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बीएसएफ़ को अधिकार: कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस का विरोध
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ़ के क्षेत्राधिकार को बढ़ाए जाने के केंद्रीय गृह मंत्रालय के फ़ैसले को लेकर राज्यों ने विरोध दर्ज कराया है. गृह मंत्रालय के इस फ़ैसले का विरोध करने वाले वो राज्य प्रमुख हैं, जहाँ भाजपा का शासन नहीं है
जैसे पश्चिम बंगाल और पंजाब. इसी वजह से कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस इसका विरोध कर रही हैं. ये पार्टियाँ आरोप लगा रही हैं कि बीएसएफ़ के क्षेत्राधिकार को बढाया जाना 'देश के संघीय ढाँचे पर हमला है.'
इसके विरोध में विपक्ष से आवाज़ें काफ़ी मुखर हैं. पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने फ़ैसले को वापस लेने की मांग भी की है.
लेकिन कभी केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार में शामिल रहे पंजाब के प्रमुख विपक्षी दल शिरोमणि अकाली दल के नेता दलजीत सिंह चीमा इस फ़ैसले को 'पीछे के दरवाज़े से आधे से ज़्यादा पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगाने' की तरह देखते है.
दिल्ली स्थित कांग्रेस के मुख्यालय में एक संवाददाता सम्मलेन को संबोधित करते हुए पार्टी के महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला का कहना था, "मुझे बताएँ कि क्या कारण है कि पंजाब जैसे प्रांत में आप आधे इलाक़े को 50,000 किलोमीटर में से 25,000 किलोमीटर में पंजाब की सरकार के अधिकार, वहाँ के पुलिस के अधिकार को छीन लेते हैं, आप पंजाब के मुख्यमंत्री से बात ही नहीं करते? आप बंगाल और असम के मुख्यमंत्रियों से, वहाँ की चुनी हुई सरकारों से अधिकार छीन लेते हैं, आप उनकी मीटिंग ही नहीं बुलाते, उनसे राय-मशविरा ही नहीं करते. क्या इस देश में लोकतंत्र, प्रजातंत्र, संघीय ढाँचा ऐसे चलेगा? सच्चाई ये है कि किसी ना किसी छद्म नाम से विपक्ष के अधिकारों को छीन रहे हैं और चुनी हुई सरकारों को वो पूरी तरह से चकनाचूर करने का षड़यंत्र कर रहे हैं."
इस समय भले ही कांग्रेस इसका विरोध कर रही हो. लेकिन ये बात भी सच है कि बीएसएफ़ के अधिकार क्षेत्र को बढाने का प्रस्ताव यूपीए के शासन काल में भी किया गया था.
ये बात है वर्ष 2011 की, जब केंद्र में यूपीए की सरकार थी और पी चिदंबरम भारत के गृह मंत्री थे, जब बीएसएफ़ के अधिकार क्षेत्र को बढाए जाने का मसौदा तैयार किया गया था. इस मसौदे का विपक्ष में रही भारतीय जनता पार्टी ने विरोध किया था.
अगले ही साल, यानी वर्ष 2012 के मार्च महीने में, पी चिदंबरम ने राज्य सभा में इससे संबंधित बिल पेश किया, जिसमें सीमा सुरक्षा बल अधिनियम,1968 के अनुभाग 139 में संशोधन का प्रावधान किया गया था.
बिल पेश करते हुए राज्य सभा में पी चिदंबरम ने ये भी कहा था- हालांकि सीमा सुरक्षा बल का क्षेत्राधिकार सिर्फ़ देश की सरहदों के आसपास ही सीमित है, इस अर्धसैनिक बल को देश के विभिन्न हिस्सों में क़ानून व्यवस्था के लिए भी तैनात किया जाता है.
भाजपा का विरोध
जब पी चिदंबरम ने ये प्रस्ताव पेश किया, तो बीजेपी ने इसका जमकर विरोध किया था. उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी आरोप लगाया था कि 'सरकार का ये क़दम देश के संघीय ढाँचे पर हमला है.'
भारतीय जनता पार्टी के विरोध की वजह से ये प्रस्ताव पारित नहीं हो सका था. पूर्वोत्तर भारत में सिक्किम राज्य ऐसा था, जिसने इस प्रस्ताव का विरोध किया था. विरोध का तर्क था कि क़ानून व्यवस्था राज्य के अधीन हैं जबकि सीमा सुरक्षा बल और दूसरे केंद्रीय अर्ध सैनिक बल सीधे केंद्र सरकार के अधीन हैं.
यही तर्क अब इस नई अधिसूचना के विरोध में भी दिया जा रहा है.
बीएसएफ़ के महानिदेशक और पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी प्रकाश सिंह ने बीबीसी से बातचीत में कहा पी चिदंबरम ने बतौर गृह मंत्री जो प्रस्ताव दिए थे, उनमें था कि देश के किसी भी स्थान पर अगर सीमा सुरक्षा बल की तैनाती होती है तो उसको वहाँ भी वही अधिकार मिलने चाहिए, जो उसे सरहद पर मिलते हैं.
पी चिदंबरम इसी तरह के अधिकार दूसरे अर्ध सैनिक बलों को भी देना चाहते थे, जो देश के विभिन्न इलाक़ों में क़ानून व्यवस्था के लिए तैनात किए जाते हैं. इनमे केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, भारतीय तिब्बत बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी), सशस्त्र सीमा बल और रेलवे सुरक्षा बल शामिल हैं.
क्या हैं बीएसएफ़ के अधिकार?
सीमा सुरक्षा बल में तैनात वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि सिर्फ़ दो तरह के अधिकारों में संशोधन 'पासपोर्ट एक्ट' और 'कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसिजर (सीआरपीसी)' यानी 'दंड प्रक्रिया संहिता' में किए गए हैं.
उनका कहना था कि असम के अलावा पूर्वोत्तर भारत के बाक़़ी राज्यों में सीमा सुरक्षा बल का क्षेत्र पूरे राज्य में बरक़रार रखा गया है. असम, पश्चिम बंगाल और पंजाब में सीमा सुरक्षा बल के ये अधिकार अंतरराष्ट्रीय सीमा से 15 किलोमीटर तक थे, जिसका दायरा अब 50 किलोमीटर कर दिया गया है.
वहीँ गुजरात में उनका क्षेत्राधिकार 80 किलोमीटर तक था, जिसे घटा कर अब नई अधिसूचना के हिसाब से 50 किलोमीटर कर दिया गया है. इनके अलावा नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटांसेज़ एक्ट और 'आर्म्स एक्ट' के तहत उन्हें बिना किसी वारंट के तलाशी और गिरफ़्तारी के अधिकार दिए गए हैं.
वर्ष 2014 की अधिसूचना में जम्मू, कश्मीर और लद्दाख को इसमें नहीं रखा गया था, जिसे अब शामिल कर दिया गया है.
बीएसएफ़ के अधिकारी का कहना था कि 1968 में जब बीएसएफ़ को अधिकार दिए गए थे, तो उस समय राज्य के पुलिस बल उतने सशक्त नहीं थे. इसी वजह से इस बल की स्थापना हुई और इस फ़ोर्स को वही अधिकार दिए गए थे, जो राज्यों की पुलिस के पास थे ताकि अंतरराष्ट्रीय सरहदों से लगे इलाक़ों में सुरक्षा में कोई चूक नहीं हो सके.
वो कहते हैं कि इसके अलावा सीमा सुरक्षा बल के पास 'पासपोर्ट एक्ट 1920' के तहत अधिकार हैं, जिससे वो भारत की सीमा में पासपोर्ट के साथ दाखिल होने वालों के पासपोर्ट और दूसरे दस्तावेज़ चेक कर सकते हैं.
साथ ही 'पासपोर्ट एक्ट 1967 जिसके तहत वो अवैध रूप से देश में घुसने वालों पर कार्रवाई कर सकते हैं. बीएसएफ़ को पहले से ही 'कस्टम्स एक्ट' के तहत शक्तियाँ प्राप्त हैं, जिससे वो सीमा पर तस्करी पर कार्रवाई कर सकते हैं.
लेकिन सीमा सुरक्षा बल में ही अतिरिक्त महानिदेशक के पद पर रह चुके संजीव क्रिशन सूद के अनुसार, अगर सही में सरकार सरहदों से अवैध घुसपैठ या दूसरी चरमपंथी गतिविधियों को मज़बूती के साथ रोकना चाहती है, तो फिर उत्तर प्रदेश में ये अधिसूचना क्यों नहीं लागू की गई, जबकि इस राज्य से भारत और नेपाल की लंबी सीमा है?
एक लेख में उनका ये भी कहना था कि भारत और भूटान की सीमा पर सशस्त्र सीमा बल भी तैनात है और उसे भी ये अधिकार दिए जाने चाहिए.
हालाँकि बीएसएफ़ के पूर्व महानिदेशक प्रकाश सिंह को लगता है कि मौजूदा हालात में पंजाब और पश्चिम बंगाल में इस अर्ध सैनिक बल का क्षेत्राधिकार बढाया जाना सामरिक कारणों से बेहद ज़रूरी है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "जम्मू कश्मीर में जिस तरह चरमपंथियों की घुसपैठ की घटनाएँ बढ़ रहीं हैं, जिस तरह पंजाब में सीमा पार से ड्रोन के ज़रिये हथियार और नशीले पदार्थ गिराए जा रहे हैं, इनको देखते हुए ये बेहद ज़रूरी था. उसी तरह बांग्लादेश में जिस तरह से रूढ़िवादी शक्तियाँ पाँव पसार रहीं हैं और जिस पैमाने पर घुसपैठ हो रही है, बीएसएफ़ की शक्तियों का दायरा बढाया जाना सही क़दम है."
प्रकाश सिंह के मुताबिक़ ये कहना सही नहीं है कि राज्यों या राज्य पुलिस की अधिकारों में कमी आएगी, क्योंकि जो भी कार्रवाई बीएसएफ़ करेगी. उससे संबंधित प्राथमिकी उन्हें स्थानीय थाने में ही दर्ज करनी पड़ेगी.
उनका कहना था, "बीएसएफ़ के अपने थाने नहीं हैं. वो जो भी कार्रवाई करेंगे, उससे संबंधित प्राथमिकी जिस स्थान पर कार्रवाई की गई है उसी क्षेत्र के थाने में दर्ज करवानी पड़ेगी. इसमें तहकीकात, जांच और आरोप पत्र दाख़िल करने की ज़िम्मेदारी स्थानीय पुलिस पर ही होगी."
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