उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव: विकास और धर्म बीजेपी के एजेंडे में साथ-साथ क्यों?

इमेज स्रोत, Hindustan Times/gettyImages
- Author, अनंत झणाणे
- पदनाम, लखनऊ से बीबीसी हिंदी के लिए
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश में कितना विकास हुआ है? इस सवाल का जवाब एक साथ उनके ट्विटर हैंडल पर मिल जाएगा.
इस साल अक्तूबर से लेकर 15 दिसंबर तक उनकी ट्विटर टाइमलाइन देखें तो प्रदेश भर में 30 से ज़्यादा शिलान्यास, लोकार्पण और दूसरे विकास से जुड़े कार्यक्रमों की सूची वहाँ आसानी से मिल जाएगी.
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त, 1
इनमें से छह कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ख़ुद लोकार्पण करने पहुँचे थे जिनमें 64 हज़ार करोड़ की प्रधानमंत्री स्वस्थ भारत योजना की शुरुआत, बुंदेलखंड में डिफ़ेंस कॉरिडोर का शिलान्यास, 22 हज़ार करोड़ की लागत से बना पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, नौ हज़ार करोड़ का एम्स अस्पताल और फ़र्टिलाइज़र फ़ैक्टरी जैसी योजनाएँ शामिल हैं.
इन परियोजनाओं के सहारे ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था को एक ख़रब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा है जिसके बारे में पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे उद्घाटन के दौरान उन्होंने ट्वीट भी किया था.
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त, 1
लेकिन एक खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को सरकार कैसे हासिल करेगी?
इसका जवाब जानने के क्रम में जो बात सामने आई, वो ये कि प्रदेश के विकास के साथ-साथ मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की धार्मिक कार्यों में व्यस्तता भी भरपूर रही है.

इमेज स्रोत, MONEY SHARMA
अक्तूबर से अब तक 10 से अधिक बड़े धार्मिक कार्यक्रमों का योगी आदित्यनाथ या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेतृत्व किया जिनमें अयोध्या में देव दीपावली, केदारनाथ धाम के पुनर्निर्माण कार्य और काशी कॉरिडोर का उद्घाटन प्रमुख कार्यक्रम थे.
एक मौक़े पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विवादित बयान भी दिया, "अब अगर अगली कार सेवा हुई तो गोलियाँ नहीं चलेंगी, रामभक्तों और कृष्ण भक्तों पर पुष्प वर्षा होगी." और समय-समय पर वे जनता को जिन्ना, औरंगज़ेब और ग़ज़नी की याद भी दिलाते रहे हैं.
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त, 2
विकास किया तो धर्म का सहारा क्यों?
राज्य सरकार ने जब विकास का इतना काम किया, इतने उद्घाटन रोज़ हो रहे हैं, तो चुनाव से पहले गंगा में डुबकी लगाने की ज़रूरत प्रधानमंत्री मोदी को क्यों पड़ रही है?
ये सवाल कई लोग पूछ रहे हैं.
बनारस के संकटमोचन मंदिर के महंत और बीएचयू-आईआईटी में इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग विभाग के हेड डॉक्टर विश्वम्भर नाथ मिश्र कहते हैं, "पाँच साल में तो इसकी ज़रूरत उन्हें नहीं पड़ी, अब चुनाव की अधिसूचना जारी होने वाली है, तो ऐसा कर रहे हैं. जिन लोगों ने जनता का कोई काम नहीं किया है, वो सोच रहे हैं किस मुँह से जनता का सामना करेंगे.
तो उसका सबसे अच्छा उपाय है कि धर्म की चादर ओढ़ लीजिए, तो कोई बोलेगा भी तो लोग कहेंगे देखिए धर्म के ख़िलाफ़ बोल रहे हैं. इससे परहेज़ करना चाहिए. धर्म एक निजी विषय है. इसका मतलब है कि असली समस्या जैसे बेरोज़गारी, महंगाई, स्वास्थ्य इन सब पर कोई बात नहीं करना चाहता, जो सब चौपट हो गया है."

इमेज स्रोत, SANJAY KANOJIA/GettyImages
जब यही सवाल हमने उत्तर प्रदेश की वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता से पूछा तो उन्होंने याद दिलाया कि विकास तो अखिलेश यादव ने भी किया था. 2017 के चुनावों में सपा का नारा था, "काम बोलता है." लेकिन नतीजा क्या हुआ?
उनके अनुसार, "2012 में जहाँ समाजवादी पार्टी ने 226 सीटें जीतीं थी, 2017 में वो उसकी आधी सीटें भी नहीं ला पाई. लोग विकास समझते हैं लेकिन चुनाव में यह टिक नहीं पाता है. तो इस विकास को धर्म की चाशनी में लपेट कर लोगों को परोसते रहिए और लोगों को बार-बार बताते रहिए कि हम इस धर्म के हैं तो उसका लोगों पर असर होता है. भाजपा का तो एजेंडा ही यही है."
विकास और धर्म के इस मिश्रण के बारे में वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरॉन कहती हैं, "इसमें कुछ नया नहीं है. जब 2014 का चुनाव लड़ रहे थे तब भी उन्होंने धर्म और विकास की बात की थी. यही बीजेपी का स्टाइल रहा है. साथ में उनका हिंदुत्व का एजेंडा भी है जिसमें गोकशी पर रोक, आर्टिकल-370 और काशी, मथुरा और अयोध्या के मंदिरों का मुद्दा है. तो पहले उन्होंने अयोध्या किया.
अब काशी में सरकार ने फ़ेज़ 1 का काम पूरा किया है. अब बच जाता है फ़ेज़ 2. तो वो क्या होगा? फे़ज़ 2 मस्जिद है. योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनाने के बाद अदालत में मस्जिद की ज़मीन के लिए के लिए मुक़दमे होने लगे. तो भाजपा 1980 के दशक के संघ के बनाए हुए एजेंडे पर चल रही है. लेकिन शायद हमलोग उस पुराने एजेंडे को भूल जाते हैं."
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त, 2
काशी के बाद अयोध्या में 12 मुख्यमंत्रियों का जमावड़ा
13 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा शासित 12 राज्यों के मुख्यमंत्रियों की क्रूज़ बोट पर बैठक ली और 15 तारीख़ को इन मुख्यमंत्रियों ने अयोध्या में रामलला के दर्शन किए. साथ में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा भी थे.
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त, 3
तो सवाल उठने लगे की मुख्यमंत्रियों को अयोध्या ले जा कर भाजपा क्या संदेश देना चाह रही है?
वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरॉन लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा का ज़िक्र करते हुए कहती हैं, "जब लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या की रथ यात्रा निकाली थी तब उस समय उनका फ़ोकस उत्तर भारत पर था. ज़्यादा राम भक्त उत्तर भारत में हैं. दक्षिण में राम भक्त कम हैं और शिव भक्त ज़्यादा हैं.
अब काशी को भाजपा ने दक्षिण से जोड़ा है. मुख्यमंत्रियों को लाने का मतलब है कि प्रधानमंत्री ने साफ़ कहा कि आस्था भी और काम भी है. उन्होंने कश्मीर पर मीटिंग की, विकास का ज़ायज़ा लेने रेलवे स्टेशन भी गए. वो अपने सांसदों को भी एक संदेश देना चाहते थे कि मैं अगर अपने संसदीय क्षेत्र में विकास कार्य देखने जा सकता हूँ तो मुख्यमंत्री क्यों नहीं जा सकते हैं.
प्रधानमंत्री ने एक और संदेश देने की कोशिश भी की है. बिना मस्जिद को छुए उन्होंने यह कॉरिडोर बनाया है. तो यह देश के लिए नहीं बल्कि दुनिया के लिए संदेश है कि भारत के प्रधानमंत्री एक हिंदू हैं, जो अपने धर्म में विश्वास रखते हैं लेकिन उसके साथ विकास की बात भी करते हैं. "

इमेज स्रोत, @BJP4UP
पत्रकार सुमन गुप्ता अयोध्या में मुख्यमंत्रियों के जमावड़े पर 1991 के कल्याण सिंह के शासनकाल को याद करती हैं. वो कहती हैं, "अयोध्या पहले भी राजनीतिक आकर्षण का केंद्र रहा है. जब कल्याण सिंह की सरकार थी, उस समय 1991 में पाँच प्रदेशों में भाजपा की सरकार थी. तो पाँचों प्रदेशों के मुख्यमंत्री अयोध्या गए थे और वहाँ दर्शन करने के बाद उन्होंने प्रेस वार्ता की थी.
उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में मैं भी मौजूद थी. बीजेपी के जो भी रास्ते जाते हैं वो उसी तरफ़ जाते हैं. वो पब्लिक को बताना चाहते हैं कि हम लोग बहुत धर्म-कर्म वाले हैं. वो लोगों को बार-बार यह याद दिलाने का काम करते हैं. यह सब एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया का हिस्सा है."

इमेज स्रोत, Getty Images
राजनीति को धर्म से जोड़ना
वो आगे कहती हैं, "सरकार कोई भी आती है तो वो विकास की बात करती है. इसलिए वो सत्ता में आती ही है. ऐसा करने में कोई रोक नहीं है, कोई बाधा नहीं हैं. लेकिन जब आप धर्म को एक एजेंडे की तरह अपनाते हैं और धर्म और राजनीति को इतना मिला देते हैं तो धर्म, राजनीति, सरकार और पार्टी की बीच की लकीरें धुंधली होने लगती हैं.
धर्म हमारी निजी आस्था का विषय है. राज्य का कोई धर्म नहीं होता और अगर राज्य का कोई धर्म होता तो यह सवाल कभी उठाते ही नहीं."
यहाँ ग़ौर करने वाली बात है कि भारत के संविधान की प्रस्तावना में पहले 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द नहीं था और इसे इमरजेंसी के बाद संविधान में संशोधन करके जोड़ा गया.
धार्मिक और तीर्थ स्थलों पर राजनैतिक शक्ति प्रदर्शन के बारे में संकटमोचन मंदिर के महंत डॉक्टर विश्वम्भर नाथ मिश्र का मानना है, "अब यह सब चीज़ें चलेंगी नहीं, लोगों का अपना दुख है. अपने मुद्दे हैं सरकार मुख्य मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाना चाह रही है. बीजेपी चुनाव से अब डर रही है. महामारी में लोगों की जो दुर्दशा हुई है, आप बताइए कि किस घर में किसी सगे संबंधी की मौत नहीं हुई. इनको मालूम है कि यह चुनाव अगर मुख्य मुद्दों पर लड़ा गया तो उनके लिए ठीक नहीं होगा."
ये भी पढ़ें:-
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)













