कोरोना मरीज़ों का इलाज करने वाले डॉक्टरों को महीनों से नहीं मिला वेतन
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Author, सिंधुवासिनी
पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पढ़ने का समय: 5 मिनट
क्या आप ऐसा काम करना चाहेंगे जिसमें आपको अपना ज़्यादा से ज़्यादा समय कोरोना संक्रमित लोगों के आस-पास, उनकी देखभाल करते हुए बिताना हो और बदले में आपको कोई वेतन भी न मिले?
दिल्ली में कस्तूरबा और हिंदूराव अस्पताल के डॉक्टरों के साथ पिछले कई महीनों से ऐसा ही हो रहा है.
दिल्ली के सिविल लाइंस इलाक़े में स्थित हिंदूराव अस्पताल के डॉक्टरों को पिछले चार महीने से और दरियागंज स्थित कस्तूरबा अस्पताल के डॉक्टरों को पिछले तीन महीने से वेतन नहीं मिला है.
ये दोनों ही अस्पताल उत्तर दिल्ली नगर निगम यानी एनडीएमसी के अंतर्गत आते हैं. बार-बार शिकायत करने के बाद कोई सुनवाई न होने पर रेज़िडेंट डॉक्टर्सों के संगठन ने अब अस्पताल प्रशासन को चिट्ठी लिखकर सामूहिक रूप से इस्तीफ़ा देने की चेतावनी दी है.
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हिंदूराव हॉस्पिटल में रेज़िडेंट्स डॉक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर अभिमन्यु सरदाना ने बीबीसी को बताया कि उन्हें अपना आख़िरी वेतन 15 फ़रवरी को मिला था. उनका कहना है कि एनडीएमसी के अस्पतालों में सही समय पर तनख़्वाह न मिलना आम बात है.
उन्होंने बताया, “मैंने पिछले साल जनवरी से इस हॉस्पिटल में काम करना शुरू किया था और तब से लेकर अब तक वेतन की दिक़्क़त अक्सर आती रही है. कभी डेढ़ महीने पर पैसे मिलते हैं, कभी दो महीने पर. एक-दो महीने तक तो हम किसी तरह काम चला लेते हैं लेकिन चार महीने तक एक भी पैसा न मिलने से हमें बहुत मुश्किल हो रही है.”
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'सैलरी नहीं मिली तो इस्तीफ़ा देने पर मजबूर होंगे'
चार महीने से वेतन न मिलने के बावजूद अस्पताल के डॉक्टर कोरोना वायरस संक्रमण के ख़तरों के बीच लगातार काम कर रहे हैं.
हिंदूराव हॉस्पिटल में न सिर्फ़ डॉक्टरों बल्कि नर्सों और अन्य स्वास्थकर्मियों को भी वेतन नहीं मिल रहा है. डॉक्टर अभिमन्यु ने बताया कि यहां 500 से ज़्यादा स्वास्थ्यकर्मी हैं.
डॉक्टरों को वेतन न मिलने का कारण फ़ंड की कमी बताया गया है.
डॉक्टर अभिमन्यु बताते हैं, “जब भी हम प्रशासन के पास अपनी समस्या लेकर जाते हैं, वो यही कहते हैं कि फ़ंड रिलीज़ नहीं हो रहा है.”
जामा मस्जिद के पास स्थित कस्तूरबा हॉस्पिटल के डॉक्टर भी कुछ ऐसी ही परेशानियों का सामना कर रहे हैं. उन्हें पिछले तीन महीने से वेतन नहीं मिला है. यहां भी रेज़िडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन ने प्रशासन को चिट्ठी लिखी है और चेताया है कि अगर 16 जून तक वेतन न मिला तो उन्हें इस्तीफ़ा देने पर मजबूर होना पड़ेगा.
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इस अस्पताल के रेज़िडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर सुनील कुमार की भी शिकायत है कि एमसीडी के सभी अस्पतालों ख़ासकर एनडीएमसी के अस्पतालों के साथ अक्सर फ़ंड की समस्या रहती है.
उन्होंने बीबीसी से बताया, “पिछले तीन-चार वर्षों से हो रहा है कि एनडीएमसी के अस्पतालों में डॉक्टरों की तनख़्वाह देरी से आती है. एक-दो महीने तक को हम धीरज रख लेते हैं लेकिन इस बार हमारे लिए भी चीज़ें मुश्किल हो रही हैं.”
'डॉक्टर नहीं, बंधुआ मज़दूर'
डॉक्टर सुनील कहते हैं कि चूंकि अभी कोरोना महामारी का दौर है, इसलिए हमें वेतन न मिलने की ज़्यादा चर्चा हो रही है लेकिन इसका कोई स्थायी समाधान होना चाहिए.
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वो कहते हैं, “एक तरफ़ आप डॉक्टरों को कोरोना वॉरियर्स कहते हैं और दूसरी तरफ़ देश की राजधानी दिल्ली में उन्हें ठीक से तनख़्वाह तक नहीं दे पा रहे हैं. ये कितनी शर्म की बात है.”
फ़ंड की कमी का असर अस्पतालों के इंफ़्रास्ट्रक्चर और मरीज़ों को मिलने वाली सुविधाओं पर भी पड़ रहा है.
डॉक्टर अभिमन्यु बताते हैं, “अस्पताल में ज़रूरी सामानों की कमी है. इसका असर मरीज़ों और हमारे, दोनों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है. इसी का नतीजा है कि हिंदूराव हॉस्पिटल में 38-40 के क़रीब स्वास्थ्यकर्मी कोविड-19 से संक्रमित हो चुके हैं.”
कस्तूरबा और हिंदूराव, दोनों ही अस्पतालों के स्वास्थ्यकर्मी कई महीनों से वेतन न मिलने के कारण तनाव और ग़ुस्से में हैं. हालांकि उन्हें आश्वासन दिया गया है कि अगले एक हफ़्ते में वेतन मिल जाएगा.
डॉक्टर सुनील कुमार कहते हैं, “अब तो हमें ये फ़ीलिंग भी नहीं आती कि हम डॉक्टर हैं. ऐसा लगता है जैसे हम सब बंधुआ मज़दूर हैं. किसी से आप काम कराएं और पैसे भी न दें तो ये बंधुआ मज़दूरी ही तो हुई.”
वो बताते हैं कि कई बार उन्होंने काम बंद करने और धरना देने के बारे में भी सोचा लेकिन फिर डॉक्टरों ने आपस में ही मिलकर तय किया कि महामारी के दौर में लोगों को उनकी ज़रूरत है.
वो कहते हैं, “मौजूदा संकट को देखते हुए हमने बिना सैलरी के काम जारी रखा है लेकिन सरकारों को समझना होगा कि हमारा भी घर-परिवार है और हमें भी घर चलाने के लिए पैसों की ज़रूरत होती है.”
डॉक्टर सुनील के मुताबिक़ फ़ंड की कमी का असर फ़िलहाल कस्तूरबा अस्पताल की सेवाओं पर नहीं पड़ा है लेकिन उन्हें डर है कि चीज़ें ऐसी ही रहीं तो हालात बदलते देर नहीं लगेगी.
दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन ने भी इस बारे में एक बयान जारी कर चिंता जताई है. बयान में कहा गया है, “एनडीएमसी के तहत आने वाले कस्तूरबा अस्पताल, हिंदू राव अस्पताल और डिस्पेंसरी से जुड़े रेज़िडेंट डॉक्टरों को वेतन नहीं दिए जाने से हमारा संगठन चिंतित है. वे पिछले तीन महीने से इस बेहद तनावपूर्ण माहौल में बिना किसी स्वार्थ और पूरी निष्ठा के साथ अपना काम कर रहे हैं.”
एनडीएमसी का क्या कहना है?
नॉर्थ एमसीडी स्टैंडिंग कमेटी के अध्यक्ष जयप्रकाश ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि उनकी दोनों अस्पतालों के डॉक्टरों से गुरुवार और शुक्रवार को मीटिंग हुई है.
उन्होंने कहा, “हमने उन्हें भरोसा दिलाया है कि अगले हफ़्ते उनकी पूरी तनख़्वाह आ जाएगी और आगे भी उन्हें नियमित रूप से वेतन मिलता रहेगा.”
फ़ंड की कमी का कारण पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “अभी हालात सामान्य नहीं हैं. लॉकडाउन की वजह से हमारा रेवेन्यू लगभग ठप हो गया है. दिल्ली सरकार से मिलने वाला फ़ंड भी 25 फ़ीसदी ही रह गया है. लेकिन हम जल्दी ही डॉक्टरों की समस्या का समाधान कर देंगे.”
एनडीएमसी के अस्पतालों में वेतन की अनियमितता इतनी आम क्यों है?
इस सवाल के जवाब में जयप्रकाश ने कहा, “एमसीडी का बंटवारा होने के बाद एनएमसीडी ही ऐसा है जिसके पास चार बड़े अस्पताल हैं. इसके कारण हमें लगभग 1,000 करोड़ का अतिरिक्त ख़र्च मैनेज करना होता है. हम बिना टैक्स और फ़ीस बढ़ाए अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने की कोशिश कर रहे हैं.”
इससे पहले पीतमपुरा स्थित भगवान महावीर हॉस्पिटल में कोरोना संक्रमण के शिकार डॉक्टरों के क्वारंटीन पर जाने की वजह से उनके वेतन में कटौती की बात सामने आई थी. इतना ही नहीं, उन्हें एक्स्ट्रा ड्यूटी करके क्वारंटीन में छूटी ड्यूटी पूरा करने के निर्देश दिए गए थे.
हालांकि डॉक्टरों के विरोध और स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन के दख़ल के बाद फ़ैसला पलट दिया गया.
स्वास्थ्यकर्मियों को वेतन न मिलने की शिकायतों का सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वत: संज्ञान लिया है.
अदालत ने शुक्रवार को अपने आदेश में कहा कि इस समय डॉक्टर युद्ध के दौर में सैनिकों की तरह हैं, इसलिए सरकार उन्हें नाराज़ न करे.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “इस मामले में अदालत को दख़ल देने की ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए. सरकारें आगे बढ़कर स्वास्थ्यकर्मियों की सुविधा का ध्यान रखें.”
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बीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
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जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
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ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
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कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
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शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.