You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
ग्राउंड रिपोर्टः 'मैं पानी लेने न जाता तो शायद ज़िंदा न होता'
- Author, मीना कोटवाल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
''मैं पानी लेने नहीं जाता तो आज उसकी (विशाल) जगह मैं भी हो सकता था.''
21 साल के प्रदीप कुमार उर्फ़ सोनू, विशाल के दोस्त हैं. विशाल उन पांच लोगों में शामिल थे जिनकी मौत दिल्ली के मोती नगर में सीवर साफ़ करने के दौरान ज़हरीली गैस से दम घुटने की वजह से हुई थी.
9 सितम्बर को हुए हादसे को याद करते हुए सोनू एक सांस में बताते चले जाते हैं. दिल्ली के मोती नगर इलाके में एक सोसाइटी में सीवर टैंक साफ करने उतरे 6 मज़दूरों में से 5 की मौत हो गई थी.
पढ़िए, पूरी घटना सोनू की ज़ुबानी
दोपहर के पौने दो बज रहे थे उनकी शिफ़्ट खत्म होने वाली थी.
सुबह सात बजे से दो बजे तक की शिफ़्ट लगी हुई थी. घर जाने की तैयारी कर ही रहे थे कि इतने में शिफ़्ट इंचार्ज दिगम्बर सिंह आकर कहते हैं कि आप लोगों को टैंक में उतरना पड़ेगा. हमने उन्हें साफ़ मना कर दिया था कि ये हमारा काम नहीं है. लेकिन उन्होंने हमारे बाद आने वाले दूसरी शिफ़्ट के लोगों के साथ हमें ज़बरदस्ती उतार दिया. हम भी ये सोचकर उतर गए कि 2 बजे शिफ़्ट खत्म हो जाएगी तो थोड़ी देर की ही बात हैं. हमने इससे पहले कभी ऐसा काम नहीं किया था इसलिए हमें इसकी भनक भी नहीं थी कि ये इतना ख़तरनाक हो सकता था.
वहां तीन टैंक थे, जिसमें दो-दो लोगों को भेजा गया था. और सभी टैंक के लिए केवल एक ही सीढ़ी बाहर निकलने के लिए दी गई थी.
इस तरह के टैंक में उतरने के लिए किस तरह की सेफ़्टी अपनानी पड़ती है हमें कुछ नहीं पता था. मैं और विशाल सबसे पहले एक ही टैंक में उतर गए, जो 20 फ़ीट से भी ज़्यादा गहरा था. थोड़ी देर बाद विशाल को प्यास लगी.
उसने मुझे ये कह कर भेज दिया कि तुम पानी पी भी आना और ले भी आना इसके साथ टाइम देख लेना क्योंकि हमारे पास फ़ोन नहीं था इसलिए हमें समय का पता ही नहीं था.
जब मैं पानी लेकर आया और विशाल को आवाज़ दी तो दूसरी तरफ से कोई आवाज़ नहीं आई. ठीक से देखा तो टैंक में मौजूद एक और छोटी सी सीढ़ी थी जिस पर विशाल लेटा हुआ था.
विशाल पूरी तरह होश में नहीं था वो मुझसे कहने लगा कि मेरी छाती में दर्द हो रहा है और सांस नहीं आ रही है.''
''इतना देख दूसरे दोस्त ने कमर में रस्सी बांधी और टैंक में उतर गया. विशाल को बाहर निकाला गया और अस्पताल ले कर भागे.''
एंबुलेंस में उसे होश था और वो यही कह रहा था कि मुझे सांस नहीं आ रही. एंबुलेंस में ऑक्सीजन भी नहीं थी. पहले एक प्राइवेट अस्पताल ले कर गए और जहां से विशाल को दिल्ली के सरकारी हॉस्पिटल आरएमएल (राम मनोहर लोहिया) में रेफर कर दिया गया, वहीं शाम को विशाल को सीवर में मौजूद ज़हरीली गैस के कारण मृत घोषित कर दिया गया.
इस दौरान सीवर में भेजने वाला कोई भी आदमी हमारे साथ नहीं था.
घर में सन्नाटा
जब हम विशाल के घर पहुंचे तो गली में सन्नाटा था विशाल के घर के बाहर उसके भाई और एक दो लोग मौजूद थे.
वे हमें टकटकी लगाए ऐसे देख रहे थे जैसे सामने आने वाला व्यक्ति ही उन्हें इंसाफ़ दिलाएगा.
अधूरा सा बना घर इतना छोटा था कि वहां सही से चार लोगों के बैठने की जगह भी नहीं थी इसलिए अंगद, जो विशाल के भाई हैं वे हमें पड़ोसी के घर ले जाकर बैठा देते हैं.
वहां मौजूद विशाल के पिता आंखों में आंसू लिए गुमसुम बैठे हैं. हमारे जाते ही वे हमसे साफ़ कह देते हैं जो भी बात करनी है मेरे बेटे से करें. मैं कुछ कह नहीं पाऊंगा.
क्या हैं दावे?
हालांकि मृतकों के परिवारवालों का कहना है कि इनमें से किसी का भी काम सीवर की सफ़ाई करना नहीं था. ये सभी दूसरे काम के लिए हायर किए गए थे, जैसे हाउसकीपिंग, हेल्पर और पंप ऑपरेटर.
मृतकों में 19 साल के विशाल के अलावा इनमें राजा (20), सरफ़राज (19), उमेश (22) और पंकज (26) शामिल थे. पंकज और उमेश उत्तर प्रदेश से रोज़गार के लिए आए थे, जबकि राजा और सरफ़राज बिहार से थे.
9 सिंतबर को दिल्ली के मोतीनगर के डीएलएफ ग्रीन अपार्टमेंट्स में सीवर टैंक की मरम्मत का काम चल रहा था, जिसका कॉन्ट्रैक्ट जेएलएल (जॉन्स लांग ला-साल) को दिया गया था और जेएलएल ने इसका काम उन्नति इंजीनियरिंग एंड कॉन्ट्रेक्टर प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को दिया था.
सभी मृतक उन्नति के लिए काम करते थे, जिसमें विशाल लगभग छह महीने से पंप ऑपरेटर का काम करते थे. उन्हें हर महीने की सैलरी चेक से दी जाती थी.
वहां मौजूद विशाल के बड़े भाई अंगद ने हमें बताया कि वो तो रविवार को जाता भी नहीं था. लेकिन उस दिन उसे फ़ोन करके बुलाया गया.
दिल्ली के मंगोलपुरी में रहने वाले विशाल के परिवार में पापा-मम्मी के अलावा तीन बड़ी बहनें और एक बड़ा भाई हैं. दो बहनें शादीशुदा हैं.
"पढ़ाई में वो खास़ नहीं था लेकिन हमेशा से कुछ करना चाहता था", ये कहते हुए अंगद फूट-फूटकर रोने लगते हैं.
'मेरे बेटे की मौत नहीं हत्या हुई है'
इस घटना पर मोती नगर के एसएचओ मनमोहन सिंह बताते हैं कि हमने इस मामले में 33 साल के अजय चौधरी को गिरफ़्तार कर लिया गया है.
अजय जेएलएल के इंजीनियर हैं. उन पर गैर इरादतन हत्या, लापरवाही के कारण मौत और एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज़ कर लिया गया है और आगे की कार्रवाई की जा रही है.
बीबीसी ने जेएलएल और उन्नति के शिफ़्ट इंचार्ज और एमडी से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन सभी का मोबाइल फ़ोन फिलहाल बंद है.
वहां से निकलते वक्त जो पिता बेटे की मौत पर गमगीन बैठे हुए थे, उन्होंने करीब आकर कहा कि उनके साथ जो हुआ वो नहीं चाहते कि किसी और के साथ ऐसा हो.
वो कहते हैं, ''हमें कुछ नहीं चाहिए हमें सिर्फ इंसाफ़ चाहिए. ये मौत, मौत नहीं हत्या है जो लापरवाही की वजह से हुई है.''
सीवर में मौत के आंकड़े
ग़ैर-सरकारी संस्था प्रैक्सिस ने एक रिपोर्ट के हवाले से कहा है कि हर साल दिल्ली में करीब 100 सीवर कर्मचारियों की काम के दौरान ज़हरीली गैसों की वजह से मौत हो जाती है.
वर्ष 2017 जुलाई-अगस्त के मात्र 35 दिनों में 10 सीवर कर्मचारियों की मौत हो गई थी. सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन के मुताबिक, उसने 1993 से अब तक पूरे भारत में हुईं करीब 1500 मौतों के दस्तावेज़ जुटाए हैं लेकिन असल संख्या कहीं ज़्यादा बताई जाती है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)