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अडल्ट्री क़ानून और मस्जिद में नमाज पढ़ने पर आ सकता है फ़ैसला
- Author, मानसी दाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
गुरुवार को देश के सर्वोच्च न्यायालय में दो अहम फ़ैसले आ सकते हैं.
पहला है अडल्ट्री यानी व्याभिचार से जुड़ा मामला जिसमें कोर्ट इस बात का फ़ैसला करेगी कि आईपीसी की धारा 497 के तहत अडल्ट्री क़ानून के तहत पुरुष और महिला दोनों को बराबर सज़ा मिलनी चाहिए या नहीं. और दूसरा है राम मंदिर- बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़ा मामला - मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है या नहीं.
इटली में रहने वाले एनआरआई जोसेफ़ शाइन ने दिसंबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी. उनकी अपील थी कि आईपीसी की धारा 497 के तहत बने अडल्ट्री क़ानून में पुरुष और महिला दोनों को ही बराबर सज़ा दी जानी चाहिए.
इस याचिका के जवाब में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि ऐसा करने के लिए अडल्ट्री क़ानून में बदलाव करने पर क़ानून हल्का हो जाएगा और समाज पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा. जानकार मानते हैं कि इस फ़ैसले का असर कई और मामलों पर भी पड़ सकता है.
सुप्रीम कोर्ट की वकील करुणा नंदी कहती हैं, "इस फ़ैसले का असर कई अन्य मामलों पर भी पड़ सकता है. जैसे, मेरिटल रेप यानी शादी में बलात्कार का मामला ले लें तो इसके मूल में हैं दो पक्षों की सहमति."
"अगर दोनों की सहमति से हो रहा है तो ये आपराधिक मामला नहीं होना चाहिए. अडल्ट्री के मामले में भी अगर सहमति है तो ये आपराधिक मामला नहीं होना चाहिए."
1860 में बना अडल्ट्री क़ानून लगभग 157 साल पुराना है. इसके तहत अगर कोई पुरुष किसी दूसरी शादीशुदा औरत के साथ उसकी सहमति से शारीरिक संबंध बनाता है, तो महिला के पति की शिकायत पर पुरुष को अडल्ट्री क़ानून के तहत गुनहगार माना जाता है. ऐसा करने पर पुरुष को पांच साल की क़ैद और जुर्माना या फिर दोनों ही सज़ा का प्रवाधान है.
हालांकि इस क़ानून में एक पेच यह है कि अगर कोई शादीशुदा मर्द किसी कुंवारी या विधवा औरत से शारीरिक संबंध बनाता है तो वह अडल्ट्री के तहत दोषी नहीं माना जाएगा.
क़ानून पर आपत्ति
इस पर विवाद ये है कि जब दो वयस्कों की मर्जी से कोई विवाहेत्तर संबंध स्थापित किए जाते हैं तो इसके परिणाम में महज़ एक पक्ष को ही सज़ा क्यों दी जाए? विशेष तौर से पुरुष इस क़ानून पर आपत्ति दर्ज करवाते हैं.
लेकिन करुणा नंदी ऐसा नहीं मानतीं. वो कहती हैं कि इसके उलट धारा 497 का प्रावधान महिलाओं को 'संपत्ति' की तरह देखता है, जो नहीं होना चाहिए.
करुणा कहती हैं, "कुछ लोगों को लगता है कि पति, पत्नी के ख़िलाफ़ मामला नहीं ला सकते और महिलाओं के अधिकार अधिक हैं. लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है. क्योंकि महिला की इच्छा के बारे में ध्यान दिया ही नहीं गया."
"ये 1860 का क़ानून है और विक्टोरियन मानसिकता को दर्शाता है. कोई नहीं कह रहा ये अडल्ट्री अच्छी चीज़ होती है लेकिन इसे आपराधिक बनाना अलग ही बात है."
क्या है अडल्ट्री क़ानून?
ये मामला इसी साल पांच जनवरी को सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, जब चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने इस जनहित याचिका को संवैधानिक बेंच के पास भेज दिया था.
ऐसा भी नहीं है कि अडल्ट्री पर पहली बार सवाल उठाए गए हों, इससे पहले 1954, 1985 और 1988 में भी अडल्ट्री पर सवाल पूछे गए थे. पिछले साल भी सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पूछा था कि सिर्फ़ पुरुष को गुनहगार मानने वाला अडल्ट्री क़ानून पुराना तो नहीं हो गया है?
वहीं 1954 और 2011 में दो बार इस मामले पर फ़ैसला भी सुनाया जा चुका है, जिसमें इस क़ानून को समानता के अधिकार का उल्लंघन करने वाला नहीं माना गया.
आईपीसी की धारा 497 के तहत अगर किसी विवाहित महिला के साथ कोई गैर पुरुष संबंध बनाता है तो उसके ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है. ऐसे मामलों में अगर महिला की सहमति ना हो तो ऐसी स्थिति में पुरुष पर बलात्कार का मामला बनता है जो आपराधिक मामलों की श्रेणी में आता है.
लेकिन अगर ऐसे मामले में महिला की सहमति शामिल हो तो भी महिला के पति के शिकायत पर पुरुष के ख़िलाफ़ इस धारा के तहत कर्रवाई की जा सकती है और ये मामला व्याभिचार का बनता है.
फ़ारूक़ी फ़ैसले पर बड़ा फ़ैसला
इसके साथ ही एक अन्य मामला जिस पर फ़ैसला आ सकता है वो है राम मंदिर- बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़ा मामला - मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है या नहीं. फ़िलहाल इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ सुनवाई कर रही है.
इस मामले में कोर्ट ये फ़ैसला कर सकती है कि संविधान पीठ के 1994 के इस्माइल फ़ारूक़ी फ़ैसले को बड़ी बेंच को भेजने की जरूरत है या नहीं. इस्माइल फ़ारूक़ी केस में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था, "मस्जिद में नमाज पढना इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है."
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य ज़फ़रयाब जिलानी कहते हैं, "इस मुक़दमे की कोई ख़ास अहमियत नहीं होगी क्योंकि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जिन मामलों पर फ़ैसला दिया था, जिनकी अपीलों सुप्रीम कोर्ट में चल रही हैं उनमें ये मुद्दा बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं था."
"लेकिन इस मामले में 1994 के एक जजमेन्ट पर ऑब्ज़र्वेशन था जिसके बारे में हमारे वकीलों ने कहा कि इस पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए. कोर्ट इस पर अपना फ़ैसला देगी."
ज़फ़रयाब जिलानी कहते हैं, "अगर पुनर्विचार किया जाएगा तो बड़ी बेंच को रेफर कर दिया जाएगा नहीं तो अपीलों पर सुनवाई शुरू हो जाएगी."
माना जा रहा है कि इस फ़ैसले का असर राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद मामले पर भी पड़ सकता है. लेकिन ज़फ़रयाब जिलानी मानते हैं कि इसका राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद मामले से कोई लेना-देना ही नहीं है.
इसी साल सुप्रीम कोर्ट ने 20 जुलाई को इस मुद्दे पर सभी पक्षों की बहस सुनकर फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था.
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