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बढ़ती महंगाई, क्या हैं वजह और क्या होगा असर
- Author, निधि राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
''हर चीज़ की क़ीमत दोगुनी हो गई है. अगर आप फल, सब्जियां या किराने का सामान ख़रीदते हैं तो 1500 रुपये का बिल बन जाता है.''
महंगाई को लेकर 44 साल की गृहणी कार्तिका नायक बीबीसी को अपनी परेशानियों के बारे में बताती हैं.
कार्तिका नायक का आठ सदस्यों का परिवार है और वो मुंबई के मीरा रोड इलाक़े में रहती हैं.
वह कहती हैं, ''मैं अपने सुसराल वालों के साथ रहती हूं और हमारे परिवार में बच्चे और बुज़ुर्ग दोनों हैं. इसलिए हम बहुत ज़्यादा कटौती नहीं कर सकते. हमें अच्छे खाने और फल-सब्जियों की ज़रूरत होती है. बस एक ही तरह से बचत हो रही है कि कोरोना वायरस के कारण हम बाहर नहीं जा रहे और उस पैसे का इस्तेमाल महंगाई से निपटने में कर रहे हैं.''
35 साल की हमसिनि कार्तिक एक जानेमाने अख़बार में रिपोर्टर हैं और एक बच्चे की मां भी हैं. वो मानती हैं कि दालों, फलों और सब्जियों के बढ़ते दाम चिंता का कारण बन गए हैं.
हमसिनि कार्तिक कहती हैं, ''मैं दिवाली पर अपनी बिल्डिंग में मिठाई बांटती थी और लोगों को पार्टी के लिए बुलाती थी. लेकिन इस साल हमने ऐसा कुछ नहीं किया. कोविड-19 के कारण मेरे वेतन में 10 प्रतिशत की कटौती हो गई और ऊपर से चीज़ों के दाम बढ़ गए. इसलिए हमने ख़रीदारी बंद करके ख़र्चे कम करने की कोशिश की.''
कुछ इसी तरह की कहानी 30 साल के लक्षित भटनागर की भी है. वह आईटी क्षेत्र में काम करते हैं और पुणे में रहते हैं.
लक्षित भटनागर एक कार लेने की सोच रहे थे लेकिन फ़िलहाल उन्हें इसे आगे के लिए टालना पड़ा.
वह कहते हैं, ''मैं वाक़ई कार ख़रीदना चाहता था लेकिन पेट्रोल और डीज़ल के बढ़ते दामों को देखकर मैं रुक गया. वहीं, डीलर्स भी कोई अच्छा ऑफ़र नहीं दे रहे हैं. इसलिए मैंने फ़िलहाल पैसे बचाने का फ़ैसला किया है.''
लक्षित भटनागर किराए के घर में रहते हैं और उन पर उत्तर प्रदेश में रह रहे अपने माता-पिता को संभालने की भी ज़िम्मेदारी है.
भारतीय रिज़र्व बैंक के उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षण में भी कुछ इसी तरह की बात निकलकर समाने आई है. ये सर्वेक्षण दिखाता है कि उपभोक्ताओं का विश्वास अब तक के सबसे निचले स्तर पर आ गया है.
उपभोक्ता विश्वास सूचकांक सितंबर में 49.9 पर आ गया जबकि ये जुलाई में 53.8 पर था.
ब्रोकरेज आनंद राठी के आंकड़ों के अनुसार, जी20 देशों में मुद्रास्फीति के मामले में भारत तीसरे नंबर पर है.
क्यों बढ़ रही है महंगाई
भारत की खुदरा मुद्रास्फीति अक्टूबर 2020 में अपने साढ़े छह साल के सबसे ऊंचे स्तर 7.6% तक पहुंच गई है.
खाद्य मुद्रास्फीति दो अंकों में दर्ज की गई है. प्रोटीन आधारित सामान जैसे अंडे, मांस व मछली, तेल, सब्जियों और दालों की क़ीमतों के कारण महंगाई बढ़कर 11.07 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है.
आलू की क़ीमतों में पिछले महीने के 102 प्रतिशत के मुक़ाबले 104.56 प्रतिशत की सबसे तेज़ वृद्धि हुई है.
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि चार प्रमुख कारणों के कारण मुद्रास्फीति बढ़ रही है.
बार्कलेज़ में प्रमुख भारतीय अर्थशास्त्री राहुल बजोरिया का कहना है, ''पेट्रोल और डीज़ल पर सरकार ने टैक्स बढ़ा दिया है और घर पर रहने और वर्क फ्रॉम होम करने के कारण रोज़मर्रा के सामानों की मांग भी बढ़ गई है.''
केयर रेटिंग में प्रमुख अर्थशास्त्री मद सबनवीस ने बीबीसी को बताया, ''कई कंपनियों ने निजी देखभाल के उत्पादों जैसे कॉस्मैटिक व साफ़-सफ़ाई का सामान और मनोरंजन की श्रेणी में आने वाले सामानों की क़ीमत भी बढ़ा दी है. इस सबके कारण महंगाई में तेज़ी आई है.''
अब आगे क्या
जैसा कि केंद्रीय बैंक ने कहा है कि भारत की अर्थव्यवस्था 1947 में आजादी के बाद पहली बार 'तकनीकी मंदी' में प्रवेश कर सकती है.
भारत के सकल घरेलू उत्पाद में जुलाई-सितंबर की तिमाही में 8.6% तक संकुचन होने का अनुमान है. अप्रैल-जून की तिमाही में 23.9 प्रतिशत का संकुचन था. अगर लगातार दो तिमाहियों में संकुचन होता है तो अर्थव्यवस्था आधिकारिक तौर पर मंदी के दौर में मानी जाती है.
विशेषज्ञों का मानना है कि खाद्य मुद्रास्फीति की समस्या जितनी दिख रही है उससे कहीं ज़्यादा बढ़ी है. ये लॉकडाउन में आपूर्ति में आई रुकावट के कारण नहीं है.
आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज़ में अर्थशास्त्री अनघा देओधर ने न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स को बताया, ''लॉकडाउन में छूट देने और आवाजाही बढ़ाने पर भी अगर खाद्य मुद्रास्फीति बनी रहती है तो ये दिखाता है कि समस्या ज़्यादा जटिल है और भविष्य में भी बनी रहने वाली है.''
ब्रोकरेज कंपनी मोतीलाल ओसवाल के मुताबिक़, ''जनवरी 2021 में मुद्रास्फीति छह प्रतिशत तक रह सकती है और मार्च में ये 6.5 प्रतिशत पर जा सकती है. सितंबर 2021 में इसके फिर से छह प्रतिशत पर आने की संभावना है.''
इसके अलावा महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में अनियमित बारिश के कारण प्याज़ की फ़सल में भी देरी हुई है जिससे प्याज़ के दाम बढ़े हैं.
मूंगफली, सरसों, वनस्पती, सोयाबीन, सूरजमुखी और ताड़ जैसे खाद्य तेल भी 30% तक महंगे हो गए हैं और ये भी चिंता का एक बड़ा कारण है. भारत में 70% खाद्य तेल मलेशिया, अर्जेंटीना, इंडोनेशिया और यूक्रेन जैसे देशों से आयात किया जाता है.
जो लोग अंडे खाते हैं वो सब्जियों के दाम बढ़ने से अब अंडे का ज़्यादा इस्तेमाल करने लगे हैं. इससे भी अंडे की कीमत बढ़ी है जबकि अंडे के उत्पादन पर महामारी का बुरा असर भी रहा है.
मुर्गीपालन आपूर्तिकर्ता आनंद एग्रो समूह के अध्यक्ष उद्धव अहिर ने रॉयटर्स को बताया, ''ग़रीब लोगों को सब्जियों के मुक़ाबले अंडे सस्ते लग रहे हैं.''
ऊपर से सरकारी ख़र्च भी महंगाई को और बढ़ा रहा है. सरकार 30 लाख करोड़ रुपये ख़र्च करने वाली है जो कि जीडीपी का 15% है.
आर्थिक विकास पर असर?
उच्च मुद्रास्फीति, नौकरियों का जाना और वेतन कटौती उपभोक्ता की क्रय शक्ति को प्रभावित करने वाले हैं. फ़िलहाल त्योहारी सीजन के कारण अर्थव्यवस्था में मांग में तेज़ी दिखाई दे रही है.
ये तेज़ी जनवरी और फ़रवरी तक ख़त्म हो जाएगी और उसके बाद असली स्थिति सामने आएगी.
मदन सबनवीस कहते हैं, ''हम यह नहीं कह सकते कि मुद्रास्फीति अभी विकास को सीधे तौर पर प्रभावित कर रही है. इसके पीछे कई कारक हैं लेकिन जब ख़र्च करने की बात आती है तो मुद्रास्फीति एक महत्वपूर्ण कारक होगी. अगर मुद्रास्फीति कई तिमाहियों तक ऊंची बनी रहती है तो यह अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुंचाएगी.''
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के मुताबिक़, ''उच्च मुद्रास्फीति का मतलब है कि वास्तविक ब्याज दरें और भी कम होना. फ़िलहाल लोग बचत करने की कोशिश कर रहे हैं और पैसे को बैंक में जमा कर रहे हैं लेकिन अगर ब्याज में कटौती होती है तो उन्हें नुक़सान होगा. उन बुज़ुर्गों और पेशनधारियों का क्या होगा जिनके पास बैंक में पैसे जमा करने के अलावा बहुत कम विकल्प हैं.''
ऐसे में जानकारों के मुताबिक़ मुद्रास्फीति की ऊंची दर पर नियंत्रण पाना ज़रूरी होगा ताकि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सके.
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