कोविड-19 के बाद आपके बच्चों की पढ़ाई कैसे हो पाएगी?
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Author, प्रियंका दुबे
पदनाम, बीबीसी संवाददाता
शतरंज सिखाने वाली अनुराधा बेनीवाल अपने वक़्त को ब्रिटेन और भारत के बीच में बांटती हैं. वो अलग-अलग महाद्वीपों में मौजूद छात्रों को शतरंज सिखाती हैं.
लंदन के महंगे स्कूल से लेकर भारत के दूर-दराज़ के इलाक़े में रहने वाले ग़रीब बच्चों तक उनके यहां हर तरह के बच्चे सीखते हैं. लेकिन, कोविड-19 ने उनके लिए स्थितियां पूरी तरह से बदल दी हैं.
कोरोना वायरस फैलने के बाद डिजिटल साधनों तक पहुंच में बड़ी असमानता भारत में शिक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है.
शैक्षिक नीतियों में आमूल-चूल बदलाव की ज़रूरत
लंदन से फ़ोन पर बेनीवाल बताती हैं कि किस तरह से कोरोना वायरस ने शिक्षाविदों को नए सिरे से सोचने और मौजूदा शैक्षिक नीतियों को फिर से तैयार करने के लिए मजबूर कर दिया है.
वो कहती हैं, "मैं लंदन में अधिकतम आठ छात्रों के लिए ज़ूम क्लास लेती हूं. यहां ज़्यादातर बच्चों के पास अपने कमरे हैं, उनके पास तेज़ रफ़्तार इंटरनेट, लैपटॉप और टैबलेट्स जैसे मल्टीपल स्क्रीन हैं और ये तकनीक से अच्छी तरह से वाकिफ भी हैं."
विकसित देशों के मुक़ाबले भारत के हालात बिलकुल जुदा
दूसरी ओर, भारत की अगर बात करें तो यहां कई स्कूलों और विश्वविद्यालयों ने ऑनलाइन शिक्षा को अपनाया है. लेकिन, यहां शिक्षाविदों और छात्रों का इसे लेकर मिलाजुला अनुभव है.
वीडियो कैप्शन, कोविड-19 के बाद आपके बच्चों की पढ़ाई कैसे हो पाएगी?
दिल्ली की अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर सैकत मजूमदार कहते हैं, "ऑनलाइन पढ़ाई की तरफ़ शिफ़्ट होना ज़्यादातर तो आसान रहा था. लॉकडाउन छुट्टियों के दौरान हुआ और इसके तुरंत बाद हम ऑनलाइन पर शिफ्ट हो गए. सभी कक्षाएं या तो गूगल मीट या ज़ूम पर हो रही हैं."
"लेकिन, इसके साथ ही यूनिवर्सिटी के कुछ छात्र ऐसे भी हैं जिन्हें इंटरनेट की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. ये छात्र अमूमन कश्मीर या दूसरे दूर-दराज़ के इलाकों के हैं."
'ऑनलाइन कक्षाएं एक अस्थाई इंतज़ाम से ज़्यादा कुछ नहीं'
देश के ज़्यादातर बड़े निजी स्कूलों ने जूम क्लासेज़ का सहारा लिया है, लेकिन, बच्चों के अभिभावकों का कहना है कि यह सब एक अस्थाई इंतज़ाम से ज़्यादा कुछ नहीं है.
संक्रमण की हालत जानने के लिए ज़िले का नाम अंग्रेज़ी में लिखें
नाम न छापने की शर्त पर स्कूल जा रही दो बच्चियों के पिता ने बीबीसी को बताया, "मेरे बच्चे ज़ूम पर रेगुलर क्लास ले रहे हैं, लेकिन इस ऑनलाइन पढ़ाई-लिखाई का अनुभव बस ठीक ही है. हर बच्चे पर विशेष रूप से ध्यान देने की समस्या इसमें दिखाई दे रही है."
इस तरह की बात तकरीबन हर शख्स ने बताई है, चाहे वह शिक्षक हो, छात्र या पेरेंट्स. इस महामारी ने कैंपस एक्सपीरियंस के पूरे आइडिया को ही बदल दिया है.
सैकत बताते हैं, "पूरी संभावना है कि हमारे अगले सेमेस्टर के इम्तिहान ऑनलाइन हों. हमने छात्रों को कोर्स मैटेरियल ऑनलाइन दे दिया है. साइंस के विद्यार्थियों के लिए यह थोड़ा चुनौती भरा है, क्योंकि इनमें लैब में जाकर प्रयोग करने पड़ते हैं."
स्कूल और यूनिवर्सिटी यह भी विचार कर रहे हैं कि खुलने के बाद वे किस तरह से काम करेंगे.
सामाजिक दूरी अहम होगी और शैक्षिक संस्थानों को यूरोप, दक्षिण कोरिया और चीन के अनुभवों से सबक लेना पड़ेगा.
स्कूलों की जगह नहीं ले सकती ऑनलाइन पढ़ाई
कुछ अन्य स्कूलों ने छात्रों के बिल्डिंग या कक्षा में प्रवेश के दौरान उनका तापमान लेना अनिवार्य बना दिया है. लेकिन, भारत जैसे सामाजिक और आर्थिक विविधता वाले देश में अलग-अलग छात्रों को देखते हुए शिक्षा का भविष्य शायद कुछ अलग रहेगा.
ऑनलाइन शिक्षा भले ही एक नया ट्रेंड बनकर उभर रही है, लेकिन हाशिए पर मौजूद बच्चों के लिए किस तरह से इसे मुमकिन बनाया जाएगा?
अनुराधा बताती हैं, "कई लड़कियों के लिए स्कूल अपने घर की मुश्किल भरी ज़िंदगी से एक आज़ादी की तरह से थी. सीखने के अलावा, स्कूल में दोस्त बनते हैं, बातचीत होती है और मिड-डे मील भी मिलता है. ये सब चीज़ें अब ख़त्म हो गई हैं."
नौ साल की रानी राजपूत दिल्ली के एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में पढ़ती हैं. उनकी मां राधा राजपूत ने बीबीसी को बताया कि जब से लॉकडाउन लागू हुआ है, तब से उनकी बेटी घर पर खाली बैठी है.
राधा कहती हैं, "हम काम की तलाश में यूपी से दिल्ली आए थे. मेरे पति ऑटोरिक्शा चलाते हैं और मैं लोगों के घर पर घरेलू कामकाज करती हूं. हमें पता चला है कि बड़े स्कूल कंप्यूटर पर कक्षाएं ले रहे हैं."
"लेकिन, हमारे पास तो स्मार्टफ़ोन तक नहीं है. स्कूल के बंद होने के बाद से हमें कोई सूचना नहीं मिली है. मेरी बेटी एक कमरे के घर में सारा दिन रहते-रहते परेशान हो गई है."
इनोवेशन की ज़रूरत
चुनिंदा शहरी स्कूलों के ऑनलाइन क्लासेज़ कराने और इनकी पहुंच सीमित होने के चलते शिक्षाविदों को हर तरह के आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि वाले बच्चों के लिए पढ़ाई के इनोवेटिव तरीकों को ढूंढने की चुनौती पैदा हो गई है.
सोशल लर्निंग प्लेटफॉर्म एकोवेशन के फाउंडर रितेश सिंह कहते हैं, "भले ही यह ऑनलाइन एजूकेशन का दौर है, लेकिन यह स्कूलों की जगह कभी नहीं ले पाएगी."
रितेश को पढ़ाई के लिए उन्नयन एप बनाने के लिए प्रधानमंत्री का इनोवेशन पुरस्कार मिल चुका है. देश के आठ राज्यों में इस एप के ज़रिए करीब 12 लाख छात्र पढ़ाई करते हैं.
वो कहते हैं, "अगर हम चाहते हैं कि ऑनलाइन लर्निंग सिस्टम प्रभावी हो तो हमें हर छात्र के लिहाज़ से इसे तैयार करना पड़ेगा."
वो कहते हैं, "मिसाल के तौर पर दिल्ली में रहने वाले किसी छात्र के लिए तैयार किया गया वीडियो ट्यूटोरियल बाड़मेर या लातेहर के रिमोट इलाके में रहने वाले छात्र के लिए उतना प्रभावी नहीं होगा. साथ ही अगर आप कम समझ वाले बच्चे को त्रिकोणमिति सिखा रहे हैं तो इससे बच्चे को कोई फ़ायदा नहीं होने वाला."
रितेश और उनकी टीम क्षेत्रीय ज़रूरतों के हिसाब से स्टडी मैटेरियल तैयार कर रही है.
जिनके पास स्मार्टफोन, इंटरनेट नहीं उन तक कैसे पहुंचे शिक्षा?
लेकिन, बड़ा सवाल यह है कि कोविड-19 के बाद की दुनिया में मोबाइल एप्लिकेशन आधारित शिक्षण व्यवस्था भारत जैसे देश में कैसे बड़ी तादाद में बच्चों तक पहुंच सकती है जहां बहुत सारे लोगों के पास न तो स्मार्टफोन हैं और न ही इंटरनेट तक उनकी पहुंच है.
इसी वजह से रितेश और उनकी टीम एक टीवी फ़ॉर्मेट की ओर शिफ्ट हो रही है. इन्होंने एडेप्टिव लर्निंग के एक ब्रॉडकास्ट मॉडल को तैयार किया है. इसमें कई राज्यों में एपिसोड्स को प्रसारित किया जा रहा है.
रितेश कहते हैं, "कक्षा 9 से कक्षा 12 के लिए हमारे एपिसोड्स का डीडी बिहार और झारखंड पर प्रसारण 20 अप्रैल से शुरू हो चुका है. इनकी इतनी अच्छी प्रतिक्रिया मिली है कि हम अब मिडल स्कूल कक्षाओं के लिए भी सामग्री तैयार कर रहे हैं."
लेकिन, यह साफ है कि टीवी सेट के सामने बच्चों को बिठाए रखने और इससे पढ़ाई करने की अपनी कुछ दिक्कतें हैं. इसमें टीवी होने, घर के अच्छे वातावरण और एकाग्रता जैसे मसले शामिल हैं.
गुजरात के चिकोदरा गांव में सरकारी बालिका विद्यालय की एक शिक्षिका छाया बेन कहती हैं, "हमारी फ्यूचर स्ट्रैटेजी व्हाट्सएप के ज़रिए छात्रों तक पहुंचने और उन्हें स्टडी मैटेरियल मुहैया कराने की है. लेकिन, इस ज़रिए से हम केवल 30 फीसदी छात्रों तक ही पहुंच पा रहे हैं."
"मेरे स्कूल में कुल 380 छात्राएं हैं. इनमें से ज़्यादातर बेहद ग़रीब परिवारों से आती हैं. इनके मां-बाप के पास स्मार्टफोन नहीं हैं और इन्हें अपने बच्चों की पढ़ाई की ज़्यादा चिंता भी नहीं है."
छाया का कहना है कि ऐसे परिवारों के बच्चों के लिए महामारी एक बड़ी मुश्किल बनकर सामने आई है. इनके बच्चों का पूरा एक साल ख़त्म हो सकता है या फिर पढ़ाई के लंबे-वक्त के मौके भी ख़त्म हो सकते हैं.
स्कूलों को खुद को प्रासंगिक बनाने के तरीके ढूंढने होंगे
24 साल के आनंद प्रधान भारत के ऐसे सबसे युवा शिक्षाविद हैं जिन्होंने अपने मूल राज्य ओडिशा में इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल ऑफ रूरल इनोवेशन की नींव रखी है.
वो मानते हैं कि कोविड-19 के बाद की दुनिया में स्कूलों को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए खुद को पूरी तरह से दोबारा खड़ा करना पड़ेगा.
वो कहते हैं, "ऑनलाइन शिक्षा अब एक हकीकत है. ऐसे में स्कूलों को यह सोचना पड़ेगा कि वे किस तरह से बच्चे की ज़िंदगी में अपना योगदान दे सकते हैं."
आनंद के स्कूल में स्किल डिवेलपमेंट और इनोवेटिव सोच पर खास ज़ोर दिया जा रहा है. छात्र वैज्ञानिक खेती, आंत्रप्रेन्योरशिप और डिज़ाइन सोच जैसी प्रैक्टिकल स्किल सीख रहे हैं.
"हम स्किल्ड लोग तैयार करना चाहते हैं जो कि किसी समस्या को समझ सकें और अकेले बूते इसका हल निकाल सकें."
न केवल छात्र, बल्कि शिक्षकों के लिए भी है चुनौती
शिक्षा के भविष्य की एक और तस्वीर हरियाणा के रोहतक ज़िले में दिखाई देती है. यहां पर बिजेंदर हुड्डा की टीम काम कर रही है.
बिजेंदर मेहम ब्लॉक में ब्लॉक लेवल एजूकेशन अफ़सर के तौर पर काम कर रहे हैं. वो अपने शिक्षकों के नेटवर्क के ज़रिए डिजिटल खाई को पाटने की कोशिश कर रहे हैं.
वो कहते हैं, "हम व्हाट्सएप के जरिए अधिकतम छात्रों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. हम उन्हें वीडियो और ऑडियो ट्यूटोरियल भेज रहे हैं."
लेकिन, बिजेंदर इस बात की ओर इशारा करते हैं कि ग़रीब परिवारों से आने वाले अधिकतर बच्चों के मां-बाप काम पर चले जाते हैं और फ़ोन अपने साथ ले जाते हैं. ऐसे बच्चे केवल शाम के वक्त ही फ़ोन पर ऑनलाइन ट्यूटोरियल पढ़ पाते हैं.
"हम रात में देर तक काम करते हैं ताकि उनके सवालों को हल किया जा सके. हमारे शिक्षक भी ऑडियो और वीडियो का इस्तेमाल करना सीख रहे हैं. यह काफी थकाऊ है, लेकिन हमारे पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है."
बिजेंदर की टीम ने दूध पाउडर और मिड-डे मील की कच्ची सामग्री के वितरण के वक्त गांव के हर बच्चे की शैक्षिक स्थिति का सर्वे किया है.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि कोविड-19 के बाद की दुनिया में इस तरह की चुनौतियां मौजूद रहेंगी चाहे स्कूल कितना ही बड़ा या छोटा क्यों न हो. शिक्षा एक क्रांति के दौर से गुज़र रही है और हम देखेंगे कि किस तरह से यह लंबी अवधि में बच्चों पर असर डालती है.
कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले
बीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल
बाीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.