रांची हिंसाः मरने वाले दोनों युवाओं की मांओं का सवाल, मेरा बच्चा गुनहगार नहीं था...

    • Author, आनंद दत्त
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, रांची से
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

रांची में शुक्रवार की नमाज के बाद भड़की हिंसा में दो युवाओं की मौत हुई है. जबकि दो-तीन अन्य लोगों की स्थिति गंभीर बताई जा रही है.

प्रदर्शन के दौरान पुलिस फ़ायरिंग की घटना को 48 घंटा बीतने वाले हैं, लेकिन अब तक फ़ायरिंग क्यों शुरू हुई, इसको लेकर प्रशासन की ओर से कोई जानकारी सामने नहीं आयी है.

झारखंड पुलिस के प्रवक्ता अमोल वी होमकर ने बीबीसी से इन मौतों की पुष्टि की है.

उन्होंने शनिवार को बीबीसी से कहा, "कल हुई हिंसा के दौरान हमें प्रदर्शनकारियों की तरफ़ से भी फ़ायरिंग की जानकारी मिली है. उग्र लोगों को क़ाबू करने के लिए पुलिस ने भी हवाई फ़ायरिंग की. इस दौरान 12 पुलिसकर्मी और 12 प्रदर्शनकारी घायल हुए. इनमें एक पुलिसकर्मी समेत कुछ लोगों को बुलेट इंजरी है."

बीबीसी हिंदी ने जिन दो युवाओं की मौत हुई है, उनके परिवार वालों से मुलाक़ात की है.

15 साल के मुदस्सिर की मां का दर्द

"तुम नहीं रोओगी अम्मी. हम कहीं नहीं जाएंगे. कभी तुमको शिकायत का मौका नहीं देंगे. हम कल से सुधर जाएंगे. तुम मत रो अम्मी. यहां जुलूस निकला हुआ है. हम यहां से क्रॉस कर रहे हैं अम्मी, फ़ोन रख दे अम्मी."

रांची हिंसा में मारे गए 16 साल के मुदस्सिर आलम का अपनी मां निखत परवेज़ से आख़िरी बातचीत यही थी.

इतना कहते ही निखत दहाड़ें मारकर रोने लगीं. उनके बेटे मुदस्सिर आलम की मौत रांची हिंसा में गोली लगने से हो गई है.

हिंसा के दौरान उनके सिर में गोली लगी, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया. जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई.

रांची के हिंदपीढ़ी मुहल्ला स्थित किराए के मकान में निखत जिस वक़्त बीबीसी हिन्दी से बात कर रही थीं, ठीक उसी समय शाम की नमाज पास के मस्जिद में पढ़ी जा रही थी. पति परवेज़ आलम ने उनके आंसू पोंछते हुए कहा कि नमाज हो रहा है, अल्लाह को याद करो. रोना बंद करो.

नमाज ख़त्म होते ही एक बार फिर वह अपने भाई को पकड़ कर रोने लगी. उन्होंने बताया कि, "आखिरी बार बातचीत के थोड़ी देर बाद ही मुदस्सिर के दोस्त का फ़ोन आया. उसने बताया कि मुदस्सिर को गोली लग गई है."

रोते हुए वे कहती हैं, "कैसे गोली लग गया, अभी तो बतिया रहा था. कौन एतना बड़ा दुश्मन था, सड़क में और कोई नहीं था. निशाना लगा कर काहे मार दिया. मेरा मासूम सा बच्चा क्या बिगड़ा था. मेरा बच्चा गुनहगार नहीं था, उसकी अम्मी भी गुनहगार नहीं है, बाप भी सीधा साधा, फिर मेरा बच्चा को काहे मार दिया."

मुद्दसिर अपने मां-बाप की इकलौती संतान थे. उनकी मां ने उन्हें भले ही जन्म दिया हो, लेकिन उनकी बुआ ने उन्हें पाला था. मजदूर बाप का यह बेटा अपने रिश्तेदारों में ख़ूब प्यारा था. यही वजह थी कि शनिवार दिनभर उनके घर में रिश्तेदारों के आने-जाने का तांता लगा हुआ था.

अपनी भाभी को चुप करातीं बुआ सन्नो परवीन कहती हैं, "हम ही पाले थे, जब भी मेरी तबियत ख़राब होती थी, वो मेरे पास में रहता था. घटना से पहले देखे कि घर से जा रहा है. हम मना किए, तो बोला कि दादी के घर जा रहे हैं."

पिता परवेज़ आलम पत्नी और बहन को ढाढस बंधा रहे थे. उन्होंने कहा कि, सरकार को अगर हमारी फ़िक्र है तो बस हमें इंसाफ दिलाए. मेरे बेटे को गोली मारने वाले को समाज के सामने लाए.

चाचा मोहम्मद शाहिद अयूबी ने बीबीसी से कहा, "बहुत सीधा लड़का था, इस बार बोर्ड की परीक्षा देनेवाला था, खानदान में सबसे मिलकर रहता था, सबको सलाम दुआ करते रहता था. कल दिन में कैसे गया, कहां गया किसी को कोई जानकारी नहीं है. गोली ऐसी लगी कि उसका सिर फट गया था."

उन्होंने यह भी कहा, "पुलिस ऐसे गोली चला रही थी जैसे आतंकवादी, उग्रवादी से लड़ाई हो. जेएमएम सरकार भी आरएसएस मानसिकता वाली हो गई है. सवाल ये है कि किसके कहने पर गोली चलाई गई. अब तक सरकार का कोई प्रतिनिधि मिलने तक नहीं आया."

वो ये भी कहते हैं, "यहां मुसलमानों के प्रति नफ़रत कूट-कूट कर भर दिया गया है. ये सब उसी का परिणाम है. मेरा भतीजा उसी का शिकार हुआ था. कैसे मेरा भाई अब आगे का ज़िंदगी बिताएगा, अल्लाह जाने."

एक दिन पहले मां का ऑपरेशन हुआ था, अगले दिन बेटा चल बसा

रांची हिंसा में मारे गए एक और युवक मोहम्मद साहिल की मां सोनी परवीन का एक दिन पहले ऑपरेशन हुआ था. उनके पेट में पत्थर होने की बात डॉक्टरों ने बताई थी.

शुक्रवार 9 जून को ऑपरेशन कराकर उनकी मां और पिता दोपहर को घर पहुंचे. साहिल ने भी साथ में खाना खाया और जिस मोबाइल की दुकान पर वह काम करते थे, वहीं चले गए.

डेली मार्केट नाम का ये वही इलाका है, जहां प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई.

पिता से फ़ोन पर हुई बातचीत में उसने कहा कि मेन रोड में दंगा भड़क गया है. वह किसी तरह बच बचाकर जल्दी घर लौटेगा. थोड़ी ही देर बाद उसके दोस्त का फ़ोन आया कि साहिल को गोली लग गई है.

कर्बला चौक स्थिति अपने छोटे से घर में बीबीसी से बात करते हुए ऑटो चालक पिता मो. अफजल बताते हैं कि, "हमलोग हर दिन कमाने-खाने वाले लोग हैं. हमें इन सब चीजों से क्या लेना देना. मेरा बेटा तो उस भीड़ में भी नहीं था, वह तो घर को लौट रहा था. अब मेरा बेटा कौन वापस देगा."

"मेरा यही कहना है कि सरकार दोषियों को सख़्त से सख़्त सज़ा दे, ताकि जिस तरह मेरा बेटा गया है, किसी ग़रीब का बेटा न जाए. यह मेरा मंझला बेटा था. उसकी शादी की योजना बना रहे थे हमलोग. लेकिन इतने दिन की ही ज़िंदगी थी उसकी. अब क्या करें."

पिता ने पूछा- गोली क्यों चलाई

वे कहते हैं, "मैं पुलिस-प्रशासन से ये पूछना यह चाहता हूं कि उनके पास गोली चलाने के अलावा और कोई ऑप्शन था कि नहीं. भगदड़ को भगाने के लिए आंसू गैस छोड़ा जाता है, पानी छोड़ा जाता है. लेकिन मेरे बेटे के क्रियाक्रम के समय पानी वाला गाड़ी था. पुलिस का जवान था, प्रदर्शन के वक़्त नहीं. प्रशासन मेरा बेटा वापस करेगी क्या."

उन्होंने यह भी बताया कि, अस्पताल ले जाते वक़्त वह बातचीत करते हुए जा रहा था. साढ़े चार घंटा उसको ऑपरेशन थियेटर में रखा गया. लेकिन वह बच नहीं सका. नूपुर शर्मा के बारे वे कहते हैं, वह उसे नहीं जानते हैं. लेकिन यह प्रदर्शन किसलिए हो रहा था, ये वह जानते हैं.

अफ़ज़ल बताते हैं, ''किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना ठीक नहीं है. हमलोग हर दिन कमाने- खानेवाले निचले दर्जे के लोग हैं. इतना समय नहीं है कि धरना प्रदर्शन में जाएं. उसको 26 साल पेट काटकर पढ़ाए. वह आतंकवादी तो नहीं था, फिर किसलिए उसको गोली मारी गई."

ऑपरेशन और बेटे की मौत के बाद की स्थिति की वजह से मां सोनी परवीन बोलने के हालात में नहीं थी. बड़े बेटे ने कुर्सी पर उन्हें बिठाया. फिर उन्होंने अपना दर्द बयां किया. वे कहती हैं, "मेरा बेटा चल गया, पूरे घर को सपोर्ट करता था, कौन देगा अब हमको, वो तो चल गया. सरकार से यही चाहते हैं कि हमको इंसाफ़ मिले. जो गोली मारा उसको भी सजा मिले. बेटे को लेकर बहुत सपना था, अब उसी को ख़त्म कर दिया तो सपने का क्या."

वहीं साहिल के बड़े भाई मो. साक़िब का कहना था कि, "हमें हमारा भाई लौटा दीजिए बस. हमें हर हाल में इंसाफ़ चाहिए. हम तीनों भाई में केवल वही कमाता था. हेमंत सोरेन हमें इंसाफ़ दिलाएं. हवाई फायरिंग आसमान में किया जाता है, सीने में नहीं."

इससे पहले शनिवार दोपहर बाद तीन बजे उनके घर से जनाजा निकला और कांटाटोली स्थित कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया. इस दौरान बड़ी संख्या में पुलिस बल उसके जनाजे के साथ निकली. बड़ी संख्या में आसपास के लोग भी इस दौरान शामिल रहे.

दोनों ही मरनेवाले के परिजन निम्न आय वर्ग से आते हैं. एक के पिता दिहाड़ी मजदूर हैं, तो एक के ऑटो ड्राइवर. मुदस्सिर परिवार का इकलौता बेटा था तो साहिल तीन भाइयों में इकलौता कमाने वाला. इन परिवार पर दुखों का आसमान टूट पड़ा है.

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