लालू-पीके की मुलाक़ात को लेकर राबड़ी देवी के दावे में कितना है दम

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- Author, नीरज सहाय
- पदनाम, पटना से बीबीसी हिंदी के लिए
- पढ़ने का समय: 4 मिनट
बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने शुक्रवार को दावा किया था कि चुनावी रणनीतिकार और जेडीयू नेता प्रशांत किशोर ने उनके पति लालू प्रसाद से मिलकर राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड के विलय की बात की थी और वापस महागठबंधन में आने की इच्छा जताई थी.
राबड़ी के अनुसार किशोर ने कहा था कि वो विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव को बतौर मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करें. इस संबंध में वे पांच बार हम लोगों से मिले थे. लेकिन, एक बार धोखा मिलने के बाद उनपर भरोसा नहीं रहा था. मैंने उनसे घर से निकल जाने को कहा था.

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शनिवार को पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने अपने बयान को फिर से मीडिया के सामने फिर दुहराया.
इसके बाद जदयू उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने ट्वीट के माध्यम से लालू परिवार को खुली चुनौती दे डाली. उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा कि लालू प्रसाद जी जब चाहें मेरे साथ मीडिया के सामने बैठ जाएँ, सबको पता चल जाएगा कि मेरे और उनके बीच क्या बात हुई और किसने किसको क्या ऑफर दिया था?
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पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और जदयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर के बीच की तनातनी ने राज्य का सियासी पारा बढ़ा दिया है.
राजद के प्रदेश प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा, ''राबड़ी देवी जी ने जो आरोप लगाये हैं उसके सबूत हमारे पास हैं.
महागठबंधन में टूट के छह माह के बाद से ही मीडिया में इससे जुड़ी खबरें आ रही थीं. जदयू के नेताओं का अविश्वसनीय चेहरा जनता के सामने आ गया है.''
''अब ओपन डिबेट करने की बात कर रहे हैं. लालू जी, तेजस्वी जी और राबड़ी देवी जी से डिबेट के लिए उनका कद बहुत छोटा है. इसके लिए हमलोग ही काफी हैं".
वहीं, जदयू के प्रदेश प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद इसे लोकसभा चुनाव के पहले चरण में महागठबंधन के ख़राब प्रदर्शन से उपजी बौखलाहट को मान रहे हैं.

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उन्होंने कहा, '' राजद का यह हथकंडा, एजेंडा हाईजैक करने की नाकाम कोशिश है. झूठ और बेईमानी परोसने में लालू जी और उनके कुनबे का कोई मुकाबला नहीं है. एक बार बायोग्राफ़ी में कुछ झूठी कहानियां गढ़ीं तो प्रशांत किशोर जी ने उनकी बखिया उधेड़ दी थी. इसके बाद भी राजद नेताओं के बयान आ रहे हैं. जनता का भरोसा नीतीश जी के साथ है. वो जानती है कि नीतीश जी बेटे की सियासत नहीं करते हैं. "
जानकार बताते हैं कि दोनों दलों के बीच मची तनातनी की पृष्ठभूमि साल 2017 में महागठबंधन में टूट और जदयू के एनडीए में शामिल होने के छह माह के बाद पड़ी थी.
वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार पांडेय इसके बारे में विस्तार से बताते हैं.
वह कहते हैं कि "नीतीश कुमार के एनडीए में जाने के बाद कई ऐसे मौके आये जब यह देखा गया कि उन्होंने भाजपा से सत्ता में सम्मानजनक हिस्सेदारी ले ली है. लेकिन, बाद में वो कुछ फंसे दिख रहे थे. केंद्रीय मंत्रिपरिषद में जदयू को कोई जगह नहीं मिलना, पटना विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा नहीं देना इसके दो- तीन ताज़ा उदाहरण थे.''
''इन प्रकरणों से एक संदेश ये भी गया कि नीतीश जी का कद वाजपेयी-आडवाणी जी के काल वाला नहीं रहा है. संयोग रहा कि उसी दौरान लालू बीमार हुए और प्रशांत किशोर उनसे मिलने पहुंचे और सीएम नीतीश कुमार ने टेलीफोन पर दो बार उनका हाल-चाल पूछा था. इसने घटना ने कई चर्चाओं को जन्म दिया. मीडिया में भी कई रिपोर्ट आयी.''

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''हाल में लालू जी ने अपनी किताब "गोपालगंज टू रायसीना" में खुलासा किया है कि प्रशांत किशोर उनसे कुछ महत्वपूर्ण प्रस्तावों के साथ मिले थे.
लालू प्रसाद से मिलने की पुष्टि पीके भी कर रहे हैं. यह दो लोगों के बीच की बात है. आज जो आरोप राबड़ी जी लगा रहीं हैं उससे आम लोगों के बीच नीतीश कुमार के महागठबंधन में वापस जाने की चर्चा की संभावना को बल दिया है.''
असल में दोनों के बीच क्या बात हुई थी यह वे दोनों ही जान रहे हैं. दूसरी ओर प्रशांत किशोर का यह कहना कि वह भी कई बातों का खुलासा कर सकते हैं. यह साबित करता है कि दोनों के बीच कोई न कोई अंतरंग बात जरुर हुई होगी. "
वही, बायोग्राफ़ी के सह-लेखक नलिन वर्मा का मानना है कि लालू और नीतीश जी एक कद्दावर नेता हैं. दोनों की अपनी-अपनी क्षमताएं हैं. किताब में कोई बात आ जाने से मुझे नहीं लगता कि इससे लालू जी का जनाधार बढ़ेगा और न ही इससे नीतीश जी का जनाधार घटेगा.
इस तरह की बात चुनावी माहौल में आम हैं. इससे बहुत ज्यादा हेरफेर नहीं होने जा रहा है. चुनाव के दौरान प्रतिद्वंदी दलों द्वारा एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप गढ़ने का दौर जारी रहेगा. यह सब चुनाव तक चलता रहेगा.
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