यमन से भागकर समुद्री रास्ते से लौटने वाले नौ मछुआरों की कहानी

    • Author, प्रभुराव आनंदन
    • पदनाम, बीबीसी तमिल के लिए

भारत के नौ मछुआरे यमन से अपनी जान बचाकर समुद्र के रास्ते वापस आए. उनके लिए इस तरह बच निकलना बेहद डरावना और नाटकीय अनुभव था. समुद्री रास्ते से लौटने के लिए उन मछुआरों ने सिर्फ़ उस नाव का सहारा लिया जिसमें सवार होकर वो मछली पकड़ते थे.

ये मछुआरे यमन के गृहयुद्ध से नहीं बल्कि वहां के एक कारोबारी से बचकर भागे हैं जिसने उन्हें मछलियां पकड़ने के काम पर लगाया था.

दिसंबर 2018 में तमिलनाडु के सात (सगयम जेगन, रविकुमार, वेनिस्टन, एस्केलिन, अलबर्ट न्यूटन, विवेक और साजन) और केरल के दो मछुआरे अपने मछली पकड़ने के कारोबार को बढ़ाने के लिए दुबई के लिए रवाना हुए. जैसे ही वो दुबई पहुंचे, उनकी ज़िंदगी ने एक अलग ही मोड़ ले लिया.

जिस टीम को उन्हें दुबई में काम पर लगाना था, वो उन्हें यमन ले गई और वहां काम पर लगा दिया जहां भयानक गृहयुद्ध चल रहा है. इन मछुआरों को अरब के एक धनी कारोबारी ने काम पर लगाया था.

यमन से बचकर लौटने में कामयाब रहे विवेक बताते हैं, "जब हम दुबई पहुंचे तो उन्होंने कहा कि वहां कोई नौकरी नहीं है और हमें ओमान जाना होगा. फिर हम उनके साथ चले गए लेकिन ओमान के बजाय वो हमें यमन ले गए. हमें कुछ समझ में नहीं आया कि हो क्या रहा है. फिर हमने सोचा कि अगर हमें ठीक-ठाक पैसे मिल रहे हैं तो परेशानी की कोई बात नहीं है."

अरब के उस कारोबारी ने कहा कि कारोबार में जो भी मुनाफ़ा होगा उसका आधा मछुआरों को दिया जाएगा लेकिन एक महीने के बाद इन्हें अहसास हुआ कि कारोबारी उन्हें धोखा दे रहा है. उन्होंने भारत लौटने का मन बना लिया था लेकिन उन्हें मालूम नहीं था कि लौटा कैसे जाए.

कोच्चि शहर से यमन की दूरी लगभग 3,000 किलोमीटर दूर है.

अलबर्ट न्यूटन ने बीबीसी को बताया, "पहले तो सब ठीक लगा लेकिन कुछ ही दिनों के बाद उन्होंने हमें हमारे हिस्से के पैसे देने से इनकार कर दिया. लगभग 10 महीनों तक वो हमारे हिस्से के पैसे देने से इनकार करते रहे. जब हमने उनसे इस बारे में सवाल किया तो उन्होंने गोलमोल जवाब दिया. इसके बाद हमारा शक़ और बढ़ गया.

भारतीय मछुआरों ने इसका विरोध करते हुए लगभग 25 दिनों तक प्रदर्शन किया.

उन्होंने बताया, "जब हमने हड़ताल की तो उन्होंने हमें खाना देना बंद कर दिया. हमने यमन की नौसेना से भी इस बारे में शिकायत की लेकिन उन्होंने इस बारे में कुछ नहीं किया. फिर हमारे पास काम पर लौटने के लिए कोई दूसरा विकल्प नहीं था. आख़िरकार हम फिर मछलियां पकड़ने के काम पर लग गए."

भाग निकलने का प्लान

जगन ने बीबीसी को बताया कि कैसे उन्होंने यमन से भाग निकलने की योजना बनाई.

जगन बताते हैं, "हम फ़्लाइट से नहीं भाग सकते थे. हमारे सामने सिर्फ़ समुद्री रास्ता ही था. हम समुद्री रास्ते से परिचित भी थे, इसलिए हमने इसी रास्ते से लौटने की योजना बनाई. ये आसान नहीं था. सिर्फ़ योजना बनाने में ही हमें चार महीने लगे. हमारा मालिक नाव में ईंधन के लिए हमें कुछ पैसे दिया करता था. हम उसमें से कुछ पैसे निकालकर अलग रखने लगे.''

19 नवंबर, 2019 को मछुआरों की इस टीम ने एजेंट से हमेशा की तरह कहा कि वो मछली पकड़े जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि वो दिन-रात दोनों समय मछली पकड़ेंगे इसलिए एजेंट ने उन्हें खाने-पीने का काफ़ी सामान दे दिया. इस खाने से 10 दिनों तक काम चलाया जा सकता था.

मछुआरों ने यही खाना लेकर भारत पहुंचने के लिए सफ़र शुरू किया. ये सफ़र आसान नहीं था.

जगन बताते हैं, "सफ़र की शुरुआत से ही समुद्र बहुत अशांत था और इसकी वजह से हमें आख़िर तक काफ़ी मुश्किल हुई. हमें ये भी नहीं पता था कि हम सही दिशा में जा भी रहे हैं या नहीं. एक बार तो हमने भारत लौटने का इरादा छोड़कर यमन वापस जाने का भी सोचा लेकिन यमन जाने के बारे में सोचकर ही हमें डर लगने लगा था. इसलिए हम फिर भारत लौटने के इरादे से आगे बढ़े और सोचा कि रास्ते में जो भी चुनौतियां आएंगी, उनका सामना किया जाएगा."

जब ये मछुआरे आख़िरकार लक्षद्वीप के पास पहुंचने वाले थे, तभी इनकी नाव का सारा ईंधन ख़त्म हो गया. फिर इन्होंने अपने परिजनों को यमन से लाए एक सैटेलाइट फ़ोन के जरिए इसकी जानकारी दी.

उन्होंने बताया, "हम लक्षद्वीप समुद्र तट से महज 58 मील की दूरी पर थे जब भारतीय तटरक्षकों ने हमें बचाया और सुरक्षित कोच्चि ले गए."

इन मछुआरों का कहना है कि उन्हें यमन में चल रहे गृहयुद्ध के बारे में कुछ नहीं मालूम था. उन्होंने कहा, "हम ज़्यादातर समय समुद्र में ही बिताते हैं. हम बाहर सिर्फ़ मछलियां पहुंचाने, अगले सफ़र के लिए खाना लेने और ईंधन के लिए आते थे. इसलिए, हमें इस बारे में नहीं कुछ नहीं पता था."

मछुआरों की मुश्किलें

मछुआरों को अक्सर इस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. अलबर्ट न्यूटन इससे पहले जब दुबई में नौकरी कर रहे थे तब ईरान के नौसैनिकों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया था.

उन्होंने बताया, "जब मैं दुबई में था तब मछलियां पकड़ने के दौरान ईरानी नौसैनिकों ने एक बार मुझे समुद्री सीमा का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया था. उन्होंने मुझे चार महीने तक जेल में रखा. जेल से छूटकर मैं भारत आया कुछ समय तक घर में ही रहा. फिर दिसंबर 2018 में इस अरबी कारोबारी के जाल में फंस गया. मैंने ख़ुद को छला हुआ महसूस किया और वापस अपने देश लौट आया."

वेइंस्टन को भी ईरानी नौसैनिकों ने गिरफ़्तार किया था.

अब ये आगे क्या करेंगे?

क्या वो वापस मछली पकड़ने का काम करेंगे? इसके जवाब में अल्बर्ट कहते हैं, "मैं एक मछुआरा हूं. मुझे मछली पकड़ने के अलावा और कुछ नहीं आता. अगर मुझे दोबारा काम मिलता है तो मैं विदेश जाऊंगा. मेरे परिवार के हालात कुछ ऐसे हैं कि मैं घर में नहीं बैठ सकता."

भारत में भी समुद्र है और मछली पकड़ने का काम है, इसके बावजूद भारतीय मछुआरे विदेश क्यों जाते हैं? इसका जवाब विवेक ने दिया.

उन्होंने कहा, "मैं पिछले सात साल से मछली पकड़ने का काम कर रहा हूं. तमिलनाडु के समुद्र में मिलने वाली मछलियों का बहुत अच्छा दाम नहीं मिलता. इसलिए हमें ठीकठाक पैसे कमाने के लिए विदेश का रुख करना पड़ता है.

विवेक कहते हैं कि जिस तरह उन्हें यमन से भागना पड़ा, उस अनुभव ने उनकी ज़िंदगी को बुरी तरह प्रभावित किया है. उन्होंने कहा, "इस घटना के बाद मैं समंदर की ओर जाने से भी डरने लगा हूं. मैं मछली पकड़ने का काम छोड़कर कोई और काम करने की सोच रहा हूं."

इंसाफ़ की मांग

भारतीय तटरक्षकों तक इन मछुआरों की ख़बर पहुंचाने वाले फादर चर्चिल कहते हैं कि खाड़ी देशों में ऐसे न जाने कितने मछुआरे फंसे हुए हैं.

उन्होंने कहा, "कई मछुआरे इसी तरह खाड़ी देशों में फंसे हुए हैं. वो न तो भारतीय दूतावास से संपर्क कर पा रहे हैं और न घर वापस आ पा रहे हैं. भारत सरकार को हमारे मछुआरों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए. भारतीय दूतावासों को मछुआरों की परेशानियां सुलझाने के लिए अलग से ऑफ़िस बनाने चाहिए.''

चर्चिल ने कहा, "अगर अरब का कोई कारोबारी हमारे मछुआरों को नौकरी देता है तो उसे इससे सम्बन्धित काग़जात भारतीय दूतावास में जमा कराने होंगे और इसकी एक प्रति मछुआरों को भी मिलनी चाहिए. अगर हमारे मछुआरों को अरब के कारोबारी से धोखा मिला तो उन्हें इसकी सज़ा मिलनी चाहिए."

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