नागरिकता संशोधन क़ानून विरोधी हिंसा: रिपोर्ट तो मिली, अब इंसाफ़ की आस में मृतकों के परिजन

मोहम्मद तक़ी

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    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
  • पढ़ने का समय: 5 मिनट

कानपुर के बेगमपुरवा इलाक़े की तंग गलियों में सत्तर वर्षीय मोहम्मद तक़ी का महज़ एक कमरे का घर है. तक़ी दमा के मरीज़ हैं.

हाथ में इनहेलर है और उनकी सांस फूल रही है. घर के बाहर रखी एकमात्र कुर्सी पर वो मुझसे बैठने का आग्रह करते हैं लेकिन मेरी ज़िद पर वो ख़ुद उस पर बैठते हैं, इनहेलर के ज़रिए दवा भीतर खींचते हैं और फिर मेरे सवालों पर आंसुओं के साथ जवाब देते हैं.

मोहम्मद तक़ी के तीन बेटों में सबसे बड़ा बेटा 25 वर्षीय मोहम्मद सैफ़ 20 दिसंबर को हुई हिंसा में गोली लगने से मारा गया. सैफ़ बेल्ट बनाने वाली एक फ़ैक्ट्री में मज़दूरी करता था.

मोहम्मद तक़ी बताते हैं, "वही कमाने वाला था. मैं भी मज़दूरी करता था लेकिन दस साल से कोई काम नहीं कर पा रहा हूं. छोटा बेटा होटल में प्लेट धोने का काम करता है. किसी तरह गुज़ारा होता था लेकिन अब तो गुज़र करना भी मुश्किल हो रहा है. सब कह रहे हैं कि पुलिस ने क़रीब से गोली मारी और उसकी मौत हो गई लेकिन पुलिस नहीं मान रही है."

मोहम्मद तक़ी बेटे की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट दिखाते हुए कहते हैं कि दो महीने बाद पुलिस वाले ख़ुद ही दे गए थे इसे. हमने तो कोशिश की थी लेकिन मिली नहीं.

सचींद्र पटेल, एसपी फ़िरोज़ाबाद

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पुलिस के दावे पर सवाल

मोहम्मद तक़ी कहते हैं, "एफ़आईआर भी लिखाई थी लेकिन वो भी नहीं लिखी गई. हम तो ये चाहते हैं कि हमें न्याय मिल जाए. हमारा बेटा किसी भी तरह से दंगे में शामिल नहीं था, मस्जिद से नमाज़ पढ़कर लौट रहा था. बस उसके माथे से ये बदनामी हट जाए."

मोहम्मद सैफ़ उन तीन लोगों में शामिल हैं जो बीस दिसंबर को कानपुर के बाबूपुरवा इलाक़े में सीएए विरोधी प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा में मारे गए थे. उससे एक दिन पहले भी राज्य के कई हिस्सों में प्रदर्शन के दौरान हिंसा फैल गई थी और राज्य भर में कम से कम 23 लोगों की मौत हो गई थी.

ज़्यादातर मौतें गोली लगने से हुई थीं लेकिन पुलिस और सरकार का दावा है कि पुलिस ने हिंसा रोकने की कोशिश में एक भी गोली नहीं चलाई. सबसे ज़्यादा सात लोगों की मौत फ़िरोज़ाबाद में हुई थी. उसके बाद मेरठ में छह और कानपुर में तीन.

मृतकों के परिजनों को क़रीब दो महीने तक न तो पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट मिली और न ही उनकी ओर से कोई एफ़आईआर दर्ज की गई. फ़िरोज़ाबाद में रसूलपुर इलाक़े के ही अरमान की भी मौत गोली लगने से हुई थी.

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मामले की जांच

अरमान के पिता यामीन बताते हैं, "दो महीने बाद हमें पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट तो मिली लेकिन एफ़आईआर के लिए काफ़ी भटकना पड़ा. हमने जो एप्लीकेशन दिया था, उसके हिसाब से एफ़आईआर लिखी भी नहीं गई. पुलिस वालों ने अपने हिसाब से लिख लिया."

यह शिकायत न सिर्फ़ यामीन की है बल्कि मारे गए ज़्यादातर लोगों के परिजनों की है.

फ़िरोज़ाबाद के पुलिस अधीक्षक सचींद्र पटेल कहते हैं, "मामले की जांच एसआईटी कर रही है. अदालत में सुनवाई हो रही है. सब कुछ साफ़ हो जाएगा. लेकिन मैं आपको एक बार फिर बताना चाहता हूं कि पुलिस की गोली से कोई नहीं मरा है. प्रदर्शनकारियों में से ही जो लोग असलहों से लैस थे, उन्हीं की गोली से लोगों की मौत हुई है. हम लोगों ने ऐसे कई लोगों को पहचान की है."

एफ़आईआर न होने के आरोपों को एसपी सचींद्र पटेल सिरे से ख़ारिज करते हैं.

वो कहते हैं कि ऐसा कोई नहीं है जिसकी एफ़आईआर न लिखी गई हो. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट्स में गोली लगने और ज़्यादातर में गोली आर-पार हो जाने की बात कही गई है. दिलचस्प बात ये है कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में किसी भी मामले में किसी के शरीर से कोई गोली मिलने की बात नहीं आई है.

मेरठ

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'ग़रीब पीड़ितों पर दबाव'

मेरठ, फ़िरोज़ाबाद, कानपुर, संभल, बिजनौर समेत जिन ज़िलों में भी प्रदर्शन के दौरान जिन लोगों की मौत हुई, उनमें से ज़्यादातर बेहद ग़रीब हैं.

इन लोगों के मामले की कोर्ट में पैरवी कर रहे फ़िरोज़ाबाद के वकील असद हयात कहते हैं, "मृतकों के परिजन बेहद ग़रीब हैं और उन पर प्रशासन और पुलिस की ओर से शांत रहने का दबाव भी बनाया जा रहा है. लेकिन हम लोगों ने कोर्ट में पर्याप्त सबूत पेश किए हैं जिनके आधार पर सच सामने आ जाएगा."

मेरठ के गुलज़ार-इब्राहिम मोहल्ले में 27 वर्षीय मोहसिन के भाई बताते हैं कि पुलिस का ख़ौफ़ है, इसलिए एफ़आईआर दर्ज नहीं कराई गई.

रशीद नगर में ज़हीर की भाभी नज़्मा कहती हैं, "ज़हीर को तो यहीं गली में ही पुलिस वालों ने गोली मारी. सबने देखा. यहां कौन सा प्रदर्शन हो रहा था. गोली लगने के बाद वो पड़ा रहा, कोई पुलिस वाला देखने तक नहीं आया. बड़ी मुश्किल में कई घंटे बाद मोहल्ले वाले अस्पताल ले गए. समय से इलाज मिल गया होता तो बच सकता था."

सीएए विरोधी प्रदर्शन के दौरान मारे गए ज़्यादातर लोग न सिर्फ़ बेहद ग़रीब हैं बल्कि उनमें से किसी का भी पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा है. यही हाल ज़्यादातर घायलों का भी है.

नजमा बानो

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मामला अदालत में है...

कानपुर में बाबूपुरवा इलारक़े में नया पुल मोहल्ले की रहने वाली नजमा बानो का बेटा आफ़ताब आलम बीए फ़ाइनल वर्ष की पढ़ाई कर रहा था. साथ में वो परिवार के भरण-पोषण के लिए प्लास्टर ऑफ़ पेरिस का काम भी करता था.

नजमा बानो कहती हैं, "बेटा कई दिन अस्पताल में रहा. उसने ख़ुद बताया कि नमाज़ पढ़कर आ रहा था तभी उसी घसीट पुलिस वालों ने गोली मार दी. प्राइवेट अस्पताल में एक्सरे कराया था, उसमें भी गोली लगने की बात आई थी. उसका किसी से कभी झगड़ा तक नहीं हुआ कभी. बिना किसी ग़ुनाह के जान चली गई. लेकिन हमें पूरा भरोसा है कि अदालत से हमें न्याय ज़रूर मिलेगा."

कानपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अनंतदेव कहते हैं कि एफ़आईआर दर्ज कराने जो भी आया, उसकी एफ़आईआर दर्ज की गई, लेकिन तमाम अन्य सवालों के जवाब देने से ये कहकर मना कर देते हैं कि मामला अदालत में है.

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पुलिस की गोली

कानपुर में मृतकों की ओर से वकीलों का एक समूह अदालत में पैरवी कर रहा है. उनमें से एक नसीर ख़ान कहते हैं, "हमारे पास ऐसे तमाम साक्ष्य हैं जो ये बताने के लिए पर्याप्त हैं कि पुलिस की गोली से कैसे लोगों की मौत हुई है. ज़्यादातर लोगों को सामने से और नज़दीक से गोली मारी गई है. अदालत में सब कुछ साफ़ हो जाएगा और हमें उम्मीद है कि इंसाफ़ मिलेगा."

एक वकील नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं कि हमारे पास ऐसे तमाम वीडियो हैं जिनमें साफ़तौर पर दिख रहा है कि पुलिस वालों ने क्या किया है.

इस तरह के वो कई वीडियो हमें भी दिखाते हैं. ऐसे वीडियो पुलिस वालों के पास भी हैं जिनसे वो ये साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि प्रदर्शनकारियों की ओर से ही गोलियां चलाई गईं. अब देखना ये है कि अदालत किन प्रमाणों को सही मानती है.

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