कश्मीर पर सरकार का फ़ैसला, शिमला के कुली क्यों परेशान?

इमेज स्रोत, Pradeep kumar/bbc
- Author, अश्विनी शर्मा
- पदनाम, शिमला से, बीबीसी हिंदी के लिए
गुलाम हसन, कश्मीर के अनंतनाग ज़िले के निवासी हैं. जो बीते 35 सालों से शिमला में रह रहे हैं और कुली का काम करते हैं.
चाहे सर्दियों में बर्फ़ से लिपटी शिमली की वादियां हों या फिर गर्मियों में चलने वाला टूरिस्ट सीज़न. गुलाम हसन दिन-रात कड़ी मेहनत कर अपना परिवार चलाते हैं.
वो ईद और दूसरे त्योहारों पर कभी-कभी घाटी में बने अपने घर जाते हैं. लेकिन अधिकतर अपने बच्चों और पत्नी से बात करने के लिए उनका एकमात्र सहारा मोबाइल फ़ोन ही होता है.
बीते 48 घंटों से गुलाम हसन अपने परिवार से बात नहीं कर पाए हैं. अपनी चिंता ज़ाहिर करते हुए उन्होंने बताया, ''फ़ोन काम नहीं कर रहे. पिछले दो दिन से परिवार के साथ संपर्क नहीं हो पाया है. वहां क्या हो रहा है? कैसे हो रहा है? मुझे कुछ भी पता नहीं चल रहा. मैं बहुत परेशान हूं. घाटी में कर्फ्यू लगा हुआ है.''
गुलाम हसन की तरह ही 32 साल के फ़िरोज़ भी कश्मीर से हैं जो शिमला में कुली का काम करते हैं. कश्मीर में बदलते हालात से फ़िरोज़ भी परेशान हैं.

इमेज स्रोत, Pradeep Kumar/bbc
पीठ पर एलपीजी सिलेंडर लादे फ़िरोज़ धीमे कदमों से चढ़ाई चढ़ते जाते हैं लेकिन उनके चेहते पर सिलेंडर के भार से ज़्यादा कश्मीर के हालात की परेशानी दिखती है.
फ़िरोज़ कहते हैं, ''मैंने टीवी टेलीविज़न पर देखा कि मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 में बदलाव किए हैं और सेक्शन 35-ए को हटा दिया है. मुझे नहीं मालूम कि इसका हम कश्मीरियों की ज़िंदगी पर क्या असर पड़ेगा. मैं तो अनपढ़ आदमी हूं. यह राजनीतिक मुद्दा है.''
''हो सकता है यह फ़ैसला हमारे राज्य के लिए अच्छा हो, लेकिन यह वक़्त गलत है. मुझे ईद के लिए अपने परिवार को पैसे भेजने हैं. लेकिन वहां कोई एटीएम काम नहीं कर रहा. यहां तक कि मोबाइल फ़ोन भी बंद पड़े हैं.''
जम्मू कश्मीर को दो हिस्सों में बांटने के मोदी सरकार के ऐतिहासिक फ़ैसले के बारे में भले शिमला में मौजूद कश्मीरी आवाम खुलकर कुछ ना बोल रही हो, लेकिन उन्होंने इसकी आलोचना ज़रूर की है.
इसकी सबसे बड़ी वजह तो यह है कि कश्मीर में इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं ठप्प करने से वो अपने परिवारों से कट गए हैं. इसके साथ ही कश्मीर के नेता भी सोशल मीडिया या टीवी चैनलों पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए नहीं आ सके हैं.
इन्हीं हालात की वजह से शिमला में रहने वाले तमाम कश्मीरी कुली परेशान हैं.

इमेज स्रोत, Pradeep kumar/bbc
शिमला की लाइफ़लाइन
शिमला में लगभग 8 हज़ार कश्मीरी कुली रहते हैं. इनमें से अधिकतर अनंतनाग और कुलगाम ज़िलों से आते हैं. इन कुलियों को शिमला में 'ख़ान' कहकर बुलाया जाता है.
इन कश्मीरी कुलियों के बिना शिमाल में व्यापार, पर्यटन और दूसरे ज़रूरी काम कर पाना बहुत मुश्किल होता है. एक तरह से ये कुली शिमला की लाइफ़लाइन बन चुके हैं.
ये कुली लोगों के घरों तक एलपीजी सिलेंडर पहुंचाते हैं, पर्यटकों को होटल तक लाते हैं, उनका सामान उठाते हैं. इसके अलावा भी तमाम तरह के बोझ उठाने वाले काम करते हैं.

इमेज स्रोत, Pradeep kumar/bbc
मुश्किल हालात
कश्मीर में होने वाली कोई भी हलचल शिमला में मौजूद कुलियों को परेशान कर देती है. शहर में जिन इलाकों में यह कुली रहते हैं उन्हें 'ढेरे' कहा जाता है.
कुछ कश्मीरियों ने शिमला में अपना खुद का व्यापार भी शुरू कर दिया है. जिसमें शॉल बेचना, कश्मीरी हैंडलूम, ढाबे और दूसरे काम शामिल हैं.
अनंतनाग से ही ताल्लुक रखने वाले मंज़ूर अहमद कहते हैं, ''शिमला बहुत ही शांत जगह है. हममें से कुछ लोग तो यहां 1970 से रह रहे हैं. यहां के स्थानीय लोगों ने हमें कभी परेशान नहीं किया. इनमें से अधिकतर हिंदू समुदाय से हैं. लेकन जब भी कश्मीर में कुछ बिगड़ता है. हमें चिंता सताने लगती है कि पता नहीं शिमला के लोग इस पर कैसी प्रतिक्रिया देंगे.''
मंज़ूर कहते हैं कि अमरनाथ यात्रा को अचानक रोक दिया गया. होटल खाली करवा दिए गए. पर्यटकों को कहा गया कि घाटी छोड़ दें. टेलीफ़ोन यहां तक कि लेंडलाइन और पोस्टपेड मोबाइल भी ठप कर दिए गए. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. वो भी तब जबकि घाटी में पर्यटन बढ़ रहा था.
मंज़ूर अहमद आरोप लगाते हैं, ''हम सुन रहे हैं कि अनुच्छेद 370 को हटा दिया है. हमें कोई अंदाज़ा नहीं कि आगे क्या होगा. हमें अपने परिवारों की चिंता सता रही है. परिवार के साथ बात करने या संपर्क करने का कोई ज़रिया ही नहीं है.''
हालांकि फिर भी उन्हें उम्मीद है कि घाटी में हालात धीरे-धीरे सामान्य हो जाएंगे. इस फ़ैसले से कश्मीर में चरमपंथ पर भी लागू लग सकेगा. फिलहाल तो इसमें कोई शक़ नहीं कि कश्मीर के हालात बहुत बदतर हैं.
आमीन की उम्र 40-45 के बीच है. उन्होंने शिमला के मुख्य इलाके जमा मस्जिद के नज़दीक अपना व्यापार जमाया हुआ है. वो पिछले 25 सालों से शिमला में रह रहे हैं.
आमीन कहते है, ''जब से मोदी ने प्रधानमंत्री के तौर पर दूसरी बार शपथ ली, तभी से अनुच्छेद 370 को हटाने की चर्चा चल रही थी. मोदी जी यह कदम ईद के बाद भी उठा सकते थे. यह फ़ैसला भले ही अच्छा हो लेकिन इसकी चलते हमारा त्योहार खराब हो गया. कश्मीर में हालात बहुत तनावपूर्ण हो चुके हैं और ऐसे में हम ईद पर किसी को बुलाने या अच्छे से ईद मनाने के बारे में सोच भी नहीं सकते.''

इमेज स्रोत, Pradeep kumar/bbc
नेताओं ने मासूम कश्मीरियों को लूटा
आदिल अहमद 28 साल के हैं और शिमला में खुद को महफूज़ मानते हैं.
वो कहते हैं, ''मैं अपने परिवार की दूसरी पीढ़ी से हूं जो शिमला के लक्खड़ बाज़ार में रहता हूं. मेरे पिताजी 30 साल पहले यहां आए थे. मैं आठ साल पहले उनके साथ रहने के लिए यहां आया. मेरे आधार कार्ड पर शिमाल का ही पता है.''
''शिमला में मुझे किसी बात से क्यों डरना चाहिए. मैं चाहता हूं कि सरकार के इस नए फ़ैसले से कश्मीर में भी शांति कायम हो और वहां चरमपंथ खत्म हो जाए. हम नौकरी चाहते हैं क्योंकि कश्मीर के नेताओं ने गरीब और मासूम कश्मीरियों के लिए कुछ नहीं किया.''
गुलाम हसन कश्मीर का एक नज़ारा पेश करते हुए कहते हैं, ''सरकार के इस फैसले के बाद कश्मीर में हालात कैसे बदलेंगे मुझे नहीं मालूम. मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि कश्मीरी नेताओं ने हमें लूटा है, हमारी नौकरियां छीन लीं और हमें नर्क में रहने पर मजबूर कर दिया.''

इमेज स्रोत, Pradeep kumar/bbc
''मैं शिमला में इतनी मज़दूरी क्यों कर रहा हूं? क्योंकि कश्मीर में हमारे लिए कोई उम्मीद की किरण नहीं थी. नेता हमारे वोट पाते और फिर हमारी तरफ पीठ फेर देते. हम कश्मीर में शांति चाहते हैं, अपने बच्चों के लिए नौकरी चाहते हैं और विकास चाहते हैं.''
''अगर अनुच्छेद 370 को हटाने से यह सब हासिल हो सकता है तो हमें मोदी की नीयत पर कोई शक़ नहीं. लेकिन फिलहाल तो कश्मीर में अव्यवस्था फैली हुई है.''
ये भी पढ़ेंः
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)














