कोरोना: वायरस बदल रहा है रूप, वैक्सीन का कितना असर होगा?

    • Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 3 मिनट

वुहान से दिसम्बर में निकले कोरोना वायरस ने पिछले कुछ महीनों में ख़ुद में बदलाव कर लिया है और अब ये दुनियाभर में नई-नई क़िस्मों (वायरस के स्ट्रेन) में उभर और फ़ैल रहा है.

अब तक भारत में ही इस वायरस की तीन किस्में पाई गई हैं- पहला चीन के वुहान से निकली क़िस्म, दूसरा यूरोप के इटली में मिली किस्म और तीसरा ईरान वाली वैरायटी.

शोधकर्ता कह रहे हैं कि विश्व के कई इलाक़ों में तेज़ी से फ़ैल रहा कोविड-19 का संक्रमण यूरोपीय स्ट्रेन (क़िस्म) का है और ये वो क़िस्म है जो फ़रवरी के महीने में इटली में सामने आया था.

जानी-मानी पत्रिका न्यूज़वीक में छपे एक लेख में कहा गया है कि कोरोना की यूरोपीय क़िस्म चीन के वुहान से निकले वायरस से अधिक शक्तिशाली है. मगर शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे ये साबित नहीं होता कि यूरोपीय वैरायटी वाले स्ट्रेन से हुआ संक्रमण ज़्यादा घातक होगा.

न्यूज़वीक का लेख विज्ञान पत्रिका 'सेल' में छपे एक शोध पर आधारित है.

सेल में छपे शोध में ये भी कहा गया है कि वायरस के नए क़िस्मों के उभरने का वैक्सीन की खोज पर कोई बहुत बड़ा असर नहीं होगा.

इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च ने भी भारत में सामने आए वायरस की क़िस्मों पर रिसर्च की बात कही है. साथ ही ये भी कहा है कि कोरोना वायरस की अलग-अलग वैरायटी के सामने आने का ये अर्थ नहीं है कि ये डेवलप हो रही है वैक्सीन की गुणवत्ता को किसी तरह कम कर देगा.

आईसीएमआर के डॉक्टर रमन गंगाखेड़कर ने कहा था कि "वायरस के नए क़िस्म से वैक्सीन निष्प्रभावी नहीं होगा."

वायरस के क़िस्मों पर शोध करने की बात पर संस्था का कहना है कि इससे ये पता लगेगा कि भारत में संक्रमण के दौरान क्या वायरस के स्ट्रेन - यानी स्वभाव में कोई बदलाव हुआ है.

आईसीएमआर भारत में बायो-मेडिकल के क्षेत्र में होनेवाले शोध और दूसरे मामलों में निगरानी रखनेवाली संस्था है. फ़िलहाल कोविड-19 का इलाज, रिसर्च वग़ैरह से जुड़ी हुई नीतियां उसके द्वारा जारी दिशा-निर्देशों या फिर उसकी मदद से ही तैयार हो रही हैं.

स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीच्यूट के एक रिसर्च के अनुसार 'यूरोपीय क़िस्म' जिसे तकनीकी भाषा में G614 कहा जा रहा है वो D614 (चीन से निकले वायरस) के मुक़ाबले संक्रमण को 10 गुना तेज़ी से फैला सकता है मगर शोधकर्ता ये भी मानते हैं कि अमरीका जैसे देश में इसके तेज़ी से फैलने की वजह वहां इस पर रोकथाम लगाने की कमी की वजह से भी हो सकती है.

अमरीका में यूरोप से जानेवालों लोगों की तादाद बहुत बड़ी है तो वहां इस वैरायटी के वायरस के फैलने की ये वजह भी हो सकती है.

अमरीका में जल्द ही राष्ट्रपति चुनाव होने हैं. वहां के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वायरस संक्रमण के लिए बार-बार चीन पर आक्रामक होते रहे हैं. भारत के कई नेताओं ने भी हाल में वायरस और चीन पर बयान दिए हैं.

इधर हांगकांग से छपनेवाले अख़बार साउथ चाइना मार्निंग पोस्ट ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि इटली में वायरस की जो क़िस्म फैल रही है उसका संबंध सीधी तरह से चीन से नहीं पाया गया है. अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में इटली के मिलान में हुए एक शोध का हवाला दिया है.

लौंबार्डी इलाक़े में 300 लोगों के ब्लड सैम्पल के आधार पर किए गए जिनोम सिक्वेंसिंग (डीएनए की खोज) में पाया गया है कि वहां जो 'ट्रांसमिशन चेन' देखी गई है उससे चीन से कोई सीधा संबंध नहीं था.

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इटली ने चीन से इटली आने वालों पर जनवरी के अंत में ही पाबंदी लगा दी थी लेकिन वायरस के चिन्ह वहां के मिलान और ट्यूरीन के नालों के पानी में दिसंबर में ही सामने आ गए थे. अख़बार ने ये बात इटली के नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ हेल्थ के हवाले से कही है.

जन स्वास्थ्य अभियान के डाक्टर गार्गेया तेलकापल्ली कहते हैं कि वायरस में जीवन होता है इसलिए उसमें बदलाव होना स्वाभाविक है और ये बदलाव या नए क़िस्म की उत्पत्ति भौगोलिक और जलवायु की वजह से भी हो सकती है.

डाक्टर गार्गेया तेलकापल्ली कहते हैं कि इस तरह के बदलाव इंफ्लुएंज़ा जैसे दूसरे वायरस में भी होते हैं और उसी बदलाव के आधार पर वैक्सीन में भी बदलाव किए जाते हैं. वैक्सीन में ये तबदीली पिछले छह माह के दौरान सामने आए स्ट्रेन और उसके स्वभाव के अनुरूप किए जाते हैं.

विश्व भर में हर दिन जिनोम सिक्वेंसिंग को शेयर करने का सिलसिला जारी है जिसकी निगरानी विश्व स्वास्थ्य संगठन करता है. ये सिलसिला 1950 के बाद से लगातार जारी है.

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