असम: सरकारी मदरसे, संस्कृत केंद्र बंद करने के फ़ैसले पर सवाल

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- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से बीबीसी हिंदी के लिए
"किसी भी शिक्षा संस्थान को बंद करने का मतलब छात्रों को नुकसान पहुंचाना है. इस तरह के फै़सले छात्रों के हित के लिए नहीं लिए जाते बल्कि इन सबके पीछे राजनीति होती है. कांग्रेस कह रही है कि अगर उनकी पार्टी सरकार में आई तो मदरसों को फिर से खोल दिया जाएगा. यह साफ़ तौर पर राजनीतिक मुद्दा है. जबकि असम में मदरसा शिक्षा व्यवस्था बहुत पुरानी है और मैं खुद मदरसे से पढ़ाई कर आज यहां शिक्षक बना हूं."
जोरहाट ज़िले के मेलामाटी स्थित मदरसा-ए-इस्लामिया में उर्दू-अरबी पढ़ाने वाले मौलाना रफ़ीक़ बड़ी मायूसी के साथ ये बातें कहते हैं.
दरअसल असम सरकार ने राज्य-संचालित सभी मदरसों और संस्कृत टोल्स या संस्कृत केंद्रों को बंद करने का निर्णय लिया है.
असम के शिक्षा मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बुधवार को कहा, "सरकार द्वारा संचालित या फंडेड मदरसों और टोल्स को अगले पांच महीनों के भीतर नियमित स्कूलों के रूप में पुनर्गठन किया जाएगा. ऐसा इसलिए क्योंकि एक धर्मनिरपेक्ष सरकार का काम धार्मिक शिक्षा प्रदान करना नहीं है. हम धार्मिक शिक्षा के लिए सरकारी फंड ख़र्च नहीं कर सकते. इसके लिए नवंबर में एक अधिसूचना जारी की जाएगी."

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प्रदेश में चल रहे प्राइवेट मदरसों के बारे में शिक्षा मंत्री का कहना है, "सामाजिक संगठन और अन्य ग़ैर सरकारी संगठनों द्वारा चलाए जा रहे प्राइवेट मदरसों को लेकर कोई दिक्कत नहीं हैं. वे चलते रहेंगे लेकिन प्राइवेट मदरसों को भी एक नियामक ढाँचे के भीतर चलाना होगा. इसके लिए जल्द ही हम एक क़ानून ला रहे हैं."
असम की सत्ता संभाल रही बीजेपी सरकार द्वारा मदरसों को बंद करने का फ़ैसला ऐसे समय में सामने आया है जब अगले पाँच महीने में प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं. लिहाजा यहां की राजनीति को समझने वाले लोग सरकार के इस फ़ैसले को वोटों के ध्रुवीकरण करने के प्रयास से जोड़ कर देख रहे हैं.
ऑल असम मदरसा स्टूडेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष वहिदुज़्ज़मान कहते हैं, "असम में छह सौ से अधिक सरकारी मदरसों में करीब डेढ़ लाख छात्र पढ़ाई कर रहे हैं. मदरसों को बंद करना इन छात्रों के साथ अन्याय करना है. हिमंत बिस्वा सरमा इससे पहले जब कांग्रेस सरकार में शिक्षा मंत्री थे उस समय उन्होंने मदरसों के विकास के लिए करोड़ों रुपए ख़र्च किए थे लेकिन बीजेपी में आने के बाद वे बिल्कुल बदल गए हैं.
"यह सबकुछ आने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए किया जा रहा है. कुछ लोग मुसलमानों को निशाना बनाकर मुग़लों को भगाने की बात कर रहे हैं तो कुछ लोगों ने उर्दू को लेकर बहस छेड़ रखी है. मदरसों को लेकर भी एक ग़लत धारणा फैलाई गई है. जबकि मदरसों में पढ़ाई कर काफ़ी लोग डॉक्टर, वकील से लेकर कई बड़े पेशे में गए हैं. हम सरकार के फ़ैसले का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करेंगे और ज़रूरत पड़ी तो क़ानूनी लड़ाई लड़ेंगे."
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दो तरह के मदरसे
असम में दो तरह के मदरसे हैं. एक प्रोविंसलाइज़्ड जो पूरी तरह सरकारी अनुदान से चलते हैं और दूसरा खेराजी जिसे निजी संगठन चलाते हैं.
असम सरकार 614 मदरसे चलाती है, जबकि राज्य में करीब 900 प्राइवेट मदरसे चल रहे हैं. इसके साथ ही राज्य में लगभग 100 सरकारी-संचालित संस्कृत आश्रम हैं और 500 प्राइवेट केंद्र हैं.
सरकार प्रतिवर्ष मदरसों पर लगभग तीन से चार करोड़ रुपए ख़र्च करती है जबकि लगभग एक करोड़ रुपए संस्कृत केंद्रों पर ख़र्च होता है.
मदरसों को बंद करने के फ़ैसले पर ऑल असम अल्पसंख्यक छात्र संघ के मुख्य सलाहकार अज़ीजुर रहमान कहते हैं, "बीजेपी ने रोज़गार देने से लेकर विकास के जो वादे किए थे बीते पांच साल में वह कोई काम नहीं कर पाई. महँगाई चरम पर है और राज्य के सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्ति का निजीकरण किया जा रहा है.
"लिहाजा हिंदू-मुसलमान की राजनीति के ज़रिए मतदाताओं को अपनी तरफ़ लाने के प्रयास के तहत बीजेपी मदरसों को बंद कर रही है. शिक्षा मंत्री को आज ऐसा लग रहा है कि सरकारी पैसे से धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती लेकिन वे जब कांग्रेस के शासन में लगातार शिक्षा मंत्री थे उस समय उन्हें ऐसा कुछ नहीं लगा. मदरसा व्यवस्था केवल असम में ही नहीं है बल्कि ब्रिटिश शासन के समय से देश के कई राज्यों में चल रही है."

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अज़ीजुर रहमान ने यह भी कहा, "हमारा संगठन केवल मदरसे बंद करने के ख़िलाफ़ ही नहीं बोल रहा है बल्कि संस्कृत केंद्रों को बंद करने का फ़ैसला भी पूरी तरह ग़लत है. हिमंत बिस्वा सरमा शायद सबसे अधिक समय तक राज्य के शिक्षा मंत्री रहें हैं लेकिन नियमित स्कूलों में भी हालात कहां ठीक है.
"जब शिक्षा को लेकर राजनीति होगी तो इसका सबसे ज्यादा ख़मियाज़ा छात्रों को ही भुगतना होगा. बीजेपी के लोग चुनाव से पहले मुग़लों की, मुसलमानों की बातें कर रहे हैं. मदरसों को बंद कर रहे हैं. अगर सरकार मदरसों को बंद करने को लेकर अधिसूचना जारी करती है तो हम इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे."
असम में मदरसों को सरकार ने 1995 में प्रोविंसलाइज़्ड किया था. मदरसों में होने वाली पढ़ाई को लेकर कुछ विवाद पहले भी सामने आए हैं.
ऐसे आरोप भी लगे है कि जिन दूरदराज़ के इलाकों में नियमित स्कूल नहीं है वहां के कुछ मदरसों में बच्चों को कट्टरपंथी इस्लाम की पढ़ाई करवाई जाती है.
मुसलमानों का नुक़सान नहीं
इन आरोपों के जवाब देते हुए मौलाना रफीक़ कहते हैं,"मैंने 12 साल तक मदरसा में पढ़ाई की और पिछले 19 साल से यहां शिक्षक हूं. मैंने आजतक ऐसा कुछ भी नहीं देखा है. किसी भी मदरसे में दाख़िला लेने के समय सभी छात्रों के और उनके अभिभावक के सभी दस्तावेज़ जमा लिए जाते हैं. राजनीति में नफ़ा-नुकसान के लिए कई बार ऐसे आरोप मढ़े जाते है लेकिन हम यहां इंसानियत और नैतिकता की पढ़ाई करते है, जो हमें किसी भी तरह के आतंकवाद के विरोध खड़ा होना सिखाता है."
मदरसों को बंद करने को लेकर हो रही आलोचनाओं का जवाब देते हुए असम में बीजेपी के एकमात्र मुस्लिम विधायक एवं विधानसभा के उपाध्यक्ष अमीनुल हक़ लस्कर ने बीबीसी से कहा,"सरकारी मदरसों को बंद करने के फ़ैसले से मुसलमानों को किसी भी तरह का कोई नुकसान नहीं होगा.
"इस विषय को जब विधानसभा में रखा गया था तब कांग्रेस और एआईयूडीएफ़ के लोग सदन में चुप थे और अब हमारी पार्टी पर राजनीति करने के आरोप लगा रहे हैं. हमारी सरकार केवल मदरसों को बंद नहीं कर रही है बल्कि संस्कृत टोल्स भी बंद करने का निर्णय लिया है."
अमीनुल हक़ लस्कर के अनुसार असम में मुसलमानों की कुल आबादी का महज़ दो-तीन फ़ीसद बच्चे ही सरकारी मदरसों में पढ़ाई करते हैं.
वो कहते हैं,"हमारी सरकार का मक़सद साफ़ है कि सरकारी पैसों से धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी. जो बच्चे उर्दू-अरबी पढ़ना चाहते है वे कॉलेज और यूनिवर्सिटी में पढ़ सकते है. प्राइवेट मदरसों में भी जा सकते हैं. जिस तरह हिंदू, ईसाई तथा अन्य धर्मों के छात्र नियमित शिक्षा हासिल कर अपना भविष्य बना रहे हैं, वही व्यवस्था मुसलमान छात्रों के लिए भी है."
'ध्रुवीकरण का प्रयास'
असम के वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी कहते हैं कि भारत में मदरसा शिक्षा व्यवस्था को लेकर विवाद काफी पहले से चला आ रहा है, बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ मदरसों को लेकर पहले भी शिकायतें हो चुकी हैं, लेकिन असम में मदरसों को लेकर हाल के फ़ैसले का मक़सद वोटों का ध्रुवीकरण करने का प्रयास है.
वो कहते हैं,"राज्य में अगले कुछ महीने में चुनाव होने वाले हैं, लिहाजा बीजेपी फिर से सत्ता में आने के लिए वोटों का जितना ध्रुवीकरण करेगी उतना उनको फ़ायदा होगा. बीजेपी के लोगों ने हिंदू संस्कृति और उसकी रक्षा करने जैसे प्रचार प्रसार सार्वजनिक मंचो पर करना शुरू कर दिया है. उसी क्रम में मुग़लों को भगाने की बात हो रही है.
"दरअसल यह सारा कुछ उसी दिशा में जा रहा है. दूसरी ओर जिन कट्टरपंथियों को पहले गिरफ़्तार किया गया था उनमें कईयों की पढ़ाई मदरसों में ही हुई थी. इस फैक्ट को भी ध्यान में रखा गया है. लेकिन मदरसों को बंद करने का प्रमुख लक्ष्य राजनीति ही है. सरकारी मदरसों को बंद करने से केवल मुसलमान छात्रों को ही नुकसान होगा."
वो आगे कहते है कि अगर मुसलमान संगठन एक होकर सरकार के मदरसों को बंद करने के फ़ैसले का विरोध करते हैं तो इससे बीजेपी को ही फ़ायदा होगा. क्योंकि ऐसा करने से मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंदू एकजुट हो जाएंगे.
संस्कृत केंद्र भी होंगे बंद
मदरसों के साथ-साथ संस्कृत केंद्रो को बंद करने को लेकर भी बीजेपी सरकार को कुछ हिंदू संगठनों की नाराज़गी झेलनी पड़ रही है.
मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के विधानसभा क्षेत्र माजुली में मौजूद सत्राधिकार के एक समूह (मठ प्रमुखों) ने भी सरकार के फ़ैसले की आलोचना की है.
माजुली में 32 वैष्णव मठ हैं, जो 15 वीं शताब्दी के संत- समाज सुधारक श्रीमंत शंकरदेव की शिक्षाओं का पालन करते आ रहे हैं और इनमें से 10 मठों में संस्कृत केंद्र है.
संस्कृत केंद्रों को नवंबर से बंद करने के इस सरकारी फैसले पर मीडिया के समक्ष अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए माजुली के दखिनपाट मठ के मठाधीश जनार्दन देव गोस्वामी ने कहा, "संस्कृत हमारी संस्कृति का हिस्सा है. सरकार के इस निर्णय को स्वीकार नहीं कर सकते."
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