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बिहार पुलिस में अब ट्रांसजेंडर भी बन सकेंगे सिपाही और दारोगा
- Author, नीरज प्रियदर्शी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, पटना से
आने वाले समय में बिहार के अंदर ट्रांसजेंडर पुलिस की वर्दी में हथियार और डंडा लेकर ड्यूटी करते नज़र आएंगे.
बिहार की सरकार ने यह फ़ैसला किया है कि वह अब अपने यहां की पुलिस में ट्रांसजेंडरों यानी किन्नरों को भी बहाल करेगी.
सिपाही और दारोगा के प्रत्येक 500 पद पर एक पद ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए आरक्षित रहेगा. इसके लिए उन्हें भी लिखित परीक्षा पास करनी होगी.
शैक्षणिक योग्यता की अहर्ता उतनी ही होगी जितनी पुरुषों और महिलाओं के लिए पहले से तय है. मगर शारीरिक दक्षता परीक्षा का मापदंड संबंधित पद की महिला अभ्यर्थियों के जैसा होगा. न्यूनतम उम्र सीमा विज्ञापन के अनुसार होगी, मगर अधिकतम उम्र सीमा में अनुसूचित जाति/जनजाति कोटे के बराबर छूट मिलेगी.
सरकार के गृह विभाग ने इसे लेकर संकल्प पत्र जारी कर दिया है.
दरअसल, बिहार सरकार को यह फ़ैसला इसलिए लेना पड़ा है, क्योंकि पटना हाई कोर्ट में इससे जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने पिछले महीने ही सरकार को फटकार लगाते हुए पूछा था कि अभी हो रही सिपाही नियुक्ति में ट्रांसजेंडरों को क्यों नहीं मौक़ा दिया गया है?
अदालत में लड़कर मिला अधिकार
अपने समुदाय की नौकरी के लिए अदालत में यह लड़ाई वीरा यादव ने लड़ी हैं. वीरा ने ही पटना हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर यह सवाल उठाया था कि सिपाही भर्ती के लिए आवेदन में ट्रांसजेंडरों के लिए कोई कॉलम नहीं है, इसी वजह से कई ट्रांसजेंडर चाहते हुए भी भर्ती प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले पा रहे.
मूल रूप से वैशाली की निवासी ट्रांसजेंडर वीरा यादव ने साल 2018 में पटना यूनिवर्सिटी से मास्टर इन सोशल वर्क की डिग्री हासिल की, मगर उन्हें नौकरी नहीं मिली, क्योंकि उनकी चाहत वाली नौकरी में ट्रांसजेंडरों के लिए कोई जगह ही नहीं है.
वीरा यादव बिहार की वो ट्रांसजेंडर हैं जिनके जीवन पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री "वीरा- द अनटोल्ड स्टोरी" साल 2017 में कला संस्कृति विभाग ने "किन्नर सांस्कृतिक महोत्सव" में दिखाया था. तब बिहार सरकार ने वीरा को सम्मानित भी किया था.
लेकिन, उसके बाद वीरा को सब भूल गए. ट्रांसजेंडर समुदाय से होकर भी पढ़ाई में मास्टर डिग्री की हासिल करने वाली वीरा को कहीं कोई नौकरी या काम नहीं मिल पाया.
पटना के लालजी टोला में एक छोटे से कमरे में रह रहीं वीरा की आर्थिक तंगहाली का आलम ऐसा है कि उन्हें अपने जीवन का गुज़ारा करने के लिए मीठापुर बस स्टैंड और पटना जंक्शन पर लोगों से भीख मांगना पड़ता है.
अभी लड़ाई ख़त्म नहीं हुई
बिहार पुलिस में सिपाही और दारोगा के पदों पर ट्रांसजेंडरों को बहाल करने के फ़ैसले पर वीरा कहती हैं, "सरकार का यह क़दम निश्चित तौर स्वागत योग्य है. लेकिन इतना ही काफ़ी नहीं है. ये तो पहले से होना चाहिए था. पुलिस में हमारे लिए बटालियन बनाना पड़ेगा. दूसरी नौकरियों में भी हमें जगह देनी होगी. शिक्षा से लेकर रोज़गार तक में हर तरह का आरक्षण देना होगा."
क्या वीरा बिहार पुलिस में नियुक्त होने के लिए आवेदन करेंगी?
वो कहती हैं, "सच पूछिए तो मैं इसी का इंतज़ार कर रही थी, और केवल मैं ही नहीं मेरे समुदाय के हजारों ऐसे साथी हैं जो इस फ़ैसले का इंतज़ार कर रहे थे. इसलिए तो हम चाहते हैं कि हमारा अलग से बटालियन बने. लेकिन सरकार हमारी संख्या को कम बताते हुए बटालियन बनाने से मना कर रही है."
क्यों नहीं बन सकता बटालियन?
बिहार में ट्रांसजेंडरों की आबादी 2011 की जनगणना के मुताबिक़ 40827 जो कुल जनसंख्या की 0.039 फ़ीसद थी.
फ़िलहाल बिहार पुलिस में स्वीकृत बल 1,30,247 है. ट्रांसजेंडरों की आबादी के हिसाब से गणना करें तो 51 पदों पर उनका प्रतिनिधित्व होना चाहिए.
जहां तक ट्रांसजेंडरों के लिए विशेष बटालियन बनाने की बात है तो उसकी सांगठनिक संरचना के लिए कम से कम एक हज़ार स्वीकृत बलों की ज़रूरत होगी.
क्या बिहार के 40 हज़ार से अधिक ट्रांसजेंडरों में एक हज़ार भी ट्रांसजेंडर ऐसे नहीं हैं जो बिहार पुलिस में शामिल होने की योग्यता रखते हैं?
नेशनल काउंसिल फ़ॉर ट्रांसजेंडर की मेंबर और दोस्ताना सफ़र की सचिव रेशमा कहती हैं, "मेरे फ़ोन में केवल पाँच सौ से अधिक मैसेज और फ़ोन कॉल आए हैं साथियों के जो चाहते हैं पुलिस में शामिल होना. और आबादी के हिसाब से आरक्षण देने का तर्क ही कहां से उठता है, क्या महिलाओं और दिव्यांगों को उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण दिया गया है?"
रेशमा ने कहा, "हमारे समुदाय में तो कई साथी अभी ऐसी भी हैं जिन्हें ट्रांसजेंडर के रूप में पहचान ही नहीं मिल पाई है. उनपर समाज और परिवार का दबाव है. सरकार को चाहिए पहले उनकी पहचान करना. हमारी पुरानी पीढ़ी में भले ही पढ़े-लिखे साथी कम हैं, मगर नई पीढ़ी पढ़ी-लिखी है. वो नौकरी करना चाहती है. देश और समाज के हर काम में अपनी भागीदारी देना चाहती है."
ट्रांसजेंडरों के पुलिस में आने से क्या बदलेगा?
समाज में ट्रांसजेंडरों के लेकर जिस तरह की अवधारणा है, उससे सवाल उठता है कि उनके पुलिस में आ जाने से क्या बदलाव आएगा?
बिहार पुलिस के पूर्व डीजीपी अभयानंद इस पर कहते हैं, "मुझे तो यही समझ नहीं आ रहा कि यह क्यों किया गया? आख़िर इसकी क्या उपयोगिता है? पुलिसिंग के काम में किन्नरों को किस आइडिया के तहत लाने का फ़ैसला हुआ, कोई यह बताने वाला नहीं है."
अभयानंद यह भी कहते हैं, "पुलिस की समाज में जो भूमिका है, उससे ट्रांसजेंडरों की भूमिका और मान्यता एकदम अलग है. सवाल तो यह है कि क्या हमारा समाज ट्रांसजेंडरों को पुलिस के तौर पर स्वीकार कर पाएगा? "
पूर्व डीजीपी अभयानंद सरकार के इस फ़ैसले से भले ही सहमत नहीं हैं, मगर एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइसेंज के प्रोफ़ेसर समाजविज्ञानी डॉ दिवाकर इसे अच्छा क़दम बताते हैं.
लेकिन डॉ दिवाकर यह भी कहते हैं, "केवल पुलिस की नौकरी में मौक़ा भर दे देने से ट्रांसजेंडर समुदाय का कल्याण नहीं हो सकता. इन्हें शुरुआत से ही मौक़े देने होंगे. शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार हर जगह इनके लिए विशेष प्रावधान करने होंगे. उन्हें नौकरी देने की बात करने से पहले सरकार को यह सोचना चाहिए कि उनके यहां के कितने ट्रांसजेंडर सरकारी नौकरियों के लिए अहर्ता रखते हैं."
डॉ दिवाकर के मुताब़िक, "यह सच आने वाले दिनों में सामने आ जाएगा कि हमारे यहां के कितने ट्रांसजेंडर सरकारी नौकरी करने के योग्य हैं. इसलिए पहले उन्हें नौकरी के लायक़ बनाने की ज़रूरत है."
सरकार और क्या करेगी ट्रांसजेंडरों के लिए?
ट्रांसजेंडरों को पुलिस में शामिल करने के फ़ैसले से वाहवाही लूट रही बिहार सरकार ट्रांसजेंडरों के लिए और क्या करेगी? क्या उन्हें दूसरी सरकारी नौकरियों में भी जगह दी जाएगी?
बिहार सरकार के गृह विभाग के प्रधान सचिव आमिर सुबहानी बीबीसी से कहते हैं, "बिहार सरकार किन्नर कल्याण समिति चलाती है जिसके तहत ट्रांसजेंडरों की बेहतरी का काम किया जाता है. इस समिति के विचार के बाद ही उन्हें पुलिस में भर्ती करने का फ़ैसला लिया गया है. आगे और भी विभागों में ट्रांसजेंडरों की भर्ती के लिए विचार किया जा रहा है."
आमिर सुबहानी ने कहा, "यह एक प्रयोग हो रहा है, इसलिए अभी से कुछ भी कहना ठीक नहीं है कि समाज और सिस्टम में यह स्वीकार्य होगा कि नहीं. मेरी जानकारी में तानिलनाडु में यह मॉडल सफलतापूर्वक चल रहा है. ऐसी ही बातें शुरू में महिलाओं के लिए भी की जाती थीं लेकिन आज महिलाएं कोई ऐसा क्षेत्र नहीं बचा जिसमें योगदान नहीं दे रही हैं. ट्रांसजेंडर आर्म्स भी चलाएंगे और क़ानून भी लागू कराएंगे, उन्हें मौक़ा दिया जाना चाहिए. "
ट्रांसजेंडरों को पुलिस में भर्ती करने फ़ैसला इस समुदाय के लिए ख़ुशियाँ और नई उम्मीदें लेकर आया है. अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में उनकी कितनी नियुक्तियां की जाती हैं. इसके बाद हमारा समाज और सिस्टम उसे किस रूप में स्वीकार करता है.
बहरहाल, ट्रांसजेंडर वीरा यादव को पूर्व डीजीपी अभयानंद के इस बयान से आपत्ति है जिसमें उन्हो़ने कहा है कि "यह फ़ैसला ही अनुपयोगी है."
वीरा कहती हैं, "हमारे लिए आगे और कितनी मुश्किलें आने वाली हैं इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि हमारे पूर्व डीजीपी इसको स्वीकार नहीं कर पा रहे."
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