औरतें बदलाव ला रही हैं: किश्वर नाहीद

किश्वर नाहीद

बुलंदशहर में 1940 में जन्मीं किश्वर नाहीद बंटवारे के बाद पाकिस्तान चली गईं. लेकिन भारत से उनका रिश्ता घर आंगन सा है.

शायरी में उन्होंने बड़ा मुक़ाम हासिल किया है. आजकल वो "हौवा" नाम की संस्था चला रहीं हैं जो महिलाओ को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाती है.

पेश है उनसे हुई बातचीत के अंश.

बंटवारे के समय आप हिंदुस्तान छोड़कर पाकिस्तान चली गईं थीं. उस वक्त की यादों के बारे में बताएं?

उस समय मैं बहुत छोटी थी. भाइयों के साथ खेलती थी. गुल्ली-डंडा, पंतग उड़ाना. बँटवारे के बाद क़त्ल-ओ-ग़ारत हुई, लड़कियों का बलात्कार किया गया, लड़कियां अग़वा की गईं. आज भी उन सब चीज़ों का अक्स नज़र आता है.

आपने उस ज़माने में तालीम हासिल की जब महिलाओं की पढ़ाई को अहमियत नहीं दी जाती थी. यह सब आपके लिए कितना मुश्किल था?

मेरे नाना उस वक्त बुलंदशहर के मजिस्ट्रेट थे. उन्होंने अम्मा से कहा कि हमारे यहां लड़कियों को पढ़ाने का रिवाज नहीं है, अगर तुम लड़कियों को पढ़ाओगी तो मेरे घर मत आना.

अम्मा ने कहा ठीक है मैं नहीं आऊंगी, लेकिन लड़कियों को पढ़ाऊंगी ज़रूर. अब्बा ने कहा जितने पैसे घर खर्च के देता हूं, उससे एक पैसा ज्यादा नही दूंगा. अम्मा ने कहा आधी रोटी खिलाऊंगी लेकिन लड़कियों को पढ़ाऊंगी.

अम्मा ने सोचा कि लड़कियां मैट्रिक पास करके अपना घर बसाएंगी. लेकिन मैट्रिक पास करने के बाद मैंने शोर मचाया कि मुझे कॉलेज जाना है. फिर मैंने बीए किया, एमए किया और नौकरी की.

शायरी का सफ़र कब शुरू हुआ ?

शायरी तो मैंने कॉलेज के ज़माने में ही शुरू कर दी थी. एक रोज़ अब्बा ने कहा—तुम्हें जितना मशहूर होना था हो चुकी. अब जिससे ग़ज़ल ली है उसे वापस करो और एक शरीफ लड़की की तरह ज़िदगी गुज़ारो. उन्होंने माना ही नहीं कि यह शायरी मैंने की थी.

आप शायरा हैं और अदब से ताल्लुक रखती हैं. लेकिन अदब की दुनिया भी पुरुषों की होती है. वहां आपने जगह कैसे बनाई ?

शुरू में पाबंदियां लगाई गई थीं कि आप इश्क़ का ज़िक्र नहीं करेंगी, आप महिला की आज़ादी की बात नहीं करेंगी. लेकिन मैंने शुरू ही यहां से किया-

घर के धंधे तो निबटते ही नहीं नाहीद

मैं निकलना भी अगर शाम को घर से चाहूं.

धीरे-धीरे शायरात आती गईं क़ाफिला बढ़ता गया. फेहमिदा रियाज़ आईं, सारा शगुफ्ता आईं. और भी बहुत अच्छे नाम हैं जिन्होंने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई.

लेकिन आलोचकों ने कभी इस पर गौर नहीं किया कि एक महिला किस तरह अपनी सोच से समाज को बदल रही है, क्या नई चीज़ पेश कर रही है.

आपकी शायरी महिला की नई तस्वीर पेश करती है. आज के वक्त में आप आधुनिक महिला किसे मानेंगी?

मेरा मानना है कि अगर मर्द को इश्क़ करने का हक़ है तो वह औरत को भी है. लेकिन उसके इज़हार के अंदाज़ अलग हो सकते हैं. जैसे मीरा ने कहा है- मैं तो प्रेम दीवानी—लेकिन मैं यह नहीं कहूंगी. मैं तो कहूंगी-

मैं नज़र आऊं हर सिम्त से, जिधर से जाऊं

मतलब यह कि मेरी मौजूदगी को, मेरे वजूद को मानना चाहिए. बाद में, मैंने जो कुछ कहा वह सभी महिलाओं ने कहा. इसकी ज़रूरत भी थी ताकि औरत का लहजा सामने आए.

हिंदुस्तान और पाकिस्तान के रिश्तों में हमेशा उतार-चढ़ाव आते रहते हैं लेकिन आपका भारत से रिश्ता गहरा बना रहता है?

मेरे अंदर शुरू से यह अहसास था कि चाहे वह घर हो या मुल्क, जंग से कुछ हासिल नहीं होता. हमें जंग नहीं सुलह की बात करनी चाहिए और यही लोग चाहते हैं क्योंकि एटम बम रोटी नहीं खिला देता, ग़रीबी नहीं दूर करता.

लोगों को तालीम देने के लिए एटम बम की नहीं ऐसे समाज की ज़रूरत है जो इंसान को इंसान बनना सिखाए.

आप हमेशा से महिलाओं के अधिकारों के लिए फिक्रमंद रही हैं. उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक संस्था भी बनाई है.

मानवाधिकार संस्थाओं के साथ काम करते समय मैंने पाया कि कामकाज करने वाली महिलाओं का कितना शोषण किया जा रहा है. उनका सारा मुनाफा तो दलाल खा जाते है.

मैंने अपने फंड के पैसे से “हौवा” नामक संस्था बनाई.

मेरी संस्था महिलाओं से हस्तशिल्प का सामान ख़रीदती है. हर महीने की पहली तारीख़ से लेकर सात तारीख़ तक उनके पैसे पहुंचा दिए जाते हैं. इसके अलावा क़ानूनी और आर्थिक मदद भी दी जाती है.

आज महिलाएं हर जगह कामयाबी का परचम लहरा रही हैं. तो क्या यह माना जाए कि महिलाओं ने मुक़ाम पा लिया है?

जो बदलाव शहर की ज़िदगी में नज़र आता है, गांव की ज़िदगी अभी उससे अछूती है. आज भी गांव की महिला मटर तोड़ती, आलू तोड़ती नज़र आती है. हमें उन्हें पढ़ाना है, बहुत कुछ सिखाना है.

आपकी कोई ऐसी नज़्म या गज़ल जो आपके दिल के करीब हो?

दिल के क़रीब का तो कहना मुश्किल है. लेकिन लोग अक्सर नज़्म 'हम गुनाहगार औरतें हैं' सुनना पसंद करते हैं.

हम गुनहगार औरते हैं

जो अहले जिब्बा की हिकमतों से

न रौब खाएं, न जां बेचैं

न सिर झुकाएं, न हाथ जोड़ें

हम गुनहगार औरतें हैं...