अनिवार्य शिक्षा विधेयक पारित

भारतीय संसद ने छह से 14 साल के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के लिए एक विधेयक पारित कर दिया है.
राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद इन बच्चों को तालीम दिलवाना अब केंद्र और राज्य सरकारों का कानूनी दायित्व होगा.
केंद्र सरकार का कहना है कि इस विधेयक के दस मुख्य लक्ष्य हैं जिनमें निजी स्कूलों में 25 फ़ीसदी सीटें ग़रीब बच्चों के लिए आरक्षित करना और स्कूलों में दाख़िले को लेकर लालफ़ीताशाही ख़त्म करना शामिल है.
विधेयक में ये भी कहा गया है कि तीन साल के भीतर सभी राज्य हर इलाक़े में स्कूल बना देंगे.
साथ ही सरकार शिक्षा को बढावा देने के लिए प्राइवेट स्कूलों को भी वित्तीय मदद देने का इरादा रखती है.
ये विधेयक राज्यसभा में पहले ही पारित हो चुका था और लोकसभा ने इसे बहस के बाद मंगलवार को पारित कर दिया.
ज़िम्मेदारी
जहाँ इस विधेयक को शिक्षा के क्षेत्र में एतेहासिक बताया जा रहा है वहीँ कई लोकसभा सदस्यों ने इसपर सवाल खड़े किये.
सवाल उठाने वाले में कुछ कांग्रेस पार्टी के सदस्य भी थे.
कांग्रेस संसद गिरिजा व्यास का कहना था कि सरकार मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की ज़िम्मेदारी सिर्फ छह से 14 साल के बच्चों के लिए ही क्यों ले रही है?
भारत उस अंतरराष्ट्रीय समझौते का सदस्य है जिसमें जन्म के बाद से 18 साल तक के बच्चों की शिक्षा की ज़िम्मेदारी सरकारों की है.
व्यास का कहना था कि बिल के प्रावधानों को लागू करने की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों पर छोड़ना सही कदम नहीं.
समाजवादी सांसद जयाप्रदा का कहना था कि स्कूलों के लिए प्रशिक्षित टीचर कहां से मिलेंगें.
अधिकतर राज्य सरकारें आजकल शिक्षकों की बहाली संविदा के आधार पर कर रही है.
देर शाम मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने सदस्यों के सवालों का विस्तार से जवाब दिया और कहा कि इस विधेयक में कई ऐतिहासिक कदम उठाए गए हैं.
उदाहरण के लिए इसमें शिक्षकों को प्रशिक्षण, स्कूलों को मान्यता देने के लिए संविधान के अनुरूप रूपरेखा जैसी बातों का प्रावधान है.
वैसे कई शिक्षाविद इसकी ये कहकर आलोचना कर रहे हैं कि काफ़ी बच्चे इसके दायरे से बाहर रह गए हैं.
































