क़ैदी पूछें सवाल, पुलिस जवाब देने को मजबूर

सूचना के अधिकार का फ़ायदा उठा रहे हैं क़ैदी
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दिल्ली की तिहाड़ जेल के क़ैदी पुलिस से ख़ूब सवाल पूछ रहे हैं और पुलिस उनके जवाब देने को मज़बूर है.

सूचना के अधिकार कानून ने आम आदमी को सवाल पूछने की एक नई ताक़त दी है. और इस ताक़त का इस्तेमाल देश की सबसे बडी तिहाड़ जेल के क़ैदी भी ख़ूब कर रहे हैं.

इस साल तिहाड़ जेल प्रशासन से क़ैदियों ने 402 सूचनाएँ मागी हैं जो पिछले साल के मुकाबले दोगुनी है.

जेल प्रशासन के सामने आए सवालों में क़ैदियों के अधिकारों से जुड़े तमाम मुद्दे शामिल हैं. क़ैदियों ने पूछा है कि उन्हे किस आधार पर हाई सिक्योरिटी ज़ोन में रखा गया है और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं.

क़ैदी ये भी पूछते है कि उन्हे किस क़ानून के तहत सज़ा हुई है और उनकी सज़ा कब ख़त्म हो रही है.

तिहाड़ जेल के सूचना अधिकारी सुनील गुप्ता कहते हैं." सूचना के अधिकार कानून के तहत जानकारी के लिए अर्ज़ियाँ लगातार बढ़ती जा रही हैं. पिछले साल जहाँ इनकी संख्या दो सौ थी वो इस साल चार सौ के पार जा चुकी हैं."

सूचना के अधिकार के तहत पूछे जाने वाले सवालों पर सुनील गुप्ता कहते हैं " क़ैदी पूछते है कि मुझे कड़ी सुरक्षा क्षेत्र में क्यों रखा गया है, या मुझे साधारण वार्ड मे क्यों रखा या फिर मेरी सुरक्षा के लिए क्या क़दम उठाए गए हैं."

अधिकारी कहते हैं कि सवाल हमेशा गंभीर नहीं होते, कई बार सवाल बेतुके भी होते हैं.

पत्रकार सौम्या विश्ननाथन की हत्या के मामले मे तिहाड़ जेल में बंद रवि कपूर ने जेल प्रशासन से पूछा है कि जेल में जींस की पैंट क्यों नहीं पहनने दी जाती.

अधिकारी कहते हैं कि कुछ क़ैदी पुलिस अधिकारियों पर दबाव बनाने के लिए भी इस क़ानून का ग़लत इस्तेमाल करते हैं.

सुनील गुप्ता कहते हैं " दबाव बनाने के लिए क़ैदी कई बार एक अधिकारी को निशाना बनाकर बहुत ज्यादा सवाल पूछते है. एक बार एक क़ैदी ने एक अधिकारी की संपत्ति का ब्यौरा माँगा और पूछा कि क्या उन्हे कभी निलंबित किया गया है."

सुनील गुप्ता कहते हैं "जब कोई शरीफ़ आदमी को निशाना बनाए तो स्वाभाविक है कि वो डर जाएगा."

ऐसा नहीं है कि तिहाड़ प्रशासन से सवाल सिर्फ क़ैदी ही पूछते हैं. बाहर के लोग भी सूचना के क़ानून के तहत सवाल पूछते हैं. कई बार सवाल पूछा जाता है कि क्या वो तिहाड़ जेल में कभी क़ैदी रहे हैं.

कई लोगों को इस तरह के प्रमाण पत्र की जरुरत पड़ती है पर इस तरह का प्रमाणपत्र हासिल करना आसान नहीं होता. ऐसे में सूचना के अधिकार के तहत माँगी गई जानकारी काफ़ी मददगार होती है क्योंकि इस तरह की जानकारी एक महीने में मिल जाती है.

सुनील गुप्ता स्वीकार करते हैं कि ज्यादातर क़ैदी इस क़ानून का सही इस्तेमाल करते हैं.