'इज़्ज़त' के नाम पर क्यों हो रही हैं हत्याएँ
बीबीसी ने इस मुद्दे पर एक विस्तृत जाँच कर इन मामलों की जड़ तक पहुँचने का प्रयास किया है. हमारे दिमाग़ मे तीन सवाल थे - क्या सम्मान के नाम पर होने वाली हत्याएँ वास्तव मे इतने बड़े पैमाने पर होती हैं? दूसरा यह कि वो मनोस्थिति क्या होती है जिसके वश में आकर मां-बाप या अन्य परिजन अपने ही बच्चों को क़त्ल करने को तैयार हो जाते हैं? तीसरा यह कि खाप पंचायतें इन इलाक़ों मे लोगों की निजी ज़िदंगी को कैसे नियंत्रित करती हैं?
हमनें देहात का विस्तृत दौरा किया, अनेक पीड़ित परिवारों से बातचीत की और खाप पंचायतों के सदस्यों से पूछताछ भी की...हम अपनी जाँच पूरी कर लौट ही रहे थे कि ख़बर आई कि हरियाणा के हांसी में अपने 'मन की साथी चुनने की भूल करने वाले' एक और जोड़े को मौत की नींद सुला दिया गया है.
भय-आतंक ने पीछा न छोड़ा
सबसे पहले हमारी मुलाक़ात हुई दिल्ली के सुल्तानपुर डबास गाँव में रविद्र और शिल्पा से...ये दोनों 24 घंटे पुलिस की सुरक्षा में रहते हैं. वे कहते हैं कि भय और आतंक ने उनका पीछा नहीं छोड़ा है. कुछ दिन पहले रविंद्र ने ज़हर खाकर अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने की कोशिश की थी.
रविन्द्र का पुश्तैनी गांव हरियाणा के झज्जर ज़िले का ढराणा है जिसमें कादियान गोत्र के लोग बहुमत में हैं. रविंद्र की पत्नी शिल्पा का गोत्र भी कादियान है. इस बात से कादियान खाप पंचायत बेहद नाराज़ है और उसका आदेश है कि रविन्द्र और शिल्पा को रिश्ता तोड़ना होगा.
यदि वे एसा नही करते तो रविंद्र के खानदान को ढराणा गांव छोड़ना होगा. पंचायत का फ़ैसला मान कर रविंद्र का परिवार गांव छोड़कर चला गया था. लेकिन चंडीगढ़ स्थित पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद रविंद्र का परिवार भारी पुलिस सुरक्षा के बीच गांव लौट आया.

जब हम ढराणा गांव पहुंचे तो हमारी सबसे पहली मुलाक़ात खाप पंचायत के सदस्यों से ही हुई. कादियान खाप के लोगों ने भारी पुलिस बल की मौजूदगी के बावजूद गांव के बाहर डेरा डाला हुआ है और ये घोषणा की गई है कि वे रिसालसिंह यानि रविंद्र के दादा के पूरे ख़ानदान को गांव से निकाल कर ही दम लेगें.
हुक्का गुड़गुड़ाते हुए 80 वर्षीय छतरसिंह नंबरदार ने कहा, "जो लड़के-लड़की खाप का नियम तोड़ते हैं, उन्हें मौत के घाट उतार देना बिल्कुल ग़लत नही है. जो नियम उनके पूर्वजों ने बनाए हैं, उन्हें तोड़ने की अनुमति किसी को नही दी जा सकती. हरियाणा मे देश का नही, खाप का क़ानून चलता है और ये चलता रहेगा."
उनके साथ बैठे एक और बुज़ुर्ग ने भी हामी भरते हुए इस बात को सही ठहराया. उनका कहना था, "ये बात सही है की समय बदल रहा है और समय के साथ समाज भी बदल रहा है, पर जहाँ तक खाप पंचायतों के बनाए नियमों का सवाल है, जब तक हमारा बस चलेगा, उन्हे बरक़रार रखा जाएगा."












