यूपी भाजपा: उत्थान-पतन की दास्ताँ

- Author, रामदत्त त्रिपाठी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ
उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी कार्यालय के बाहर एक बड़े से बोर्ड पर लिखा है समाचारपत्रों में भाजपा.
इस बोर्ड पर भाजपा से संबंधित ख़बरों की कतरने लगाई जाती हैं कि पार्टी का मीडिया मैनेजमेंट ठीक है.
पार्टी पदाधिकारी मीडिया में अपनी ख़बरें और फोटो देखकर खुश हो लेते हैं, लेकिन चुनावी राजनीति में उत्तर प्रदेश भाजपा की जमीन लगातार खिसकती जा रही है.
अब वह नंबर एक नीचे उतर कर चौथे नंबर पर पहुँच गई है.
बात करो तो भाजपा कार्यकर्ता कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में पार्टी नेतृत्वविहीन है और उसके पास ऐसा कोई मुद्दा भी नही बचा, जिससे जनता आकर्षित हो. इसलिए पार्टी का बचाखुचा वोटर अब तेजी से कांग्रेस की तरफ भाग रहा है.
इसका सबसे ताजा उदाहरण लखनऊ पश्चिम विधानसभा उपचुनाव है.
लालजी टंडन की इस परम्परागत सीट पर भाजपा को हराकर कांग्रेस का उम्मीदवार जीत गया.
दरअसल यह चुनाव पार्टी में एक दशक से चली आ रही गुटबाजी का भी प्रतीक है.
टंडनजी को शिकायत है कि उम्मीदवार तय करने में उनकी राय भी नही ली गई, जबकी विरोधी यानि राजनाथ गुट का कहना है कि पार्टी प्रत्याशी को टंडन जी ने ही हरवाया क्योंकि वो अपने बेटे को टिकट चाहते थे.
आंतरिक लोकतंत्र की कमी
भाजपा की यह एक खूबी हुआ करती थी कि वह सामूहिक नेतृत्व के आधार पर चलती थी और उसमे एक आतंरिक लोकतंत्र था.

पर पिछले कई वर्षों से पार्टी में आतंरिक लोकतंत्र गायब होता गया और प्रदेश अध्यक्ष दिल्ली से मनोनीत होने लगा.
प्रदेश भाजपा में कल्याण सिंह, कलराज मिश्र, लालजी टंडन, ओम प्रकाश सिंह और राजनाथ सिंह ये पांच प्रमुख नेता हुआ करते थे.
लेकिन 1999 में कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री पद हटाने की मुहिम से भाजपा जो गुटबाजी शुरू हुई उसने इस सामूहिक नेतृत्व को छिन्न-भिन्न कर दिया.
लालकृष्ण आडवाणी के क़रीबी कल्याण सिंह सीधे अटल बिहारी वाजपेयी से टकराए. इससे पार्टी में अगड़ों और पिछड़ों का सामंजस्य टूट गया.
कल्याण सिंह को दुबारा पार्टी में लाया गया. मई, 2007 में विधानसभा चुनाव कल्याण सिंह के नेतृत्व में लड़ा गया, मगर पार्टी उठ नही सकी.
लोक सभा चुनाव से पहले कल्याण सिंह ने मुलायम से हाथ मिलाया और अब वह फिर अपनी नई पार्टी बनाने जा रहे हैं. कल्याण सिंह फिर से हिंदूवादी हो रहे हैं.
दरअसल उत्तर प्रदेश में भाजपा की मुश्किलें कल्याण राज में अयोध्या की विवादित बाबरी मस्जिद टूटने के बाद से शुरू हो गईं थीं.
1993 में मिले मुलायम कांशीराम हवा हो गए जय श्रीराम का नारा कामयाब रहा.
इस गठबंधन को तोड़ने और 'हिन्दू समाज की एकजुटता’ के लिए भाजपा ने मायावती को मुख्यमंत्री बनवाया.
फिर 1996 में भाजपा ने मायावती के साथ छमाही मुख्यमंत्री का अनोखा प्रयोग किया.
1997 में कल्याण सरकार बचने के लिए आपद धर्म के नाम पर डेढ़ दर्जन माफिया अपराधियों को मंत्री बनाया.
दिल्ली और लखनऊ दोनों जगह सत्ता में रहते हुए अयोध्या में शिलादान कार्यक्रम के लिए गए कार सेवकों पर डंडे चलवाए और उन लाखों कार्यकर्ताओं को नाराज़ किया जिनकी बदौलत भाजपा उत्तर प्रदेश में 1991 में पहली और आख़िरी बार अकेले बहुमत में आई थी.
रही सही कसर आडवाणी के जिन्ना प्रेम पूरी कर दी.
नेता की कमी
मायावती ने धीरे-धीरे भाजपा के सवर्ण मतदाता को सत्ता में हिस्सेदारी का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया.
भाजपा का दुर्भाग्य है कि सवर्ण मतदाता अब मायावती से मुंह मोड़कर भाजपा में जाने के बजाय कांग्रेस की तरफ वापस जा रहे हैं. अटलजी बीमार होकर सक्रिय राजनीति से अलग हैं.
मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए भाजपा के पास न तो को नेता है, न विचारधारा और न कार्यक्रम.
जानकारों का कहना है कि वर्षों तक सत्ता में रहने से भाजपा नेताओं पर भी भ्रष्टाचार का दाग लग गया है.
यहाँ तक कि संघ के संगठन मंत्री भी भ्रष्टाचार के आरोपों से नही बचे जिनके जरिये आरएसएस भाजपा पर नैतिक नियंत्रण रखता था.
उत्तर प्रदेश भाजपा में अब केवल राजनाथ सिंह अकेले नेता बचे हैं, जिन पर सारा दारोमदार है.
राजनाथ सिंह एक चतुर खिलाड़ी माने जाते हैं, जिन्होंने तत्कालीन संघ प्रमुख रज्जू भैया के आशीर्वाद से लगातार तरक्की पाई. लेकिन इस प्रक्रिया में उन्होंने बाकी सारे नेताओं को बौना कर दिया.
कहते हैं कि राजनाथ सिंह को अब भी संघ का विश्वास हासिल है, पर मुश्किल यह है कि राजनाथ को भाजपा नेताओं के एक बड़े तबके का विश्वास हासिल नही है.
जानकारों का कहना कि इन्ही सब कारणों से उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा से निराश मतदाता वापस भाजपा में जाने के बजाय कांग्रेस की तरफ रुझान कर रहा है.
































