नवाब मलिक के इस्तीफ़े पर उद्धव सरकार की दुविधा क्या है?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
महाराष्ट्र सरकार के मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी नेता नवाब मलिक को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बुधवार को गिरफ़्तार कर लिया.
समाचार एजेंसी पीटीआई ने ईडी अधिकारियों के हवाले से बताया कि नवाब मलिक से मुंबई अंडरवर्ल्ड से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पूछताछ की गई, जिसके बाद ये गिरफ़्तारी हुई है.
भारतीय जनता पार्टी नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस इस पूरे मामले को एक अलग ढंग से पेश कर रहे हैं.
बुधवार को उन्होंने मराठी में ट्वीट किया. ट्वीट में लिखा, "क्या वजह थी कि महाराष्ट्र सरकार के मंत्री को मुंबई ब्लास्ट के अभियुक्त के साथ डील करनी पड़ी? ये बहुत ही गंभीर मामला है. हो सकता है कि जिन लोगों ने मुंबई में बम ब्लास्ट किए, इस सौदे की रक़म उनको मिली हो."
साफ़ है कि मनी लॉन्ड्रिंग के इस मामले को बीजेपी मुंबई ब्लास्ट के लिए की गई टेरर फ़ंडिंग से भी जोड़ कर पेश कर रही है.

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नवाब मलिक के इस्तीफ़े की माँग
नवाब मलिक की गिरफ़्तारी के बाद बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने उनके इस्तीफ़े की माँग की है. उन्होंने कहा, "अगर नवाब मलिक का इस्तीफ़ा नहीं होता है तो हम विरोध प्रदर्शन करेंगे."
दूसरी तरफ़ महाराष्ट्र सरकार में मंत्री और एनसीपी नेता छगन भुजबल ने कहा है कि नवाब मलिक का इस्तीफ़ा नहीं होगा. उन्होंने दलील दी की बीजेपी ने भी केंद्रीय मंत्री नारायण राणे का इस्तीफ़ा नहीं माँगा था, जब उनकी गिरफ़्तारी की गई थी. एक तर्क ये भी दिया गया है कि आरोप अभी सिद्ध नहीं हुए हैं.
साफ़ है नवाब मलिक की गिरफ़्तारी के बाद अब बीजेपी और महाविकास अघाड़ी गठबंधन के बीच बहस उनके इस्तीफ़े को लेकर शुरू हो गई है.
ऐसे में सवाल उठता है कि गिरफ़्तार मंत्री के इस्तीफ़े को लेकर आख़िर क्यों दुविधा में हैं उद्धव ठाकरे?
महाराष्ट्र के राजनीतिक विश्लेषक उद्धव सरकार के इस फ़ैसले के पीछे कई कारण गिनाते हैं.

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रणनीतिक फ़ैसला
राज्य के वरिष्ठ पत्रकार अभय देशपांडे कहते हैं, " राज्य सरकार इसे राजनीति से प्रेरित गिरफ़्तारी मान रही है. इस वजह से गठबंधन की रणनीति है कि केंद्रीय जाँच एजेंसियों की कार्रवाई पर केंद्र सरकार के साथ आमने-सामने की लड़ाई लड़ी जाए. जैसे ममता बनर्जी ने शारदा स्कैम के समय केंद्र के साथ किया था और दबाव में नहीं आई थी."
यही वजह है कि नवाब मलिक की गिरफ़्तारी को लेकर राज्य भर में एनसीपी और कांग्रेस प्रदर्शन भी कर रही है.
अभय आगे कहते हैं, "उद्धव सरकार इस पूरे मामले में 'विक्टिम कार्ड' खेलना चाहती है ताकि लोगों तक ये संदेश पहुँचा सके कि उन्हें बीजेपी काम करने नहीं दे रही. ठीक उसी तरह जैसे नजीब जंग के मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने किया था."
हालांकि नवाब मलिक से पहले उद्धव सरकार, अनिल देशमुख का इस्तीफ़ा ले चुकी है जो मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में घिरे थे. अनिल देशमुख महाराष्ट्र के गृह मंत्री रह चुके हैं.
लेकिन इस बार राज्य सरकार ने अलग रणनीति अपनाई है.

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दुविधा में शिवसेना
वहीं वरिष्ठ पत्रकार मृणालिनी नानिवडेक कहती हैं कि उद्धव ठाकरे फ़िलहाल दोबारा सोच-विचार करते नज़र आ रहे हैं.
बीबीसी से बातचीत में वो कहती हैं, "फ़िलहाल कांग्रेस और शिवसेना के नेताओं की केंद्रीय जाँच एजेंसियों द्वारा कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई है, लेकिन आगे हो सकती है ऐसी संभावना जताई जा रही है. अनिल परब, संजय राउत की पत्नी, सुशील कुमार शिंदे की बेटी से अलग-अलग मामलों में केंद्रीय जाँच एजेंसियां पूछताछ कर रही हैं. इस वजह से भी उद्धव ठाकरे चाहते हैं कि केंद्र के सामने एक सशक्त नेतृत्व के तौर पर गठबंधन पेश आए."
लेकिन मृणालिनी आगे कहती हैं कि गुरुवार के एनसीपी-कांग्रेस के प्रदर्शन से शिवसेना ने सुबह सवेरे ख़ुद को थोड़ा दूर रखा है. हो सकता है कि इस्तीफ़ा लेना चाहिए या नहीं उसको लेकर कुछ विचार- विमर्श चल रहा हो.
हालांकि मुंबई से बीबीसी संवाददाता प्राजक्ता पोल ने बताया कि शिवसेना नेता सुभाष देसाई, सुनिल राऊत, पांडुरंग सकपाल, सचिन अहिर भी एनसीपी-कांग्रेस विरोध प्रदर्शन में शामिल होने पहुँचे थे.
वो आगे कहती हैं, " शिवसेना हमेशा ख़ुद को 'हिंदुत्व के रक्षक' के तौर पर पेश करती आई है. पहले इनका दायरा केवल मराठी लोगों तक सीमित था. लेकिन अयोध्या आंदोलन के बाद दायरा बढ़ते-बढ़ते हिंदू लोगों तक पहुँच गया. अगर 'टेरर फ़ंडिंग' के नाम पर उनके गठबंधन के नेता की गिरफ़्तारी हुई है और ये नैरेटिव बीजेपी जनता तक ले जाने में कामयाब होती है, तो मामला शिवसेना के ख़िलाफ़ जा सकता है. शिवसेना नेताओं की चुप्पी, इस वजह से थोड़ी खल रही है."
हालांकि नवाब मलिक की गिरफ़्तारी के बाद शिवसेना नेता संजय राउत ने कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिस तरह अधिकारी नवाब मलिक को ले गए वो 'महाराष्ट्र सरकार के लिए चैलेंज है. वो कैबिनेट मंत्री हैं.'
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महाराष्ट्र में निगम चुनाव
नवाब मलिक का इस्तीफ़ा होना और नहीं होना - दोनों आने वाले निगम चुनाव में अहम मुद्दा बन सकता है.
शिवसेना को इस बात का डर भी है. महाराष्ट्र में मार्च-अप्रैल के महीने में निगम चुनाव भी होने वाले हैं जिसमें पुणे और मुंबई शामिल हैं. ये चुनाव बीजेपी और शिवसेना गठबंधन दोनों के लिए अहम हैं.
इस बारे में अभय देशपांडे कहते हैं, "इन निगम चुनावों के पहले नवाब मलिक का इस्तीफ़ा लेने का मतलब होगा कि राज्य सरकार 'डिफ़ेंसिव मोड' में आ गई है. इस वजह से गिरफ़्तारी के तुरंत बाद शरद पवार ने बैठक बुलाई और फिर उद्धव ठाकरे के साथ भी बैठक हुई जिसके बाद इस्तीफ़ा नहीं लिए जाने का फ़ैसला लिया गया.
भले ही बीजेपी इस गिरफ़्तारी को टेरर फ़ंडिंग और मुंबई धमाकों से जोड़ कर पेश कर रही हो, लेकिन शिवसेना, एनसीपी गठबंधन को लगता है कि वो जनता को समझा पाएंगे की ये मामला राजनीतिक ज़्यादा है. नवाब मलिक को बीजेपी इसलिए टारगेट कर रही है कि वो अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं और पिछले दिनों वो लगातार आईआरएस अधिकारी समीर वानखेड़े (जो पहले एनसीबी में थे) और एनसीबी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोले हुए थे."
दरअसल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को भी योगी आदित्यनाथ ने 80:20 का चुनाव करार दिया था. तब जानकारों ने '80:20' वाले इस बयान को 'हिंदू बनाम मुसलमान' से जोड़ कर देखा था.
अभय कहते हैं कि अब महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी उनकी ही स्क्रिप्ट को दोहराती नज़र आ रही है.
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यूपी चुनाव में बीजेपी की रणनीति से सीख
नवाब मलिक की गिरफ़्तारी को उत्तर प्रदेश चुनाव से बीएसपी नेता मायावती ने भी जोड़ा है जिसके बाद शायद उद्धव ठाकरे की दुविधा और बढ़ गई हो.
गुरुवार को उन्होंने नवाब मलिक का नाम ना लेते हुए ट्विटर पर लिखा, "उत्तर प्रदेश में हो रहे विधानसभा चुनाव को प्रभावित करने के लिए देश में कभी आतंकवाद के नाम पर और कभी महाराष्ट्र में चल रही जाँच एजेंसियों की गतिविधियों को लेकर जो कुछ हो रहा है वो अति दुर्भाग्यपूर्ण है. जनता ज़रूर सतर्क रहे."
दरअसल इससे पहले साल 2008 के अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट केस में कोर्ट का फ़ैसला 18 फ़रवरी को आया था जिसमें कोर्ट ने 38 को फांसी और 11 को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई.
इस फ़ैसले के बाद अहमदाबाद ब्लास्ट और साइकिल का कनेक्शन बता कर पीएम मोदी और सीएम योगी ने समाजवादी पार्टी पर कई चुनावी रैलियों में निशाना साधा .
जानकार मानते हैं कि महाराष्ट्र के निगम चुनावों को भी इस तरह से प्रभावित करने की बीजेपी की रणनीति को अब विपक्षी पार्टियाँ समझने लगी हैं. इस वजह से महाराष्ट्र निगम चुनाव के पहले महा विकास अघाड़ी सचेत है.

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तीसरे मोर्चे में अहम भूमिका की तैयारी
नवाब मलिक की गिरफ़्तारी के बाद, कई मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि ममता बनर्जी और शरद पवार की फ़ोन पर बात हुई है.
हाल के दिनों में 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले तीसरा मोर्चा बनाने पर काम तेज़ी से चलता दिख रहा है.
इस सिलसिले में ममता बनर्जी और के चंद्रशेखर राव की शरद पवार और उद्धव ठाकरे के साथ मुलाक़ात ने भी काफ़ी सुर्ख़ियां बटोरी हैं.
तीनों प्रदेशों में केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच अलग अलग मुद्दों पर टकराव आए दिन चलता रहता है.
यही ममता, केसीआर, शरद पवार और उद्धव ठाकरे के साथ आने की अहम वजह भी बताई जाती है.
नवाब मलिक की गिरफ़्तारी उसी टकराव की एक और कड़ी बताई जा रही है.
मृणालिनी कहती हैं, ''इस गिरफ़्तारी से एक और बार ये बात साबित करने की कोशिश विपक्ष करेगा कि केंद्रीय जाँच एजेंसियों की मदद से बीजेपी दूसरी राज्य सरकारों को कुचलने की कोशिश कर रही है. ये नैरेटिव विपक्षी पार्टियों को सूट भी करेगा. केंद्र से टकराव लेने का ये एक नया मोर्चा भी हो सकता है."

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