महुआ मोइत्रा पर पार्टी सख़्त, पर क्यों नहीं नरम पड़ रहे उनके तेवर?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
महुआ मोइत्रा के काली पर दिए बयान से भले ही उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने किनारा कर लिया हो, लेकिन महुआ मोइत्रा अपने बयान पर अब भी कायम हैं.
वो इस बारे में ट्वीट भी कर रही हैं और इंटरव्यू में भी अपनी बात रख रही हैं.
तृणमूल कांग्रेस में ऐसा बहुत कम ही देखने को मिलता है कि पार्टी ने किसी सांसद, विधायक के दिए बयान से किनारा कर लिया हो और उसके बाद भी नेता उस बयान को दोहराए.
इस वजह से महुआ के राजनीतिक सफ़र और भविष्य को लेकर कई तरह के सवाल पूछे जा रहे हैं.
महुआ के इस तेवर का राज़ क्या है? पार्टी उन पर क्या कार्रवाई करेगी? ममता बनर्जी से उनके रिश्तों में क्या खटास आ गई है?
इन तमाम सवाल के जवाब जानने के लिए बीबीसी ने महुआ मोइत्रा से साक्षात्कार का समय मांगा है, उनकी तरफ़ से जवाब का इंतज़ार है.
गुरुवार को भी महुआ ने 'सावधान महुआ' नाम से अंग्रेज़ी में एक कविता भी ट्वीट की, जिसकी एक लाइन का आशय यह था कि 'मुझे सावधान करने के बजाय मेरे साथ खड़े होने का समय है.'
लेकिन ऐसे वक़्त में जब उनकी टिप्पणी राष्ट्रीय राजनीति में विवाद का मुद्दा बन गई है, उनकी अपनी पार्टी ही उनके साथ खड़ी नज़र नहीं आ रही है.

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टीएमसी का बयान
पार्टी के सांसद सौगत रॉय से बीबीसी ने इस बारे में सम्पर्क किया.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "महुआ ने जो बयान दिया है, उसके बारे में महुआ को ख़ुद जवाब देना चाहिए. हमारी पार्टी उनके बयान से इत्तेफ़ाक नहीं रखती है. हमारा कहना है कि कोई भी धार्मिक विषय पर पार्टी टिप्पणी नहीं करना चाहती. किसी की धार्मिक भावना को कोई ठेस पहुंचे, ऐसी कोई टिप्पणी पार्टी की ओर से नहीं की जानी चाहिए. इसके बाद जो होगा उसका सामना महुआ को ख़ुद करना पड़ेगा."
ग़ौरतलब है कि महुआ के बयान पर मध्यप्रदेश में एफ़आईआर दर्ज की गई है. सौगत रॉय उसी बारे में कह रहे थे.
उन्होंने आगे कहा, "महुआ के ख़िलाफ़ पार्टी कोई क़दम उठाएगी या नहीं इस पर पार्टी के भीतर चर्चा हो रही है. उन पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी या नहीं इस पर विचार चल रहा है. जो भी फ़ैसला होगा आपको पता चल जाएगा."

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क्या है पूरा विवाद
पश्चिम बंगाल की कृष्णानगर सीट से लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा ने इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में मंगलवार को कहा था कि यह व्यक्ति का अधिकार है कि वह अपने आराध्य को किस रूप में देखता है.
महुआ ने कहा था, ''मिसाल के तौर पर आप भूटान और सिक्किम में जाते हैं तो वे पूजा में अपने आराध्य को व्हिस्की देते हैं. लेकिन अगर उत्तर प्रदेश में जाएंगे और प्रसाद के रूप में व्हिस्की देने की बात करेंगे तो लोग इसे ईशनिंदा के रूप में लेंगे.''
"मेरे लिए काली एक मांस खाने वाली और शराब स्वीकार करने वाली देवी हैं. आप तारापीठ (पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले में एक शक्ति पीठ) जाएंगे तो पाएंगे कि साधु स्मोकिंग कर रहे हैं. काली की पूजा करने वाले आपको अलग-अलग मिलेंगे. हिन्दू धर्म के भीतर काली के उपासक के तौर पर मुझे अधिकार है कि मैं अपनी देवी की कल्पना अपने हिसाब से कर सकूं. यही मेरी आज़ादी है.''
मोइत्रा से काली पर विवादित डॉक्यूमेंट्री को लेकर सवाल पूछा गया था. इस फ़िल्म में देवी काली को स्मोक करते हुए दिखाया गया है.
मोइत्रा ने कहा था, ''जिस तरह से आपको शाकाहारी और सफ़ेद वस्त्र में ईश्वर की पूजा की आज़ादी है, उसी तरह से मुझे भी मांसाहारी देवी की पूजा की आज़ादी है.''

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महुआ मोइत्रा की यह टिप्पणी कुछ ही घंटों में वायरल हो गई. इसके बाद महुआ मोइत्रा ने आरएसएस पर हमला करते हुए एक स्पष्टीकरण भी जारी किया.
उन्होंने कहा कि उनका बयान विवादित पोस्टर के संदर्भ में नहीं था.
ऐसे में सवाल उठता है कि पार्टी को उनके बयान से किनारा करने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई?
पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ पत्रकार पुलकेश घोष कहते हैं, "महुआ मोइत्रा के संसदीय क्षेत्र में अल्पसंख्यकों की अच्छी खासी तादाद है. उनके इस बयान से उनके संसदीय क्षेत्र के वोट बैंक पर भले ही ज़्यादा असर नहीं पड़ता है लेकिन टीएमसी के वोट बैंक पर असर पड़ता है. पश्चिम बंगाल में यूपी बिहार से आकर बसे हिंदुओं की भी तादाद अच्छी खासी है. तृणमूल कांग्रेस को उस वोट बैंक की चिंता थी."
"महुआ को शायद पहले इस बात का अंदाजा नहीं था. लेकिन पार्टी के बयान के बाद, महुआ के बयान पर आप ग़ौर करें तो वो भी ख़ुद को बार-बार हिंदू कहती नज़र आ रही है. उन्होंने अपने व्हॉटसऐप डीपी में पहले माँ काली की फ़ोटो लगाई फिर माथे में तिलक वाली फ़ोटो लगा दी. ग़ौर करने वाली बात है कि उन्होंने पार्टी के ट्विटर हैंडल को अनफॉलो कर दिया है, ममता बनर्जी को नहीं."
कुछ जानकार ये भी कहते हैं कि बीजेपी ने हिंदू पहचान की राजनीति को बंगाल में स्थापित कर दिया है.
टीएमसी को लगता है कि महुआ का बयान इस वजह से उन पर भारी न पड़ जाए.
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ममता बनर्जी और पार्टी पर महुआ का बयान
इस बयान से जब विवाद बढ़ा तो टीएमसी ने बयान से किनारा कर लिया. महुआ ने पार्टी के ट्विटर हैंडल को अनफ़ॉलो कर दिया.
जब इस बारे में महुआ से एनडीटीवी से सवाल पूछा, तो उनका जवाब था, "ये मेरे और पार्टी के बीच का मामला है. उचित फ़ोरम पर इसे सुलझा लिया जाएगा. नेशनल टीवी चैनल पर कुछ बोल कर आप लोगों को मसाला नहीं देना चाहती."
साफ़ है पार्टी के साथ उनके रिश्ते काली पर दिए बयान के बाद थोड़े उलझ गए हैं. इसका अंदाज़ा उन्हें भी है.

महुआ मोइत्राः एक परिचय
- सांसद के रूप में महुआ मोइत्रा का ये पहला कार्यकाल है.
- इससे पहले वो पश्चिम बंगाल में विधायक रह चुकी हैं.
- उन्होंने विदेश से पढ़ाई की, इंवेस्टमेंट बैंकर की नौकरी की और फिर सबकुछ छोड़ कर 2009 में राजनीति में कूद पड़ीं.
- पहले वो कांग्रेस से जुड़ी और फिर 2010 में टीएमसी ज्वाइन की.
- 2016 में करीमपुर सीट से विधायक बनीं और फिर 2019 में कृष्णानगर सीट से सांसद.
- 2021 में ममता बनर्जी ने गोवा में चुनाव लड़ने का फैसला किया, तो वहां की तैयारियों की ज़िम्मेदारी पार्टी ने महुआ को ही दी.


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कैसे रहे हैं महुआ-ममता बनर्जी के साथ रिश्ते
पश्चिम बंगाल की राजनीति को क़रीब से देखने और समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार गौतम लाहिड़ी कहते हैं, "ममता से महुआ के रिश्ते मधुर रहे हैं. ममता उनको बहुत मानती हैं. इस बयान के आधार पर दोनों के रिश्तों को देखना सही नहीं है. उस पर कोई असर नहीं पड़ेगा."
वे आगे कहते हैं, "टीएमसी में ये पहला मौका नहीं है जब पार्टी ने अपने नेता के बयान से किनारा किया हो. ऐसे मौके पहले भी आए हैं. पूर्व में कुणाल घोष, सौगत राय के बयान से भी पार्टी ने ख़ुद को अलग किया था. ऐसे मामलों में ज़्यादा से ज़्यादा कुछ समय तक पार्टी, नेताओं को प्रवक्ता पद से हटा देती है. कार्रवाई के नाम पर पार्टी में इसी तरह का एक्शन होता है."
महुआ के ताज़ा तेवर पर वो कहते हैं, "महुआ के तेवर हमेशा से ऐसे ही रहे हैं. इसी तरह के तेवर के लिए वो जानी जाती हैं. उनके बयान में आक्रामकता हमेशा रहती है. चाहे संसद में दिए उनके भाषण हों या फिर पार्टी प्रवक्ता के तौर पर उनके बयान."
ये भी पढ़ें : महुआ मोइत्रा: देश में फ़ासीवाद के शुरुआती संकेत

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अडानी पर ट्वीट और महुआ का जवाब
गौतम याद दिलाते हैं कि ये पहला मौका नहीं है जब वो ऐसे खुलकर अपनी किसी बात पर अडिग हैं.
अडानी से जुड़े उनके एक मामले को याद करते हुए वो कहते हैं, "ट्विटर पर गौतम अडानी के ख़िलाफ़ वो काफ़ी मुखर रही हैं. पिछले साल दिसंबर में जब गौतम अडानी से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुलाक़ात हुई तो उनसे सवाल पूछा गया - क्या आपने अपने पुराने ट्वीट डिलीट कर दिए हैं. जवाब में उन्होंने लिखा - वो अब भी मौजूद हैं. और मैं अपने स्टैंड पर अब भी कायम हूँ. "
उस वक्त भी उनका स्टैंड, ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ ही माना गया था.
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महुआ को ममता की डांट
इसी ट्वीट के कुछ दिन बाद एक सार्वजनिक सभा में ममता बनर्जी, महुआ मोइत्रा से सख़्ती से पेश होती नज़र आई थीं.
पिछले साल दिसंबर में ही पश्चिम बंगाल के नादिया इलाक़े में प्रशासनिक कामकाज के रिव्यू के दौरान ममता बनर्जी ने उनका नाम लेकर उनकी क्लास लगाई थी.
ममता बनर्जी ज़िले में पार्टी के भीतर बढ़ती गुटबाज़ी पर नाराज़गी ज़ाहिर कर रही थीं.
इस दौरान सीएम ममता बनर्जी ने कहा था, "महुआ, मैं यहां एक स्पष्ट संदेश दे रही हूं. कौन किसके पक्ष में है, कौन किसके पक्ष में नहीं है मुझे यह देखने की ज़रूरत नहीं है. अगर कोई किसी को पसंद नहीं करता है और वो यूट्यूब या समाचार पत्र में कुछ समाचार भेजता है तो इस तरह की राजनीति एक दिन के लिए चल सकती है लेकिन हमेशा के लिए नहीं. एक पद पर एक व्यक्ति हमेशा के लिए बना रहेगा, ऐसा मान लेना भी सही नहीं है. जब चुनाव होगा, तो पार्टी तय करेगी कि कौन लड़ेगा और कौन नहीं. इसलिए, यहां कोई असहमति नहीं होनी चाहिए."
जिस समय ममता बनर्जी ये सब कह रही थीं, उस वक़्त मंच पर महुआ ख़ुद मौजूद थीं.
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आगे क्या होगा?
वरिष्ठ पत्रकार गौतम लाहिड़ी कहते हैं, "अगर महुआ इसी तरह पार्टी लाइन से अलग लाइन अख़्तियार करती रहीं, तो निश्चित तौर पर पार्टी की वजह से जो लाइमलाइट उन्हें मिलती रही है, वो आगे नहीं मिलेगी. पार्टी उन्हें संसद या पार्टी मंच से बयान देने के मौके आगे नहीं देगी. लेकिन अभी महुआ के लिए पार्टी में ऐसी कोई स्थिति दिखाई नहीं दे रही है."
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को छोड़ कर कोई दूसरी पार्टी ऐसी नहीं है जहां महुआ जा सकें, जहाँ से वो दोबारा सांसद बन कर वापस लोकसभा पहुँच सकें.
महुआ कांग्रेस छोड़ कर टीएमसी में आई हैं.
लेफ़्ट का पश्चिम बंगाल में वजूद बचा नहीं है.
बीजेपी के ख़िलाफ़ ही वो मोर्चा लेकर खड़ी हैं, इसलिए फिलहाल यथास्थिति यही रहने वाली है.
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