भारत की अर्थव्यवस्था में उछाल लेकिन आगे का रास्ता कठिन

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत में एक तरफ़ कोरोना महामारी के तेज़ी से फैलने की रफ़्तार में कमी आयी है तो दूसरी तरफ़ अर्थव्यवस्था के विकास की रफ़्तार में तेज़ी आयी है. यानी देश की आर्थिक सेहत बेहतर हो रही है.

अक्तूबर के नतीजों पर एक निगाह डालें तो ये साफ़ हो जाता है कि विकास दर में तेज़ी से वृद्धि हो रही है.

वित्त मंत्रालय के अनुसार अक्तूबर में वस्तु एवं सेवा कर या जीएसटी कलेक्शन 1.05 लाख करोड़ रुपये था, जो पिछले साल इसी महीने के मुक़ाबले में 10 प्रतिशत अधिक था और पिछले महीने की तुलना में 10,000 करोड़ रुपये ज़्यादा.

हालांकि लॉकडाउन से अनलॉक-5 तक यानी चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-अक्तूबर अवधि में जीएसटी का कलेक्शन 5.59 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 20 प्रतिशत कम था.

लेकिन जीएसटी कलेक्शन ऐसा अकेला क्षेत्र नहीं है जिसमें उछाल आया है. अक्तूबर में भारत की बिजली खपत 13.38 प्रतिशत बढ़कर 110.94 अरब यूनिट (बीयू) हो गई, जो मुख्य रूप से औद्योगिक और वाणिज्यिक गतिविधियों में उछाल के कारण हुई.

अधिकतर क्षेत्रों में स्थिति बेहतरी की ओर

देश में बिजली की खपत अक्तूबर 2019 में 97.84 बीयू दर्ज की गई थी. निर्यात में पाँच प्रतिशत वृद्धि हुई है और मैन्यूफ़ैक्चरिंग सेक्टर में पिछले दो महीने में लगातार बढ़ोतरी हुई है.

एक निजी सर्वेक्षण में दिखाया गया है कि अक्तूबर में भारत की फ़ैक्ट्री गतिविधि एक दशक में सबसे तेज़ गति से बढ़ी. महामारी से बुरी तरह से पिटी अर्थव्यवस्था को देखते हुए, अक्तूबर का महीना वसंत के मौसम जैसा महसूस होता है. अर्थव्यवस्था के अधिकतर क्षेत्रों में विकास दिखाई दे रहा है.

वित्त सचिव अजय भूषण पांडे ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए कहा कि बुरे दिन अब पीछे छूट गए हैं.

मुंबई में चूड़ीवाला सिक्योरिटीज़ के अध्यक्ष आलोक चूड़ीवाला ने बीबीसी से कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था के अनलॉक होने के बाद से इसमें सुधार के संकेत मिल रहे हैं. उनके अनुसार महामारी के फैलाव की "रफ़्तार कम होने के कारण हमें विश्वास मिला है कि हमारे लिए आर्थिक रूप से बेहतर समय आ रहा है"

वो कहते हैं, "लगभग 1 लाख करोड़ रुपये का जीएसटी कलेक्शन, ऑटोमोबाइल की बढ़ती बिक्री, बिजली की खपत में वृद्धि कुछ ऐसे संकेत हैं जिससे पता चलता है कि अर्थव्यवस्था बेहतरी की तरफ़ लौट रही है."

रविवार को फ़िक्की अध्यक्ष संगीता रेड्डी ने कहा कि देश की आर्थिक स्थिति बेहतर हो रही है. उन्होंने कहा, "कोविड-19 संकट से निपटने की भारत की रणनीति ने अपना असर दिखाया है और देश की अर्थव्यवस्था वापस उछाल और मज़बूती की तरफ़ जा रही है."

विशेषज्ञ आर्थिक स्थिति के बेहतर होने के कई कारण बताते हैं. आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ विवेक कॉल के अनुसार 'लॉकडाउन के खुलने से आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं जिसके कारण हर क्षेत्र में अप्रैल-अगस्त की तुलना में बेहतरी तो आनी ही थी. इसमें सरकार का कोई कमाल नहीं है.'

वह कहते हैं कि अर्थव्यवस्था में अब भी कई क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें कोई वृद्धि नहीं हो रही है, ख़ासतौर से रोज़गार के अवसर पैदा करने में सरकार नाकाम रही है.

दूसरी तरफ़ सरकारी क्षेत्र में ये दावा किया जा रहा है कि अर्थव्यवस्था में ताज़ा उछाल का मुख्य कारण 12 मई को प्रधानमंत्री द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ रुपये का आत्म-निर्भरता पैकेज है, जो G20 देशों के बीच सबसे बड़ा राहत पैकेज बताया जा रहा है.

उस समय भी पार्टी के कई नेता ये कहते सुने गए थे कि "ये रिलीफ़ पैकेज केवल वर्तमान में महामारी से निपटने के लिए ही नहीं है बल्कि महामारी के बाद की दुनिया में भारत के लिए निरंतर विकास सुनिश्चित करने के लिए भी है."

निर्यात बढ़ा, आयात घटा

दिलचस्प बात ये है कि अप्रैल से सितंबर तक निर्यात के बढ़ने और आयात के घटने से सालों में पहली बार 17 अरब डॉलर की बचत हुई है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस अवधि में निर्यात 221.86 अरब डॉलर रहा जबकि आयात 204.12 अरब डॉलर. पिछले साल इसी अवधि की तुलना में निर्यात में गिरावट केवल 16.66 प्रतिशत रही जबकि आयात में ये गिरावट 35.43 प्रतिशत थी. आयात में इस भारी गिरावट का कारण तेल के भाव में भारी कमी भी बताई जा रही है.

दूसरी तरफ़ आत्मनिर्भरता वाले पैकेज के अंतर्गत राजस्व में गिरावट के बावजूद, सरकार ने 1.27 लाख करोड़ रुपये का टैक्स रिफ़ंड किया. इस वित्त वर्ष में अब तक 70,000 करोड़ रुपये का जीएसटी वापस आ चुका है जिससे आम लोगों और व्यापारियों को राहत मिली है.

लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था सप्लाई और डिमांड पर आधारित है, सरकारी मदद पर नहीं. डिमांड अब भी धीमी है. सरकार डिमांड को तेज़ी से बढ़ते देखना चाहती है. मगर त्योहारों के सीज़न के बावजूद माँग में तेज़ी नहीं आयी है जिससे सरकार को मायूसी है.

पिछले दो महीनों से आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ ये माँग करते आ रहे हैं कि सरकार डिमांड को बढ़ाने के लिए एक नया रिलीफ़ पैकेज दे जिसके अन्तर्गत मज़दूरों और ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वालों की जेब में अगले छह महीने तक कुछ कैश मिले. सरकार के अनुसार उसने 80 करोड़ से अधिक लोगों को जन-धन योजना के अंतर्गत पैसे दिए हैं. लेकिन ये राशि केवल 500 रुपये थी और केवल तीन महीने तक दी गयी.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने नए रिलीफ़ पैकेज की तरफ़ इशारा कई बार किया है लेकिन इसका असल फ़ैसला दूसरे सभी बड़े फ़ैसलों की तरह पीएमओ यानी प्रधानमंत्री ऑफ़िस के पास है. आलोक चूड़ीवाला इस पैकेज के पक्ष में इसलिए हैं क्योंकि अर्थव्यवस्था के विकास को इससे और भी गति मिलेगी.

शायद पीएमओ के संकोच करने का एक बड़ा कारण यूरोप की तरह भारत में महामारी के "सेकेंड वेभ" या दूसरे दौर के शुरू होने का ख़तरा है जिससे रिलीफ़ पैकेज के विफल होने का डर हमेशा रहेगा.

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