बड़े उल्फ़ा नेता की रिहाई

- Author, सुबीर भौमिक
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कोलकाता
असम में एक बड़े अलगाववादी नेता को छह साल के बाद जेल से रिहा किया गया है. इसके बाद से अटकलें लगाई जा रही हैं कि सरकार शायद उल्फ़ा के कुछ नेताओं से बातचीत करने पर विचार कर सकती है.
इसी हफ़्ते अदालत ने अलगाववादी गुट यूनाइटेड लिबरेशन फ़्रंट ऑफ़ असम उल्फ़ा के दो नेताओं की ज़मानत मंज़ूर कर ली थी जिसमें उप प्रमुख प्रदीप गोगोई और प्रचार सचिव मिथिंगा दाईमरी शामिल है.
गुरुवार को मिथिंगा दाईमरी को जेल से रिहा कर दिया गया.
अधिकारियों का कहना है कि प्रदीप गोगोई को नहीं छोड़ा गया है क्योंकि अभी तक उनके वकील ने ज़मानत के लिए ज़रूरी औपचारिकताएँ पूरी नहीं की है.
असम सरकार ने टाडा कोर्ड में उल्फ़ा के दोनों नेताओं की ज़मानत का विरोध नहीं किया था.
इसके बाद से अटकलें लगने लगी हैं कि ये भारत सरकार और उल्फ़ा के बीच बातचीत का आधार तैयार करने की कोशिश है.
बातचीत की कोशिश?
असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने कुछ दिन पहले कहा था कि उनकी सरकार बातचीत के लिए मध्यस्थता करेगी.
उन्होंने कहा था कि वैसे तो उल्फ़ा के सैन्य प्रमुख परेश परुआ तब तक भारत के साथ बात नहीं करेंगे जब तक भारत असम की संप्रभुता के मुद्दे पर बात करने को राज़ी न हो लेकिन उल्फ़ा के अन्य नरमपंथी नेता असम को ज़्यादा स्वायत्ता देने पर सहमत हो सकते हैं.
प्रदीप गोगोई को 1998 में कोलकाता में गिरफ़्तार किया गया था और उसके बाद से वे गुवाहाटी जेल में थे. मिथिंगा दाईमरी को भुटान में पकड़ा गया था जब भूटान की सेना ने विशेष अभियान चलाया था. बाद में उन्हें भारत को सौंप दिया गया था.
उल्फ़ा के ज़्यादातर वरिष्ठ नेता अब असम के जेल में बंद हैं जिनमें चेयरमैन अरबिंदा राजखोवा शामिल हैं.
लेकिन परेश परुआ पकड़ से बाहर हैं और उनका इरादा अब भी यही है कि वे अपने चंद साथियों के साथ संघर्ष जारी रखें.
भारतीय ख़ुफ़िया विभाग का कहना है कि उन्हें आख़िरी बार बर्मा के कचिन पहाड़ियों के नज़दीक चीन के एक छोटे से कस्बे में देखा गया था. उल्फ़ा 1979 से ही अलग असम राज्य की माँग करता रहा है. इस दौरान अलगाववादी हिंसा में हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं.
































