाली नाज़िया कहती हैं, ''आप तलाक देने वाले का बहिष्कार करने की बात कर रहे हैं. लेकिन उस महिला का सोचिए न, जिसको तलाक दिया गया. इस बहिष्कार का उस पर क्या असर होगा?"
"क्या वो अपने घर से बाहर जा सकती हैं? कुछ नहीं बदलेगा. कान आप कहीं से भी पकड़ लो. बात वही आ रही है.''
'बेटों को ढंग की परवरिश दो, तीन तलाक की नौबत ही न आए'
शिमला में रह रही निलोफर सुन्नी समुदाय से हैं. निलोफर कहती हैं, ''तीन तलाक़ इसलिए है कि एक बार तलाक़ कहने के बाद रिश्ते को बचाने के दो मौकें और रहें. कुरान में मोडिफिकेशन नहीं हो सकती है. तो अगर कोई नया नियम बनाएंगे, तो ये कैसे संभव है?"
"एकदम से पहले से मौजूद किसी नियम के ख़िलाफ कोई नियम बना देंगे तो ये भी गलत है. इस सब की बजाय जैसे बच्चियों को नसीहतें देते हैं कि ये करो या ये मत करो, ठीक वैसे ही बेटों को ढंग की परवरिश दें तो तीन तलाक की नौबत ही न आए. अगर ढंग से कुरान के नियम मान लिए जाएं तो किसी नए नियम या कानून की ज़रूरत ही नहीं है.''
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)