वाईएसआर: विद्रोह से लोकप्रियता तक

आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी की हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत हो गई है. उनका हेलिकॉप्टर बुधवार, दो सितंबर से लापता था लेकिन उनकी मौत की पुष्टि गुरुवार, तीन सितंबर को हुई.
डॉक्टर येदुगुड़ी सनदिंति राजशेखर रेड्डी को आमतौर पर वाईएसआर के रूप में जाना जाता रहा. वह एक करिश्माई और लोकप्रिय नेता माने जाते थे और इसके पीछे उनका लंबा राजनीतिक संघर्ष रहा है.
जिस मिलनसार और मृदुभाषी नेता के रुप में वाईएसआर को अब जाना जाता रहा है वह उनकी उस छवि से अलग थी जो उनके राजनीतिक संघर्षों के दिनों में थी.
तब वे एक विद्रोही नेता के रुप में जाने जाते थे.
वर्ष 1978 में उन्होंने इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ बग़ावत का झंडा बुलंद किया और रेड्डी कांग्रेस में शामिल हो गए लेकिन बाद में जब इंदिरा कांग्रेस में लौटे तो उन्हीं इंदिरा गांधी ने 1983 में उन्हें प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया.
वह उनका विद्रोही स्वभाव ही था कि अक्सर वे प्रधानमंत्री नरसिंह राव सहित कई दिग्गज नेताओं के ख़िलाफ़ खड़े हुए दिखाई दिए.
लेकिन 1997 में फिर से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद तेलुगु देशम पार्टी के ख़िलाफ़ राजनीतिक लड़ाई लड़ते हुए उन्होंने अपनी छवि को काफ़ी हद तक बदला.
वर्ष 2003 में लगभग डेढ़ हज़ार किलोमीटर की पदयात्रा ने उनके लिए आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री पद का रास्ता बनाया.
विवाद भी साथ
वर्ष 2004 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने कई ऐसी योजनाएँ बनाईं जिसने उन्हें लोकप्रिय बनाया.
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उनके बारे में कहते हैं कि उन्होंने कांग्रेस की सबको साथ लेकर चलने वाली आर्थिक नीतियों को पूरी तरह से लागू किया और ग़रीबों ओर महिलाओं के लिए विशेष योजनाएँ बनाईं और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम किया.
वर्ष 2009 में जब विधानसभा के चुनाव हुए तो दूसरी बार पार्टी की जीत ने उन्हें कांग्रेस का हीरो बना दिया.
लेकिन ऐसा नहीं है कि उनके खाते में सिर्फ़ लोकप्रियता ही आई.
इस बीच विपक्षी दलों ने वाईएसआर पर भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और भाई भतीजावाद के भी आरोप लगाए.
पहली बार सत्ता में आने के बाद उन्होंने संघर्ष विराम घोषित करते हुए नक्सलियों या माओवादियों को बातचीत के लिए आमंत्रित किया और फिर हथियार न छोड़ने की सूरत में यह बातचीत टूट गई.
उस समय यह आरोप भी लगा कि इस संघर्ष विराम ने नक्सलियों को ताक़त बटोरने का मौक़ा दिया.
वर्ष 2004 का चुनाव उन्होंने तेलंगाना पार्टी के साथ लड़ा और पृथक तेलंगाना राज्य के मसले पर उनसे नाता भी तोड़ लिया.
कहा जाता है कि कांग्रेस आलाकमान उन पर इस तरह मेहरबान रहा जैसा कि आमतौर पर मुख्यमंत्रियों पर वह नहीं होता.
राजनीति में रुचि
डॉक्टर रेड्डी का जन्म आठ जुलाई 1949 को पिछड़ा माने जाने वाले रायलसीमा क्षेत्र के पेलिवेंदुला में हुआ था.
वाईएस राजा रेड्डी के पुत्र डॉक्टर रेड्डी ने अपने छात्र जीवन के दिनों से ही राजनीति में रुचि दिखानी शुरू कर दी थी. जब वह एमआर मेडिकल कॉलेज, गुलमर्गा, कर्नाटक में पढ़ाई कर रहे थे तो वह छात्र संघ के अध्यक्ष भी रहे.
एमबीबीएस की डिग्री हासिल करने के बाद डॉक्टर रेड्डी ने कुछ समय के लिए जम्मलमडुगु मिशन अस्पताल में चिकित्सा अधिकारी के रूप में भी काम किया.
अपने पैतृक स्थान पुलिवेंदुला में उनके परिवार ने समाज कल्याण के अनेक कार्य किए.
डॉक्टर रेड्डी में एक व्यावसायी के गुण भी विद्यमान रहे और उनकी उद्यमी कुशलताओं के साथ-साथ उनके भीतर मौजूद पारदर्शिता ने उन्हें व्यावसायी दुनिया में भी स्थापित किया.
उन्होंने 1978 में पहली बार चुनाव लड़ा. वह चार बार राज्य विधान सभा के सदस्य रहे और चार बार लोकसभा के सदस्य.
इसे उनकी विशेषता माना जाता है कि उन्होंने जितने चुनाव लड़े सबमें जीत हासिल की.
































