नज़रिया: 'एक ही सियासी मोड़ पर खड़े हैं उद्धव और राज ठाकरे'

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- Author, कुमार केतकर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का झगड़ा लुइस कैरोल के मशहूर उपन्यास 'थ्रू द लुकिंग क्लास एंड एलिस इन वंडरलैंड' के दो किरदारों की तरह लगने लगा है.
इस उपन्यास में ट्वीडलडम और ट्वीडलडी नाम के दो किरदार एक दूसरे से ऐसी लड़ाई के लिए रजामंद हुए जो कभी होने वाली नहीं थी. दोनों ने एक दूसरे के ख़िलाफ़ कभी कुछ नहीं कहा. यहां तक कि वे एक दूसरे के सुर में सुर मिलाते भी सुने गए.
ट्वीडलडम और ट्वीडलडी के तरह ही उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे भी एक ही विरासत का हिस्सा हैं. और वो विरासत है बाला साहब ठाकरे की सियासत. दोनों मराठी मानुष के हक़ के लिए लड़ने का दावा जोर-शोर से करते रहे हैं.

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ठाकरे बंधु में समानता
दोनों को महाराष्ट्र और 'मराठी अस्मिता' के झंडाबरदार होने का दावा करते हैं और किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहते हैं. दोनों ही ख़ुद को मराठा सम्राट शिवाजी महाराज से प्रेरित बताते हैं.
दोनों में न तो विचारधारा का कोई फर्क दिखता है और न ही खानदान का. दोनों का सामाजिक आधार एक जैसा है. हालांकि उद्धव ठाकरे के बनिस्बत राज ठाकरे भले ही मराठी नौजवानों के बीच ज़्यादा लोकप्रिय हों लेकिन पारंपरिक मराठी मतदाताओं के बीच शिव सेना की पकड़ अभी भी मजबूत बनी हुई है और इसमें नौजवान वोटर भी शामिल हैं.
आज दोनों ठाकरे बंधु नरेंद्र मोदी के विरोध में जबर्दस्त तरीके से मुखर हो गए हैं. लेकिन चार बरस पहले यही राज ठाकरे मोदी की तारीफ़ों के गीत गाते हुए सुनाई देते थे.

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महाराष्ट्र की चुनावी तस्वीर
यहां तक कि राज ठाकरे ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए प्रचार भी किया था. साल 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले जब उद्धव ठाकरे ने बीजेपी के साथ हाथ मिला लिया था तो राज ठाकरे को लगा कि मोदी ने उन्हें धोखा दिया है.
लेकिन फिर भी दोनों भाई राज्य विधानसभा चुनावों तक मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी के साथ बने रहे. अक्टूबर, 2014 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों की तारीख की घोषणा के ठीक पहले उद्धव ठाकरे गठबंधन से बाहर निकल आए. एक बार फिर से दोनों भाई एक ही सियासी मोड़ पर खड़े मिले.
साल 2005 में जब से राज और उद्धव ने एक दूसरे से अपने रास्ते अलग किए हैं, दोनों का एक दूसरे पर सियासी तलवार भांजना जारी है. इस बात को एक दशक से ज्यादा अरसा बीत चुका है लेकिन दोनों भाइयों की रंजिश अब भी वैसी ही लगती है जैसी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के गठन के समय थी.

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मराठी मानुष का नारा
मराठी मानुष के पैरोकार लोगों को उम्मीद है कि शिव सेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना एक दिन एक हो जाएंगे. कभी-कभी ऐसा लगता है कि वे एक दूसरे के करीब आ रहे हैं और जैसे ही इसके आसार बनने लगते हैं तो दोनों एक दूसरे के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी शुरू कर देते हैं.
आख़िरकार दोनों ही मराठी मानुष के मुद्दे को चुनावी और सांस्कृतिक मोर्चे पर हराकर ही दम लेते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि इसका फ़ायदा या तो कांग्रेस को होता है या फिर शरद पवार की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी या फिर भारतीय जनता पार्टी को होता है.
और इसके बाद सोशल मीडिया पर खेला जाने वाला सियासी खेल शुरू हो जाता है. शिव सेना समर्थक कहे लगते हैं कि उद्धव ठाकरे की छवि खराब करने के लिए राज ठाकरे ने बीजेपी से हाथ मिला लिया है. दूसरी तरफ राज ठाकरे उद्धव पर अवसरवादी होने का आरोप लगाते हैं.

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राजनीतिक जटिलता
राज का कहना है कि मोदी पर लगातार हमला करने के बावजूद शिव सेना बीजेपी के साथ गठबंधन में बनी हुई है. और इन सब के बीच एनसीपी दोनों भाइयों की एक-एक करके तारीफ़ करने लगती है.
देवेंद्र फडणवीस की सरकार का सियासी मुश्किल में फंसना एनसीपी के लिए अच्छी ख़बर की तरह है. ये कांग्रेस के लिए भी खुशी की बात है क्योंकि ठाकरे बंधुओं का दुश्मन नंबर एक नरेंद्र मोदी हैं.
ये उलझी हुई पहली सियासी तौर पर अब और जटिल लगने लगी है. शिव सेना नारायण राणे को सबसे ख़तरनाक दुश्मन के तौर पर देखती है. जब बीजेपी ने नारायण राणे को एनडीए में शामिल करने का फैसला किया तो उसका मकसद उद्धव ठाकरे और शिव सेना को किनारे करना है.

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एनसीपी-बीजेपी का संबंध
नारायण राणे कैबिनट मीटिंग्स में कैसे शिव सेना के मंत्रियों के साथ बैठेंगे? इस सवाल के साथ ही उद्धव ठाकरे के निवास स्थल मातोश्री से ये ख़बरें आनी शुरू हो गईं कि शिव सेना फडणवीस सरकार से अलग होने जा रही है.
लेकिन बीजेपी ने ब्लैक मेल होने से इनकार कर दिया. अमित शाह ने पहले ही एनसीपी से भीतरखाने गठबंधन कर रखा है. बीजेपी और एनसीपी के बीच इस सियासी सौदे को प्रफुल्ल पटेल ने अंजाम दिया है.
आखिरकार अमित शाह की पहल और शरद पवार की मौन सहमति से बीजेपी ने अक्टूबर, 2014 में शिव सेना को राजनीतिक तलाक दिया था. बीजेपी अध्यक्ष के कहने पर ही नारायण राणे को देवेंद्र फडणवीस सरकार में कैबिनेट पोस्ट ऑफर की गई थी.

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भुजबल प्रसंग का असर
शिव सेना छोड़ने वाले लोगों में पहला नाम छगन भुजबल का लिया जाता है. 1990 में भुजबल ने सेना का दामन छोड़कर शरद पवार का साथ पकड़ लिया था. 1995 में सेना और बीजेपी की साझा सरकार में जब मनोहर जोशी मुख्यमंत्री और गोपीनाथ मुंडे उपमुख्यमंत्री बने तो इस छगन भुजबल सरकार के सबसे मुखर आलोचक के तौर पर उभरे.
अब छगन भुजबल जेल में हैं. भुजबल का जेल जाना कांग्रेस और एनसीपी के नेताओं को डराने का हथियार बन गया है. नारायण राणे इस जाल में फंस गए हैं. एनसीपी और कांग्रेस के कुछ नेता डरे हुए हैं. इसलिए ये सवाल पूछा जा रहा है कि कौन किसकी कमजोरी का फायदा उठा रहा है और कौन किसे ब्लैकमेल कर रहा है?
ये लड़ाई बीजेपी बनाम शिव सेना बनाम एनसीपी बनाम कांग्रेस बनाम मनसे बनाम शिव सेना बन गई है. महाराष्ट्र में राजनीतिक अवसरवाद इस कदर हावी है कि कौन किसके साथ खड़ा है, ये समझना मुश्किल लगता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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