एनकाउंटर पर क्या कहता है भारत का क़ानून?

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- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, दिल्ली
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में महिला डॉक्टर के साथ हुए रेप और फिर हत्या मामले में अभियुक्त चार युवकों को पुलिस ने मार दिया.
तेलंगाना पुलिस के अनुसार वो इन चारों अभियुक्तों को अपराध वाली जगह पर लेकर गई थी, जहां उन्होंने भागने की कोशिश की और फिर पुलिस पर हमला करने की कोशिश भी की.
पुलिस का दावा है कि इस दौरान जवाबी कार्रवाई में चारों अभियुक्त पुलिस की गोली के शिकार हो गए.
पुलिस इसे एनकाउंटर बता रही है, जबकि कई संगठन इस एनकाउंटर पर सवाल उठा रहे हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस संबंध में ख़ुद संज्ञान लिया है और एनएचआरसी ने तुरंत एक टीम को घटनास्थल पर जांच के लिए जाने के निर्देश दिए हैं.
इस टीम का नेतृत्व एक एसएसपी करेंगे और जल्दी से जल्दी आयोग को अपनी रिपोर्ट सौपेंगे.
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इसके साथ ही ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वुमेन एसोसिएशन ने अपने बयान में कहा है कि वो इस एनकाउंटर को 'फ़र्जी' मानते हैं.
इस एनकाउंटर की सच्चाई चाहे जो भी हो लेकिन यह शब्द एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है. लोगों के बीच चर्चा होने लगी है कि क्या एनकाउंटर के लिए किसी तरह के दिशा-निर्देश बनाए गए हैं?
भारतीय क़ानून में 'एनकाउंटर'
भारतीय संविधान के अंतर्गत 'एनकाउंटर' शब्द का कहीं ज़िक्र नहीं है. पुलिसिया भाषा में इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब सुरक्षाबल/पुलिस और चरमपंथी/अपराधियों के बीच हुई भिड़ंत में चरमपंथियों या अपराधियों की मौत हो जाती है.
भारतीय क़ानून में वैसे कहीं भी एनकाउंटर को वैध ठहराने का प्रावधान नहीं है. लेकिन कुछ ऐसे नियम-क़ानून ज़रूर हैं जो पुलिस को यह ताक़त देते हैं कि वो अपराधियों पर हमला कर सकती है और उस दौरान अपराधियों की मौत को सही ठहराया जा सकता है.
आम तौर पर लगभग सभी तरह के एनकाउंटर में पुलिस आत्मरक्षा के दौरान हुई कार्रवाई का ज़िक्र ही करती है. आपराधिक संहिता यानी सीआरपीसी की धारा 46 कहती है कि अगर कोई अपराधी ख़ुद को गिरफ़्तार होने से बचाने की कोशिश करता है या पुलिस की गिरफ़्त से भागने की कोशिश करता है या पुलिस पर हमला करता है तो इन हालात में पुलिस उस अपराधी पर जवाबी हमला कर सकती है.
सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले पर अपने नियम-क़ानून बनाए हुए हैं.

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एनकाउंटर पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश
एनकाउंटर के दौरान हुई हत्याओं को एकस्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग भी कहा जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में कहा है कि इसके लिए पुलिस तय किए गए नियमों का ही पालन करे.
23 सितंबर 2014 को भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आर एम लोढा और जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन की बेंच ने एक फ़ैसले के दौरान एनकाउंटर का ज़िक्र किया.
इस बेंच ने अपने फ़ैसले में लिखा था कि पुलिस एनकाउंटर के दौरान हुई मौत की निष्पक्ष, प्रभावी और स्वतंत्र जांच के लिए इन नियमों का पालन किया जाना चाहिए. उस फ़ैसले की प्रमुख बातें इस प्रकार हैं:
1. जब कभी भी पुलिस को किसी तरह की आपराधिक गतिविधि की सूचना मिलती है, तो वह या तो लिखित में हो (विशेषकर केस डायरी की शक्ल में) या फिर किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के ज़रिए हो.
2. अगर कोई भी आपराधिक गतिविधि की सूचना मिलती है, या फिर पुलिस की तरफ़ से किसी तरह की गोलीबारी की जानकारी मिलती है और उसमें किसी की मृत्यु की सूचना आए. तो इस पर तुरंत प्रभाव से धारा 157 के तहत कोर्ट में एफ़आईआर दर्ज करनी चाहिए. इसमें किसी भी तरह की देरी नहीं होनी चाहिए.
3. इस पूरे घटनाक्रम की एक स्वतंत्र जांच सीआईडी से या दूसरे पुलिस स्टेशन के टीम से करवानी ज़रूरी है, जिसकी निगरानी एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी करेंगे. यह वरिष्ठ पुलिस अधिकारी उस एनकाउंटर में शामिल सबसे उच्च अधिकारी से एक रैंक ऊपर होना चाहिए.
4. धारा 176 के अंतर्गत पुलिस फ़ायरिंग में हुई हर एक मौत की मजिस्ट्रियल जांच होनी चाहिए. इसकी एक रिपोर्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास भेजना भी ज़रूरी है.
5. जब तक स्वतंत्र जांच में किसी तरह का शक़ पैदा नहीं हो जाता, तब तक एनएचआरसी को जांच में शामिल करना ज़रूरी नहीं है. हालांकि घटनाक्रम की पूरी जानकारी बिना देरी किए एनएचआरसी या राज्य के मानवाधिकार आयोग के पास भेजना आवश्यक है.
कोर्ट का निर्देश है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत किसी भी तरह के एनकाउंटर में इन तमाम नियमों का पालन होना ज़रूरी है. अनुच्छेद 141 भारत के सुप्रीम कोर्ट को कोई नियम या क़ानून बनाने की ताकत देता है.

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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देश
मार्च 1997 में तत्कालीन एनएचआरसी के अध्यक्ष जस्टिस एमएन वेंकटचलैया ने सभी मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखा था. उसमें उन्होंने लिखा था, ''आयोग को कई जगहों से और गैर सरकारी संगठनों से लगातार यह शिकायतें मिल रहे हैं कि पुलिस के ज़रिए फ़र्जी एनकाउंटर लगातार बढ़ रहे हैं. साथ ही पुलिस अभियुक्तों को तय नियमों के आधार पर दोषी साबित करने की जगह उन्हें मारने को तरजीह दे रही है.''
जस्टिस वेंकटचलैया साल 1993-94 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे. उन्होंने लिखा था, ''हमारे क़ानून में पुलिस को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी व्यक्ति को मार दे, और जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि उन्होंने क़ानून के अंतर्गत किसी को मारा है तब तक वह हत्या मानी जाएगी.''
सिर्फ दो ही हालात में इस तरह की मौतों को अपराध नहीं माना जा सकता. पहला, अगर आत्मरक्षा की कोशिश में दूसरे व्यक्ति की मौत हो जाए.
दूसरा, सीआरपीसी की धारा 46 पुलिस को बल प्रयोग करने का अधिकार देती है. इस दौरान किसी ऐसे अपराधी को गिरफ़्तार करने की कोशिश, जिसने वो अपराध किया हो जिसके लिए उसे मौत की सज़ा या आजीवन कारावास की सज़ा मिल सकती है, इस कोशिश में अपराधी की मौत हो जाए.

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एनएचआरसी ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह निर्देशित किया है कि वह पुलिस एनकाउंटर में हुई मौत के लिए तय नियमों का पालन करे. वो नियम इस प्रकार हैं-
1. जब किसी पुलिस स्टेशन के इंचार्ज को किसी पुलिस एनकाउंटर की जानकारी प्राप्त हो तो वह इसके तुरंत रजिस्टर में दर्ज करे.
2. जैसे ही किसी तरह के एनकाउंटर की सूचना मिले और फिर उस पर किसी तरह की शंका ज़ाहिर की जाए तो उसकी जांच करना ज़रूरी है. जांच दूसरे पुलिस स्टेशन की टीम या राज्य की सीआईडी के ज़रिए होनी चाहिए.
3. अगर जांच में पुलिस अधिकारी दोषी पाए जाते हैं तो मारे गए लोगों के परिजनों को उचित मुआवज़ा मिलना चाहिए.
12 मई 2010 को भी एनएचआरसी के तत्कालीन अध्यक्ष जस्टिस जीपी माथुर ने कहा था कि पुलिस को किसी की जान लेने का अधिकार नहीं है. अपने इस नोट में एनएचआरसी ने यह भी कहा था कि बहुत से राज्यों में उनके बनाए नियमों का पालन नहीं होता है.
जब कभी पुलिस पर किसी तरह के ग़ैर-इरादतन हत्या के आरोप लगे, तो उसके ख़िलाफ़ आईपीसी के तहत मामला दर्ज होना चाहिए. घटना में मारे गए लोगों की तीन महीनें के भीतर मजिस्ट्रेट जांच होनी चाहिए.
राज्य में पुलिस की कार्रवाई के दौरान हुई मौत के सभी मामलों की रिपोर्ट 48 घंटें के भीतर एनएचआरसी को सौंपनी चाहिए. इसके तीन महीने बाद पुलिस को आयोग के पास एक रिपोर्ट भेजनी ज़रूरी है जिसमें घटना की पूरी जानकारी, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, जांच रिपोर्ट और मजिस्ट्रेट जांच की रिपोर्ट शामिल होनी चाहिए.
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