बिहार की राजनीति का झूठा सच

- Author, मणिकांत ठाकुर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना
बिहार की पंचायती संस्थाओं में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की राज्यव्यापी नीतीश-पहल को देशव्यापी मनमोहन-विस्तार मिल गया है.
जब प्रधानमंत्री ने पीठ थपथपाई तो मुख्यमंत्री का सीना फूल गया. लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए इस एक मामले की ख़ुशी पर कई अन्य मामलों का दुख भारी हो रहा है. ऐसा वो ख़ुद कहते भी हैं.
पिछले साल के 'कोसी जल- प्रलय' का ज़िक्र आते ही मुख्यमंत्री फट पड़ते है.
वो कहते हैं, "प्रधानमंत्री ने जिसे राष्ट्रीय विपदा कहा, उसके पीड़ितों के पुनर्वास मद में मांगी गई नौ हज़ार आठ सौ करोड़ रूपए की विशेष केंद्रीय सहायता पर उनका आँख मूँद लेना घोर आश्चर्य ही नहीं, अन्याय है."
नीतीश का कहना है, "बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देना तो दूर रहा, अब सूखे के गंभीर संकट के मद्देनज़र राज्य सरकार ने जो 23 हज़ार करोड़ रूपए की मांग की है, उस पर भी कहीं न ग्रहण लग जाए. सड़क निर्माण संबंधी केंद्रीय राशि देने में भी इसी तरह टालमटोल वाला रवैया देखने को मिल रहा है. बिहार के प्रति केंद्र की यह कैसी दुश्मनी है ?"
जब कांग्रेस के कुछ शीर्ष नेताओं ने बिहार में जनशिकायत दर्ज करने के लिए लागू नई सूचना तकनीक की प्रशंसा की थी, तब नीतीश कुमार बहुत प्रसन्न हुए थे.
किसी कांग्रेसी को जब तत्कालीन रेलमंत्री लालू प्रसाद को चिढ़ाना होता था तो वह नीतीश कुमार की तारीफ़ कर देता था. ठीक उसी तरह लालू जी को "मैनेजमेंट गुरु" कहने वालों पर नीतीश कुमार चिढ़ते रहते थे.
राजनीति चमकाना
अब अगर इन दोनों स्थितियों का सामान्य विश्लेषण किया जाय तो इनके मूल में अपनी-अपनी राजनीति चमकाने की सोच साफ़ दिख जाती है.
ज़रा और खोलकर देखिए तो लगेगा कि पंचायतों में महिला आरक्षण वाली वोट-नीति से राज्य स्तर पर नीतीश कुमार ने और राष्ट्रीय स्तर पर सोनिया गांधी ने अपने लिए महिला पक्षधरता का झंडा बनाया है.
विधान मंडल और संसद में महिलाओं के लिए आरक्षण के सवाल पर नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड का नकारात्मक रवैया किसी से छिपा नहीं है.
पार्टी अध्यक्ष शरद यादव इस आरक्षण को रोकने के लिए 'ज़हर तक खा लेने ' को तैयार हैं. ऐसे में नीतीश कुमार यही पंचायतों वाला महिला आरक्षण दिखाकर अपनी वोट- नीति बचाते हैं. शायद इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी भी अपनी महिला- पक्षी राजनीति चलाने में इस नीतीश- पहल की शुक्रगुजार हो गई हैं.
जहाँ तक पंचायती संस्थाओं में इस आरक्षण व्यवस्था के ज़रिए महिलाओं के सशक्तिकरण की बात है, तो इस बाबत बिहार का अनुभव बहुत निराशाजनक है.
कठपुतली महिलाएं
आरक्षित पदों पर निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों में से अधिकतर को उनके पारिवारिक पुरुषों ने कठपुतली या रबड़ स्टांप बनाकर महिला सशक्तीकरण की ज़मीन ही खिसका दी है. कहीं-कहीं तो बड़ी हास्यास्पद स्थिति है.

मुखिया-पति या सरपंच-पति का ऐसा बोलबाला है कि गाँव के लोगों में वहां के महिला प्रतिनिधियों की कोई पहचान तक नहीं रह गई है. और कहीं-कहीं ऐसा भी हुआ है कि जो सीधी-सादी और कुछ पढ़ी-लिखी घरेलू महिला थीं, उन्हें उनके घर वालों ने मुखिया या और कोई प्रतिनिधि बनवाकर पंचायती संस्थाओं में चल रहे भ्रष्टाचार के खेल में माहिर बना दिया है. इसे क्या नारी सशक्तीकरण कहेंगे?
लेकिन हाँ, ग्रमीण समाज को नेतृत्व दे सकने में क़ाबिल महिलाओं को इस आरक्षण ने सशक्त बनाया है.
कुछ महिलाओं को इससे आगे बढ़ने का साहस भी मिला है. लेकिन ऐसा सकारात्मक बदलाव इतना कम हुआ है कि उस पर भारी पर चुकी गड़बड़ियां ही ज्यादा नज़र आती हैं. सरकार इन गड़बड़ियों को दुरुस्त करने के बजाय इस आरक्षण का अधिक से अधिक राजनीतिक लाभ लूटने में लगी हुई है.
दूसरी तरफ़, केंद्र सरकार से आपदा राहत मद में अरबों-अरब रूपए की मांग, और यह मांग पूरी नहीं होने का ख़ूब शोर मचाना भी राजनीति का ही एक दाव है.
श्रेय लेने का मामला
इसी दाँव के तहत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कोसी अंचल को बाढ़ विध्वंस से पहले वाली स्थिति से भी ज़्यादा समृद्ध और सुंदर बनाने का वादा किया था. अब वो अपनी असमर्थता यह कहकर ज़ाहिर कर रहे हैं कि केंद्र सरकार ने इस के लिए मांगी गई रकम नहीं देकर बिहार के साथ घात किया है. पूरी कांग्रेसी जमात इसे नीतीश कुमार का चालाकी भरा प्रलाप मानती है.
अब सोचकर देखिये कि केद्र सरकार आपदा राहत मद में बिहार को भारी भरकम राशि भेजकर उस का श्रेय नीतीश कुमार को भला क्यों लेने देगी?
इसलिए यह मामला त्रिशंकु-सा लटका पड़ा है. उधर अगले साल बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र नीतीश कुमार को भी तो अपनी विफलताएं छिपाने का कोई बहाना चाहिए.
इसके लिए एक जुमला है, जो केंद्र में अपने विरोधियों की सरकार हो तो बड़ा फ़िट बैठता है."बिहार के साथ केंद्र का सौतेला रवैया." ऐसे में बिहार का भला आदमी सोचता रहता है- "को बर छोट कहत अपराधू!" यही तो है नेताओं के स्वार्थी दाँव- पेंच वाली राजनीति का झूठा सच!
































