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नज़रिया: 'गांधी पर चली गोलियां अब सब तरफ चल रही हैं'
- Author, अपूर्वानंद
- पदनाम, लेखक और विश्लेषक
क्या किसी को याद है कि इस 30 जनवरी को गाँधी की हत्या के सत्तर साल हो गए हैं ?
यह तारीख़ हम हिन्दुस्तानियों के लिए उलझन पैदा करती है.
स्कूली किताबें इन सत्तर सालों में वह भाषा नहीं खोज पाईं, जिसमें इस तारीख़ और इस हत्या पर चर्चा की जा सके. आख़िर ऐसा क्या हुआ था कि जिस व्यक्ति को राष्ट्रपिता तक कहा गया, उसे आज़ादी मिलने के पाँच महीने बाद ही मार डालना ज़रूरी समझा गया ताकि वह और देश का 'नुक़सान' न कर सके?
गाँधी का काम पूरा हो चुका था. अंग्रेज़ भारत छोड़कर जा चुके थे. उनके जाने के बाद एक संभावना पैदा हुई थी कि भारत को वैसे ही हिन्दू राष्ट्र बनाया जाए जैसे पाकिस्तान इस्लामी राष्ट्र बन चुका था. यह नामुमकिन न था.
आख़िरकार भारतवर्ष में भी जिन्ना की तरह के सिद्धांतकार सावरकर और उनके सिद्धांतों को अमल में लानेवाले संगठन हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मौजूद थे!
पाकिस्तान के बदले हिंदू राष्ट्र
इस सिद्धांत के मुताबिक़ हिंदू और मुसलमान अलग अलग क़ौम हैं. इसलिए सावरकर को पाकिस्तान बनने पर परेशानी न थी. वे उसके बदले हिंदू राष्ट्र चाहते थे. इनका प्रभाव भारत के बहुसंख्यक हिंदुओं में कम नहीं था. यहाँ तक कि कांग्रेस पार्टी में इस विचार को माननेवाले अच्छी संख्या में मौजूद थे.
गाँधी के आख़िरी बरस इस विचारधारा से लड़ते हुए गुज़रे. वे जिस राष्ट्र के निर्माण के लिए संघर्ष कर रहे थे वह किसी के निष्कासन और बहिष्कार पर नहीं बन सकता था.
राष्ट्र एक प्रकार से पारंपरिक पड़ोस का ही विस्तार था. जो पड़ोस पहले से बने हुए थे, उन्हें एक नए अमूर्त राष्ट्र के नाम पर न तो तोड़ा जा सकता था, न किसी और पड़ोस से बदला जा सकता था. पाकिस्तान के बन जाने भर से वह पड़ोस ख़त्म हो जाएगा जो हिंदुओं और मुसलमानों का सदियों से रहा था, यह गाँधी के लिए अकल्पनीय था.
हिंदू सिर्फ़ हिंदू के साथ ही रह सकते हैं और मुसलमान मुसलमानों के साथ, यह तो उनकी बड़ी कमी होगी.
मुसलमान भी गांधी से नहीं थे सहमत
इसके मायने यह भी हुए कि हम किसी इंसानियत जैसे ख़याल की बात ही नहीं कर सकते. लेकिन गाँधी इसे कैसे मान लेते?
आख़िर वे वही तो थे जिन्होंने कहा था कि अगर मैं गीता भूल जाऊँ और वह पूरी तरह नष्ट हो जाए और मुझे सर्मन आन द माउंट याद हो तो भी उससे वही मसर्रत मिलेगी जो गीता से मिलती है.
लेकिन मुसलमानों का ख़ासा हिस्सा उनसे सहमत न हुआ. अपने पड़ोस की असलियत की जगह उसे पाकिस्तान की कल्पना अपनी ओर खींच रही थी.
यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि इस बहस में भी मुसलमानों का एक बड़ा भाग पाकिस्तान के विचार से सहमत न था और अनेक ऐसे थे जिन्हें वाकई इसका अहसास न था कि पाकिस्तान बन जाने का मतलब उनके पड़ोस का उजड़ जाना है.
गाँधी और उनके साथी नेहरू और सुभाष बोस पहले से एक धर्मनिरपेक्ष भारत का प्रस्ताव दे रहे थे. इस तरह के राष्ट्र में संख्याबल के चलते कोई धार्मिक समुदाय प्रमुख न होगा और उससे कम तादाद की वजह से दूसरे धार्मिक समूह दोयम दर्जे पर न होंगे.
इस धर्मनिरपेक्षता को धर्म से भय न था लेकिन वह राज्य के आचार को किसी धार्मिक भाषा में संचालित करने के हक़ में न था. गाँधी , जो धर्म रहित सार्वजनिक जीवन को सारहीन मानते थे, दृढ़ता से कह चुके थे कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में स्कूली शिक्षा का काम धर्म की शिक्षा देने का न होगा.
पाकिस्तान का प्रतिलोम बन कर रह जाएगा?
ब्रिटिश भारत से दो राष्ट्रों का जन्म होगा, यह जब निश्चित हो गया तो जो हिस्सा ख़ुद को भारत कह रहा था, उसमें सहकारी जीवन का उसूल क्या होगा? आख़िरकार नमूने के तौर पर पाकिस्तान सामने था: एक इस्लामी राष्ट्र. भारत क्या उसका प्रतिलोम बन कर रह जाएगा?
गाँधी की महत्वाकांक्षा कहीं बड़ी थी. वे इंसानी समाज के गठन की इस संकीर्ण परिधि के क़ैदी होकर कैसे रह जाएँ और क्योंकर अपने हमवतनों को इस तंगनज़री का शिकार होने दें? पाकिस्तान भले ही बन गया हो लेकिन उसके चलते सामाजिक जीवन के बड़े आदर्श की बलि नहीं दी जा सकती थी.
गाँधी कह तो यह रहे थे कि पाकिस्तान भी उतना ही उनका है जितना हिन्दुस्तान. लेकिन सच यही था कि पाकिस्तान तो जिन्ना का था जो उन्हें हिंदुओं का नेता भर मानते थे. गाँधी के लिए मानना मुश्किल था कि हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों और ईसाईयों की ज़िंदगियाँ साझा नहीं हो सकतीं, कि वे बिलकुल अलहदा-अलहदा समाज हैं. लेकिन गाँधी का यह विचार एक स्तर पर पीछे धकेल दिया गया था.
इस बात को समझने की ज़रूरत है कि पाकिस्तान के अलग बनने से गाँधी इसलिए दुखी न थे कि वृहत्तर भारत की कल्पना खंडित हो रही थी, बल्कि इसलिए कि पड़ोस टूट रहे थे.
नोआखाली में इसीलिए वे महीनों रहे. वह एक मुस्लिम बहुल इलाका था और वहाँ हिंदू प्रताड़ित हुए थे. विरोध के बावजूद गाँधी ने अपने करीबी सहयोगियों के साथ वहाँ डेरा डाल दिया.
'हिंसा के शिकार लोगों संग खड़े रहो'
"पड़ोसी की हिफाजत करो", मुसलमानों से उन्होंने कहा और हिन्दुओं को उनसे डरकर भागने से मना किया. नोआखाली गाँधी के लिए कितना महत्त्वपूर्ण था यह इससे समझ में आता है कि 1947 के 15 अगस्त के समय वे दुबारा वहाँ जाने की तैयारी कर रहे थे. बीच में कलकत्ता की हिंसा ने उन्हें रोक लिया.
आज़ादी के दिन गांधी कलकत्ता के बेलियाघाटा में थे. वे हिन्दुओं के बीच कुख्यात हो चुके शहीद सुहरावर्दी के साथ हैदरी मजिल में थे, मुसलमानों के बीच जो हिंसा के शिकार थे.
गाँधी के सिद्धांत और तरीके को समझने में कठिनाई न होनी चाहिए: जो हिंसा का शिकार हैं, उसके साथ खड़े रहो.
दूसरा सिद्धांत उन्होंने समझाया जब वे कलकत्ता से सितंबर में दिल्ली पहुँचे. यहाँ उन्होंने मुसलमानों के खिलाफ हिंसा देखी. सितंबर से जनवरी तक दिल्ली की आत्मा को जगाने की कोशिश में नाकामयाब गाँधी ने आखिरकार एक अहिंसक का अंतिम अस्त्र निकाला, उपवास का.
जब तक उन्हें दिल से यकीन नहीं होता कि दिल्ली में हिंदू और सिख मुसलमानों के साथ हिलमिल कर रहने को तैयार है, उनका उपवास जारी रहेगा.
'जब भी शक हो, हमेशा अल्पसंख्यक के साथ खड़े रहो'
इसी बीच उन्होंने कहा कि दक्षिण अफ्रीका में एक विदेशी मित्र ने उन्हें यह मंत्र दिया था: जब भी शक हो, हमेशा अल्पसंख्यक के साथ खड़े रहो. यह सिद्धांत यह नहीं कहता कि हिंदू भला है या मुसलमान. वह सीधी सी बात कहता है, जनतंत्र में और खुद को सभ्य कहनेवाले समाज में अल्पसंख्यक के अधिकार की रक्षा ही धर्म है.
इसीलिए उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उपवास भारत में मुसलमानों की तरफ से और पाकिस्तान में हिंदुओं और सिखों के लिए और दोनों देशों के बहुसंख्यकों के खिलाफ किया जा रहा है.
इतना काफी होता कि अल्पसंख्यक अधिकार के पक्ष में बात की जाए लेकिन गाँधी लाग लपेट न रखते थे. बहुसंख्यक हिंसा एक वास्तविकता है और कभी भी भड़क सकती है.
बहुसंख्यकवाद एक बीमारी है जो हर समाज में छिपी होती है और मौका देखते ही उसपर हावी हो सकती है. ज़रूरी है कि बहुसंख्यकवाद से हमेशा सावधान रहें और उसके खिलाफ भी हों. उसे सहलाएँ, फुसलाएँ नहीं.
'गांधी पर चली गोलियां अब सब तरफ चल रही हैं'
बहुसंख्यकवाद का विरोध ही था जिसने गाँधी के खिलाफ हिंदुओं के एक हिस्से में घृणा पैदा की. उस घृणा का संगठन मौजूद था. गाँधी के और जीवित रहने का मतलब था लगातार भारत में हिंदुओं के बीच बहुसंख्यकवादी विचार के ख़िलाफ एक मजबूत आवाज़ का बने रहना. उसे खामोश करना ज़रूरी हो गया था.
30 जनवरी,1948 को जो गोलियाँ गाँधी पर चलीं, वे इसी संगठित बहुसंख्यकवादी नफ़रत का इज़हार थीं. किसी एक अकेले जुनूनी के दिमागी खलल का नतीजा न थीं.
जो गोली गाँधी पर सत्तर साल पहले चली, भारत में वह अब सब तरफ चल रही है. भारत का सीना छलनी है, हज़ारों ज़ख्मों से खून बह रहा है. इस वक्त उसके साथ खड़ा होने के लिए कोई गाँधी नहीं!
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