ब्लॉग: अपने मां-बाप के ख़िलाफ़ मोहब्बत की जंग छेड़नेवाली औरतें

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- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
केरल में रहनेवाली 24 साल की हदिया की आप बीती इतनी भी ख़ास नहीं है.
हदिया हिंदू परिवार में जन्मीं पर वयस्क होने के बाद इस्लाम धर्म क़बूला और एक मुस्लिम मर्द से शादी कर ली.
उनके मां-बाप को ये बिल्कुल पसंद नहीं आया और उन्होंने उसे अपने घर में 'जबरन कैद' कर रखा.
भारत में दशकों से हिंदू औरतें मुस्लिम मर्दों से और मुस्लिम औरतें हिंदू मर्दों से शादी करती आई हैं.
दोनों तरह के मामलों में ज़्यादातर औरतों के परिवार ही कड़ा विरोध करते हैं. पर अब ये औरतें भी अपने परिवारों को उतनी ही टक्कर दे रही हैं.
अपने फ़ैसले ले रही हैं, उन पर अडिग हैं. जबकि शादी के रिश्ते में उन्हीं को मर्द के नाराज़ परिवार में अपनी जगह बनाने की जद्दोजहद करनी है, नए धर्म और संस्कृति को समझना है और अपनी दुनिया से रिश्ता तोड़ देना है.

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शहर छोड़ना पड़ा
और ये सब एक आदमी की मोहब्बत के विश्वास के बल पर करना है.
मैंने एक हिंदू मर्द और मुस्लिम औरत के जोड़े से उनकी पहचान छिपाने की शर्त पर बात की.
औरत के परिवार से जान के हमले के डर की वजह से उन्हें शहर छोड़ना पड़ा था.
वैसे तो दोनों परिवार उनके रिश्ते के ख़िलाफ़ थे. पर उन्हें लगता था कि अगर मर्द के परिवार को पता चला कि वो शादी कर चुके हैं तो उन्हें मानना पड़ेगा.
इसलिए सभी ख़तरों के बावजूद उन्होंने 'स्पेशल मैरिज ऐक्ट' के तहत छिपकर शादी कर ली और मर्द के घर पहुंच गए.
भारत में अलग धर्म के लोग क़ानूनी तौर पर 'स्पेशल मैरिज ऐक्ट' के तहत शादी कर सकते हैं.
वो मुझसे बोलीं, "भारत में शादी के बाद औरत अपना घर छोड़ मर्द के घर-परिवार में जाती है, तो जब हमारी शादी हुई और हम उनके घर गए, उनके परिवार को हमें अपनाना पड़ा."
पर औरतों के लिए ऐसा करना आसान नहीं है.

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बेइज़्ज़ती का डर
उनके मुताबिक, "हम ऐसे अपने फ़ैसलों का ऐलान नहीं कर सकते और माना जाता है कि हम अपने सही-ग़लत की समझ नहीं रखते हैं."
उनका परिवार उन्हें और उनके पति को साथ रहने से रोकने के लिए 'किसी भी हद' तक जा सकता था इसलिए वे दोनों शादी के अगले दिन ही शहर छोड़कर भाग गए.
अगले पांच साल तक उस औरत के परिवार ने उनसे बात तक नहीं की.
यहां तक कि उनके पिता की लंबी बीमारी की जानकारी भी उन्हें तब दी गई जब उनकी मौत हो गई.
वो कहती हैं कि उन्हें किसी बात का अफ़सोस नहीं, "पर सोचती हूं की मेरे मां-बाप को आज़ादी से लिए शादी के मेरे उस फ़ैसले पर यक़ीन क्यों नहीं हुआ, और सबसे बुरा तो यह है कि मेरे पिता ने मुझे अपनी सफ़ाई देने का मौका भी नहीं दिया."
ये उम्र या कम अनुभव की बात नहीं बल्कि नियंत्रण खोने और समाज में 'बेइज़्ज़त' होने के डर की अनुभूति है.
जैसा एक और मामले में दिखता है जहां एक हिंदू औरत ने अपने पसंद के मुस्लिम मर्द से शादी करने के लिए 10 साल इंतज़ार किया.

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आत्मनिर्भर होने के बाद भी मुश्किलें
जब उनकी मुलाकात हुई वो नौकरी करने लगीं थीं. अच्छी तनख़्वाह कमा रही थीं, अपना ख़याल रख सकती थीं, फिर भी मां-बाप राज़ी नहीं हुए.
उन्होंने कहा कि ये सब षड्यंत्र है और शादी करने के लिए अपना धर्म छोड़ दूसरा धर्म अपनाना पड़ेगा.
जबकि उस मर्द ने ऐसी शर्त कभी नहीं रखी और शादी के बाद भी ये वायदा निभाया.
वो मुझे बोलीं, "ये लव-जिहाद नहीं था, मेरा ब्रेन-वॉश नहीं किया गया था, मैं बस प्यार में थी, जैसे कोई भी वयस्क औरत हो सकती है."
पर उनके मां-बाप को ये समझने में 10 साल लग गए.
वो भी इसलिए माने क्योंकि वो अपनी बेटी पर निर्भर हो गए थे. उम्र बढ़ी और बीमारियां घर कर गईं. उनकी बेटी ही अब उनका घर चला रही थी और उनका ख़र्च उठा रही थी.
एक व़क्त ऐसा किया अब बेटी पर अपना नियंत्रण रखना मुमकिन नहीं था.
मोहब्बत होने के एक दशक बाद वो आखिरकार अपने दिल की कर पाईं.

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लव जिहाद का आरोप
वो कहती हैं, "मैं अपनी पसंद को लेकर बिल्कुल साफ़ थी, मैंने तो उसे ये तक कहा कि मेरे मां-बाप की रज़ामंदी के इंतज़ार में वो किसी मुस्लिम औरत से शादी करना चाहे तो कर ले, पर उसने मना कर दिया और कहा कि वो मेरा इंतज़ार करेगा, आखिर औरतें कोई भेड़-बकरियां थोड़े ही हैं."
हदिया का अनुभव और कड़वा ज़रूर है.
उनके मुताबिक, उनकी शादी के बाद मां-बाप ने उन्हें अपने घर में महीनों तक जबरन क़ैद करके रखा और सोमवार को उनकी रिहाई भी तभी मुमकिन हुई जब उनके पति ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया.
अब भी हदिया की शादी की पड़ताल हो रही है.
उनके पिता ने केरल हाई कोर्ट में याचिका दायर कर ये कहते हुए शादी का विरोध किया था कि ये 'लव जिहाद' है सिर्फ़ इसलिए की गई है ताकि उनकी बेटी को सीरिया में कथित इस्लामिक इस्टेट में काम करने के लिए भेजा जा सके.
केरल हाई कोर्ट ने शादी को रद्द क़रार दिया था. अब सुप्रीम कोर्ट को जनवरी में इस पर फ़ैसला सुनाना है.

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आज़ादी से जुड़ा है सवाल
पर अदालत के अंदर और बाहर, हदिया बुलंद आवाज़ में अपनी बात कहती रही हैं.
मीडिया के कैमरों के सामने वो कह चुकी हैं, "मैं मुसलमान हूं, मैंने ये धर्म अपनी मर्ज़ी से क़बूला है, किसी ने मुझे ज़बरदस्ती मुसलमान नहीं बनाया है, मैं न्याय चाहती हूं और अपने पति के साथ रहना चाहती हूं."
अपने जैसी और हिम्मती औरतों की ही तरह, अपनी पसंद के बारे में साफ़ समझ रखती हैं.
फिर वो पसंद ग़लत ही क्यों ना निकले, उस भूल से वो ख़ुद फिसल कर संभलना चाहती हैं. ठीक वैसे ही जैसे मर्दों को भी ग़लतियां करने की आज़ादी है.












