इलाहाबाद का नाम तो बदल दिया पर इसे भुलाना आसान नहीं

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
'इलाहाबाद' का नाम अब 'प्रयागराज' हो गया है, घोषित तौर पर भी और आधिकारिक तौर पर भी.
अब जहां-जहां भी 'इलाहाबाद' शब्द है, उसे तुरंत बदल देने की इस क़दर क़वायद हो रही है, जैसे ये डर हो कि किसी कोने से ये लौटकर दोबारा न आ जाए.
लेकिन ये शब्द भी सरकार के पीछे कुछ इस तरह पड़ा है कि इसकी तुलना चूहे-बिल्ली के खेल वाले या फिर तू डाल-डाल, मैं पात-पात वाले मुहावरे से की जा सकती है.
यानी, सरकार इसे जितना ख़त्म करने की कोशिश कर रही है, घूम-फिर कर कहीं न कहीं से ये शब्द फिर सामने आ ही जा रहा है.
और ये एक ऐसे मौक़े पर सरकार की परेशानी का सबब बन रहा है जब वो कुंभ मेले की तैयारियों में लगी है और उससे पहले कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों में व्यस्त है.
कुंभ मेले के बाद लोकसभा चुनाव में भी सत्ताधारी पार्टी को व्यस्त रहना है.
प्रयागराज नाम से...

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इलाहाबाद का प्रयागराज में नामकरण अब हुआ है लेकिन पहले लोग इन दोनों शहरों को अलग-अलग ही जानते थे, सिवाय प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के.
ऐसा शायद ही कोई हो जिसने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मुंह से पहले भी कभी 'इलाहाबाद' शब्द सुना हो.
वो इस शहर को प्रयागराज नाम से ही जानते और पुकारते रहे हैं.
पिछले साल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ से एक मुलाक़ात में जब मैंने ये सवाल किया कि क्या इलाहाबाद समेत कुछ शहरों के नाम बदलना भी उनके एजेंडे में है और है तो ये कब होगा, तो उन्होंने मुस्कराते हुए जवाब दिया, "जब करेंगे तो सबसे पहले आपको ही बताएंगे."
उनकी इस मुस्कराहट से ऐसा लगा कि शायद उनके एजेंडे में ये अभी नहीं है.
लेकिन कुंभ की तैयारियों के दौरान इलाहाबाद में जब अखाड़ा परिषद ने उनके सामने ये मांग रख दी तो उनसे रहा नहीं गया और फिर उन्होंने वहीं इसकी घोषणा ही कर दी.



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इस घोषणा के बाद ये तय हो गया कि कुंभ के पहले इलाहाबाद का नाम बदल जाएगा लेकिन इस घोषणा पर अमल अगली ही कैबिनेट बैठक में हो गया.
इलाहाबाद के बाद अयोध्या में भव्य दीपोत्सव के मौक़े पर योगी आदित्यनाथ ने फ़ैज़ाबाद का नाम बदलकर पूरे ज़िले का नाम अयोध्या कर दिया.
पिछले साल भी दीपोत्सव के मौक़े पर उन्होंने फ़ैज़ाबाद और अयोध्या नगर पालिकाओं को मिलाकर अयोध्या नगर निगम बनाने की घोषणा की थी.
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सरकार का पीछा
ज़िले का नाम बदलने के बाद भी न तो फ़ैज़ाबाद शब्द ख़त्म हो रहा था और न ही इलाहाबाद.
मंडल यानी कमिश्नरी के नाम अब भी यही थे. आख़िरकार, एक कैबिनेट की बैठक में मंडलों के नाम भी बदल दिए गए.
अब राजस्व इकाई के तौर पर तो फ़ैज़ाबाद शब्द चला गया लेकिन इलाहाबाद शब्द सरकार का पीछा अभी भी नहीं छोड़ रहा है.

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हाईकोर्ट, यूनिवर्सिटी, रेलवे स्टेशन, कुछ संस्थाओं के नाम, इलाहाबाद बैंक जैसी जगहों पर ये शब्द अभी भी क़ायम है, नगर निगम के ज़रिए राजस्व इकाई के तौर पर भी ये वैसा ही बना हुआ है जैसा पहले था.
हालांकि इलाहाबाद की मेयर अभिलाषा गुप्ता ने कहा है कि इस संबंध में प्रस्ताव भेजा जा चुका है और जल्द ही नगर निगम का नाम भी प्रयागराज हो जाएगा.
इलाहाबाद का नाम
नगर निगम के अलावा अन्य जगहों और संस्थाओं के नाम बदलने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है लेकिन इनकी रफ़्तार वैसी नहीं है जैसा कि योगी जी की घोषणाओं के अमलीकरण की थी.



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रेलवे स्टेशन का नाम बदलने की प्रक्रिया चल रही है लेकिन हाईकोर्ट और विश्वविद्यालय से चिपका ये शब्द इतनी जल्दी साथ छोड़ देगा, ऐसा लगता नहीं है.
साथ ही, संसदीय सीट के तौर पर भी इलाहाबाद का नाम बदलना मुश्किल तो नहीं है, लेकिन कितनी जल्दी हो पाएगा, कहना मुश्किल है.
वहीं जानकारों का कहना है कि ये सब इतना आसान काम नहीं है लेकिन जब सरकार ने फ़ैसला ले ही लिया है तो प्रशासन को उस पर अमल करना ही पड़ेगा.
वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं, "सरकार ने जिस जल्दबाज़ी में ये फ़ैसले लिए, उसका राजनीतिक लाभ उसे क्या मिलेगा ये समय बताएगा. लेकिन प्रशासनिक अनुभव में वो अभी भी कितनी कमज़ोर है, इससे साफ़ पता चलता है."
"नाम बदलने के संदर्भ में न तो सरकार अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर पा रही है और न ही इसके लिए उसकी कोई तैयारी दिख रही है. ऐसा लगता है कि जिस दिन जो मन में आया, वो कर दिया."


कई और शहरों के नाम
दूसरी ओर, कई और शहरों के नाम बदलने की मांग हो रही है और ऐसा माना जा रहा है कि देर-सवेर ये बदले भी जा सकते हैं.
लेकिन जहां तक सवाल इलाहाबाद के नाम बदलने का है तो इलाहाबाद में और इलाहाबाद से जुड़े अभी भी कई ऐसे लोग हैं जो सरकार के इस फ़ैसले को पचा नहीं पा रहे हैं.

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र रहे दिल्ली में एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी कहते हैं कि नाम बदलने से ऐसा लग रहा है जैसे इसका नाम पहले प्रयागराज था, फिर इलाहाबाद हुआ और अब फिर प्रयागराज है. जबकि ऐसा नहीं है.
उनके मुताबिक़, "पहले यह प्रयाग था जो सभी तीर्थों का राजा माना जाता था. उस प्रयाग का धार्मिक और पौराणिक महत्व था जो आज भी क़ायम है. इलाहाबाद नाम से जो शहर बसाया गया, कालांतर में उसकी राजनीतिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और क़ानून के क्षेत्र में एक अलग पहचान बनी जो कमोबेश आज भी ज़िंदा है."
"ये पहचान भी वैसी ही गौरवपूर्ण विरासत को सहेजे हुए है जैसी छवि प्रयाग की धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में है. प्रयागराज शब्द तो सिवाय मनमानी के और कुछ नहीं लगता."


इलाहाबाद के लोग
इलाहाबाद के रामबाग इलाक़े में रहने वाले सुमित बसु चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं. वो कहते हैं कि उनका परिवार चार पीढ़ियों से इलाहाबाद में रह रहा है.
सुमित के मुताबिक़, बाप-दादा नौकरी की तलाश में बंगाल से चलकर इलाहाबाद आए और फिर यहीं बस गए.
सुमित हँसते हुए कहते हैं, "ज़ाहिर है, नौकरी की तलाश में इलाहाबाद ही आए होंगे, प्रयाग नहीं."

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इलाहाबादी लहज़ा लिए हुए ठेठ अवधी में बात करने वाले सुमित कहते हैं "इलाहाबाद को जीने वाला व्यक्ति इलाहाबादी ही रहेगा, शहर का, मंडल का, नगर निगम का या मोहल्ले का ही नाम कुछ भी क्यों न कर दिया जाए."
इलाहाबाद के लोग इस शहर में आध्यात्मिकता, आधुनिकता, बौद्धिकता, रचनात्मकता और फक्कड़ता का ऐसा सुंदर संगम देखते हैं कि यहां एक बार आने वाला व्यक्ति जीवन भर इस शहर का मुरीद हो जाता है.
इतिहास समेटे हुए...
अनौपचारिक बातचीत के दौरान इतिहासकार लाल बहादुर वर्मा ने कहा, "इस शहर की बुनियाद में एक ऐसी उदारवादी संस्कृति छिपी है जो इसे अद्वितीय बनाती है. नेहरू की कांग्रेस पार्टी का केंद्रबिंदु होते हुए भी इसने वामपंथ, समाजवाद और यहां तक कि आरएसएस के लिए भी वैचारिक आयाम प्रदान किए. यही इस शहर की विशेषता है."
यही वजह है कि इलाहाबाद शब्द को इतिहास बनाने के लिए सरकार चाहे जितनी कोशिश करे, लोगों के दिलों में यह शब्द अपने नाम में तमाम इतिहास समेटे हुए एक ऐसी संस्कृति के रूप में जज़्ब है कि उसे निकाल पाना संभव नहीं है.
आधिकारिक तौर पर शहर का नाम बदलने संबंधी फ़ैसले का पुरज़ोर समर्थन करने वाले और फ़िलहाल दिल्ली में रह रहे एक पत्रकार मित्र ने ऑफ़ द रिकॉर्ड बातचीत में जो कहा, उसे इस पूरे विश्लेषण का निचोड़ कह सकते हैं.
उनका कहना था, "यार रहब तो हम इलाहाबदियै, अख़बार और टीवी पे चाहै जऊन बोली."


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