नज़रिया: ममता ने गोरखाओं के स्वाभिमान पर चोट की

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    • Author, सुबीर भौमिक
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार

दार्जिलिंग में गोरखा लोगों का इस बार का आंदोलन कुछ हद तक 1985-86 के आंदोलन जैसा लग रहा है.

उस वक्त गोरखा लिबरेशन फ्रंट इस इलाके का एक मजबूत संगठन था. उन्होंने करीब चार-पांच साल आंदोलन चलाया था. अभी हालत कुछ उस तरह के लग रहे हैं.

इसकी वजह ये है कि गोरखा बहुत नाराज़ हैं. उनकी आमदनी पर कहीं चोट पहुंची है.

गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन को लेकर किए गए इंतजाम से गोरखा लोग ख़ास तौर पर नाराज हैं.

उन्हें लग रहा है कि पश्चिम बंगाल सरकार ने इसकी कामयाबी के रास्ते में हर तरह से रोड़ा अटकाया है. इसको नाकाम करने के लिए हर तरह की साजिश और कोशिश की है.

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गोरखालैंड की मांग

इसलिए अब उनको एहसास हो रहा है कि जब तक उनको अलग राज्य नहीं मिलता, तब तक वो अपने इलाके को लेकर जो करना चाहते हैं, वो कर नहीं सकते हैं.

इसकी कुछ बड़ी वजहें हैं. एक तो ये कि ममता बनर्जी की सरकार ने पहाड़ में गोरखा संप्रदाय के बीच तरह-तरह से फूट डालने की कोशिश की है.

और सबसे बड़ी बात तो ये है कि गोरखा लोगों के साथ जो लेप्चा और भूटिया लोग हैं, उनको भी बांटने की कोशिश की गई है.

साथ ही साथ गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन को मिलने वाले फंड में तरह-तरह की बाधाएं खड़ी की गई हैं, हालांकि केंद्र से मिलने वाला पैसा मिलता रहा है.

गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन की सत्ता संभालनेवाली गोरखा जनमुक्ति मोर्चा इससे ख़फ़ा है.

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गोरखाओं का स्वाभिमान

देखा जाए तो गोरखालैंड को स्वायत्ता देने का प्रयोग पूरी तरह से नाकाम हो गया लगता है. और अभी जो गड़बड़ी हुई है, उससे गोरखा लोगों के स्वाभिमान को ठेस पहुंची है.

वो ये है कि ममता बनर्जी की सरकार ने अचानक ये घोषणा कर दी कि दार्जिलिंग समेत पश्चिम बंगाल के हर कोने में बंगाली पढ़ना ज़रूरी है.

हालांकि बाद में इस आदेश को वापस लिया गया है लेकिन तब तक आग में घी पड़ चुका था और आग फैलने लगी.

यही वजह है कि आज गोरखा लोगों को ये लग रहा है कि वे एक अलग जाति और समुदाय हैं. और उनका बाक़ी बंगाल के साथ कोई तालमेल नहीं है.

लेकिन ये भी सच है कि बंगाली और गोरखा सालों से साथ रहते आए हैं.

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पर्यटन को नुकसान

मुझे लगता है कि गोरखा लोगों की ये बेवकूफी है. क्योंकि आप कामकाज तो बंद कर सकते हैं. आप टॉय ट्रेन में रुकावट तो डाल सकते हैं.

जब बांग्ला भाषा के लिए बंगालियों ने 1960-61 में असम में आंदोलन किया था तो वहां पर वे रेल लाइनों पर जाकर बैठ गए थे.

आप रेलवे की सर्विस बंद कर सकते हैं कि लेकिन स्टेशन को आग के हवाले कर देना, टूरिज़्म के बुनियादी ढांचे को विध्वंस करना, अपने आप में बहुत बड़ी बेवकूफी है.

सही सोच रखने वाले गोरखाओं का ये काम नहीं हो सकता. गोरखा आंदोलन को जो लोग नुकसान पहुंचाना चाह रहे हैं, ये उन लोगों की हरकत हो सकती है.

मान भी लीजिए कि आज के बाद अगर उन्हें गोरखालैंड मिल भी जाता है, तो ये सब फिर से बनाने के लिए फिर से ख़र्चा करना पड़ेगा. हालांकि ये एक काल्पनिक स्थिति ही है.

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शांतिपूर्ण तरीके से...

आज की तारीख में इस बर्बाद करने का कोई तुक नहीं बनता. अगर लोग वाकई साथ हैं तो ये सब बरकरार रखकर भी शांति पूर्ण तरीके से आंदोलन चलाया जा सकता था.

अगर आप लोगों को डराकर, ये सब हरकत करके एक आंदोलन खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं तो ये अलग बात है.

भले ही गोरखा जन मुक्ति मोर्चा, और उसके नेता बिमल गुरुंग और रोशन गिरि कह रहे हैं कि लोग उनके साथ हैं लेकिन अगर लोग वाकई उनके साथ हैं तो रेलवे स्टेशन जलाना, चाय बागान पर हमला करना, इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाना कोई तरीके वाली बात नहीं है.

क्योंकि टी, टिंबर और टूरिज़्म दार्जिलिंग की इकॉनमी का मेन सोर्स है.

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नए राज्य के गठन पर सवाल

अगर आप अलग राज्य की मांग कर रहे हैं तो इन सब उद्योगों में मुनाफ़ा बरकरार रखना किसी राज्य के लिए बहुत जरूरी है.

अगर आपने केंद्र को इस बुनियादी शर्त को पूरा करने का भरोसा नहीं दिलाया तो केंद्र नए राज्य के गठन की मांग पर कभी विचार ही नहीं करेगा.

ये गोरखालैंड के सीनियर नेता समझते हैं लेकिन नौजवान नेताओं को ये बात समझ में नहीं आती, उनके पास अचानक से आया पैसा दिख रहा है और ये साफ़ नहीं है कि ये पैसा कहां से आया.

यही लोग जोश में आकर ये सब हरकत कर रहे हैं और उन्हें इससे बाज़ आना चाहिए क्योंकि वे ये सब किए बगैर भी अपना आंदोलन जारी रख सकते हैं.

(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित)

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