बिहार चुनाव का सार्वजनिक रहस्य

- Author, योगेन्द्र यादव
- पदनाम, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए विशेष
खूंखार कैमरों के सामने घायल शेर बैठे थे. स्तब्ध लालू प्रसाद, बुझे-बुझे राम विलास पासवान और जड़वत रामकृपाल यादव.
निराशा से ज़्यादा हैरानी लिखी थी उनके चेहरों पर. लालू प्रसाद यादव ने कहा, परिणाम रहस्यमय है. जांच-पडताल कराएंगे. आखिर बिहार में कोई रहस्य छुपा नहीं रह सकता.
कहा, कोई आरोप नहीं लगा रहा हूं. लेकिन इशारा वही था, हो न हो कहीं कुछ गड़बड़ है.
जनादेश को ‘तथाकथित‘ बताकर उन्होंने इशारा किया कि इस परिणाम के पीछे जनता की इच्छा के अलावा कहीं कुछ रहस्य छुपा है.
इस रहस्य के सूत्र ढूंढने मैं चुनाव के पहले बिहार में घूमा था.
बिहार की हर सड़क पर, हर गांव-टोले में, हर आम वोटर की जुबान पर इन सूत्रों को पाया था.
इन्हीं पन्नों पर उन सूत्रों का खुलासा भी किया था. छह दिन घूमने पर एक भी साधारण वोटर नहीं मिला मुझे जिसने कहा हो कि नीतीश सरकार ने काम नहीं किया.
पटना आकर पत्रकारों से पूछा तो उन्होंने भी माना कि उन्हें भी साधारण वोटर में यही प्रतिक्रिया मिली थी. लेकिन फिर भी न जाने क्यों राजनीति के खिलाड़ी अनाड़ी और लिखाड़ी सब मानकर चल रहे थे कि मुकाबला कांटे का है.
नीतीश जीतेंगे भी तो कांटे की टक्कर रहेगी. पटना से लौटते वक्त मेरे लिए रहस्य यह नहीं था कि बिहार चुनाव में क्या होगा. रहस्य ये था कि सीधा-सपाट सच सबको दिख क्यों नहीं रहा है.
सर्वेक्षण

जब सीएसडीए के चुनाव बाद सर्वेक्षण के आंकडे़ आने लगे तब रहा सहा संदेह भी मिट गया.
सर्वे के निर्देशक संजय कुमार और बिहार संयोजक राजेश रंजन की टीम जबरदस्त है और आंकड़ों में संदेह की गुंजाइश नहीं है.
पहले चरण से ही साफ़ था कि मुकाबला बिल्कुल एकतरफा है. ये चुनावी लहर नहीं, कुछ चुनावी सूनामी जैसा मामला था.
फिर भी सीएनएन-आइबीएन और आइबीएन-7 ने चुनाव पूरा होने के बाद हमारे सर्वे पर आधारित भविष्यवाणी की, तब भी नेता नाराज़ थे और विश्लेषक दंग.
विश्वास करने को कोई तैयार नहीं था. मेरे मन में रहस्य ये था कि चुनाव पूरा होने के बाद की गई भविष्यवाणी पर नेता लोग इतने नाराज़ क्यों होते हैं.
लालू प्रसाद यादव ज़मीन से जुडे हुए नेता हैं. ज़रूर देर-सवेर वे भी इस हकीकत को समझेंगे. लेकिन गुस्ताख़ी न समझा जाए तो मैं चुनाव के इस ‘रहस्य‘ में परिणाम को समझने के कुछ सूत्र पेश कर सकता हूं.
परिणाम समझने के लिए सूत्र

पहला सूत्र तो ये कि सड़क सिर्फ़ गाड़ी वालों को नहीं चाहिए होती. सड़क की ज़रूरत सबसे ज़्यादा उस ग़रीब-गुरबे को होती है, जो अपने बीमार को अस्पताल ले जाने के लिए बसों पर निर्भर करता है...जो सरकार टूटी,खस्ता और बदहाल सड़कों को कामचलाऊ बना देगी, उसे जनता का आशीर्वाद मिलेगा.
आम जनता को इससे मतलब नहीं है कि सड़क का पैसा सरकार की किस जेब से आया.
लोगों ने नीतीश कुमार की सरकार के तहत सड़कों का कायापलट देखा और उन्हें इसका श्रेय दिया.
दूसरा सूत्र ये कि क़ानून और सुरक्षा का सवाल सिर्फ़ सोने के गहनों से लदे अगड़े समाज के लिए ही नहीं होता. गुंडई से हिफ़ाजत उस गरीब मज़दूर को भी चाहिए जिसे बेगार का ख़तरा होता है.
लालू-राबड़ी सरकार के अंतिम समय में जिस किस्म का ‘अंधेर नगरी चौपट राजा‘ वाला दौर था, उसे बिहार की जनता भूली नहीं है.
नीतीश कुमार के समय भले ही कुर्मी और भूमिहार का प्रभाव बढ़ा हो, लेकिन औसत व्यक्ति के दैनिन्दिन जीवन में किसी एक जाति की दबंगई नहीं थी.
नीतीश ने बेशक दबंग नेताओं से समझौता किया, लेकिन आम व्यक्ति की निगाह में नीतीश कुमार के राज और लालू प्रसाद यादव के राज में जमीन आसमान का अंतर था.
जाति-बिरादरी का सवाल नहीं
तीसरा सूत्र ये कि इज़्ज़त का सवाल सिर्फ़ जाति-बिरादरी का सवाल नहीं है. औसत बिहारी के लिए बिहार की इज़्ज़त का सवाल भी महत्वपूर्ण है. लालू प्रसाद यादव ने बिहार में अगडों के सामंती वर्चस्व को तोड़ा, सामाजिक क्रांति की शुरुआत की और असंख्य बेज़ुबानों को ज़ुबान दी.
लेकिन उन्हें जुबान देने के बाद लालू प्रसाद यादव ने अपने कान और आंख दोनों बंद कर कर लिए. पिछड़े, दलित, ग़रीब-गुरबे अपनी इस आवाज़ से जो मांग रहे थे, उसे लालू जी ने अनसुना कर दिया.
सिर उठाने के बाद वे जिस दिशा में देख रहे थे, उसे लालू जी ने अनदेखा कर दिया. इज्जत के साथ-साथ हर आदमी को रोटी चाहिए, रोजगार चाहिए, दैनिन्दिन जीवन की सुविधाएं चाहिए.
अभाव, बदहाली और पिछड़ेपन का रूपक बन गए ‘बिहारी‘ को अपने बिहारीपन में सम्मान भी चाहिए थी.
नीतीश सरकार ने आस बंधाई कि बिहार में स्थिति सुधर सकती है. अगर लालू यादव ने पिछड़ी जातियों को इज्जत दी, तो नीतीश कुमार ने बिहारी का आत्मसम्मान बढाया.
सामाजिक न्याय की राजनीति

चौथा सूत्र ये कि सामाजिक न्याय की राजनीति अब एक नए दौर में पहुंच चुकी है. नब्बे के दशक में लालू प्रसाद यादव ने सामाजिक न्याय आंदोलन के पहले चरण का बचा हुआ काम पूरा किया.
राजनैतिक सत्ता को अगडे समाज से बाहर लाने का यह काम दक्षिण भारत में बीस साल पहले ही पूरा हो चुका था.
उसे उत्तर प्रदेश और बिहार में पूरा करना एक महत्वपूर्ण पडाव था, लेकिन सामाजिक न्याय की राजनीति उस पड़ाव पर बैठी नहीं रह सकती थी.
जल्द ही इस राजनीति में नए सवाल उठने लगे. अति पिछडे और महादलित के सवाल को नीतीश कुमार ने सफलता से उठाया.
इस चुनाव के परिणाम नीतीश कुमार की राजनैतिक रणनीति की सफलता का सबूत देते हैं. इस लिहाज से नीतीश कुमार की विजय सामाजिक न्याय की राजनीति की हार नहीं, बल्कि उसकी पराकाष्ठा है.
लालू यादव ने इस परिवर्तन की बुनियाद रखी थी,लेकिन सुंदर इमारत सिर्फ बुनियाद पर नहीं रुक जाती.
ज़िंदा क़ौमें...

पांचवां सूत्र यह है कि राजनीति में किसी भी समुदाय को बहुत समय तक बंधक बनाकर नहीं रखा जा सकता है.
लालू प्रसाद यादव ने मुसलमानों को सुरक्षा भी दी बेहतर प्रतिनिधित्व भी, लेकिन उसके बाद उन्हें दंगों और संघ का भूत दिखाकर बंधक के रूप में इस्तेमाल करना चाहा.
इस बार इस रणनीति की कलई खुल गई. नीतीश की साख एवं नीतियों के चलते मुस्लिम समाज का एक चौथाई वोट जदयू-भाजपा गठबंधन को पड़ा.
जहां जदयू के उम्मीदवार थे वहां उन्हें राजद से भी ज्यादा मुस्लिम वोट मिला. बिहार में वहीं हुआ जो उत्तरप्रदेश, बंगाल और असम में पहले हो चुका है.
मुस्लिम वोट अपने ठेकेदारों से मुक्त होना चाहता है. पासमांदा समाज नए विकल्पों की तलाश में सबसे आगे है. जो इस हक़ीक़त को नज़रअंदाज करेगा वह मुंह की खाएगा.
ये सब सूत्र कोई छुपे हुए नहीं हैं, बिहारी समाज में छितराए हुए हैं.
बिहारी जनमानस पर इसकी इबारत साफ़-साफ़ पढ़ी जा सकती है. उम्मीद करनी चाहिए कि लालू प्रसाद यादव जैसे अनूठे और जड़ से जुड़े राजनेता को ये रहस्य ढूंढने में वक्त नहीं लगेगा.
अगर वे चाहें तो अपने वैचारिक गुरु राममनोहर लोहिया को याद कर सकते हैं. अगर लोहिया की उक्ति को संशोधित करने की इजाजत हो तो कहा जा सकता है, ज़िंदा कौमें अनंत काल तक इंतजार नहीं करतीं.
(लेखक सीएसडीएस में सीनियर फेलो और जाने-माने चुनाव विश्लेषक हैं)
































