माओवादियों के गढ़ में-विशेष पेशकश
क्यों है लोगों में ग़ुस्सा?
पिछले तीन दशक से भी ज़्यादा समय से दक्षिण बिहार और झारखंड के देहाती इलाक़े असंतोष में खदबदा रहे हैं.
गया, औरंगाबाद, कैमूर, पलामू आदि ज़िलों में पहले माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर और फिर माओवादी पार्टी हथियारबंद संघर्ष चला रही है.
ये आंदोलन कभी धीमा पड़ जाता है तो फिर रह रह कर भड़क उठता है.
हमारे संवाददाता राजेश जोशी ने बिहार चुनावों के बाद माओवादी हथियारबंद छापामारों के साथ इन इलाक़ों की यात्रा की और पता लगाने की कोशिश की कि इन गाँवों के लोग क्यों क्रोधित हैं.
गांवों से राजसत्ता ग़ायब
पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी के हथियारबंद छापामार रात रात मीलों चलकर एक गाँव से दूसरे गाँव पहुँचते हैं.
इन गाँवों में राजसत्ता ग़ायब है. पुलिस और सुरक्षाबल यहाँ क़दम रखने से पहले कई बार सोचते हैं.
ज़्यादातर गाँवों में महादलित समुदाय के लोग रहते हैं. ये लोग कहते हैं कि यहाँ पहले ज़मींदारों की चलती थी.
लेकिन फिर माओवादी आए और ज़मींदार इलाक़ा छोड़कर चले गए.
नौजवानों में रोष
माओवादी प्रभाव वाले ज़्यादातर गाँवों में न सड़क है न पानी, न बिजली, न स्कूल और न ही अस्पताल.
कचनार जैसे गाँव में रात के अँधेरे में माओवादी छापामारों से मिलने के लिए लगभग पूरा गाँव आ जुटता है.
इस गाँव के नौजवान कहते हैं कि सरकार और देश ने उन्हें कभी नहीं पूछा.
इसीलिए वो कहते हैं कि अगर पुलिस वाले डुमरिया थाने से निकलेंगे ही तो उन्हें उड़ा दिया जाएगा.
चुनाव का बहिष्कार
माओवादियों का समर्थन करने वाले गाँव के लोग बताते हैं कि पुलिस कैंप पर हमला करने में वो सब शामिल होते हैं.
वो कहते हैं कि इन विधानसभा चुनावों में उन्होंने चुनाव का बहिष्कार किया क्योंकि सरकार न पानी देती है, न बिजली देती है, न स्कूल, न अस्पताल...
तो वोट क्यों दिया जाए?
नक्सलियों का गांव
ढकपहरी गाँव औरंगाबाद का ऐसा गाँव है जिसे कचनार की तरह ही पुलिस और सरकारी विभाग में नक्सलियों का गाँव माना जाता है.
गाँव वाले बताते हैं कि तीस साल पहले पहली बार यहाँ जब माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर के लोग यहाँ आए थे तो उन्हें मुँडकटवा कहा जाता था.
उन्होंने गाँव के दलित समाज के लोगों को ज़मींदारों के ख़िलाफ़ हथियारबंद लड़ाई के लिए संगठित किया.
क्यों उठाते हैं हथियार?
माओवादी छापामार पुलिस गश्ती दल पर हमला करके उनसे हथियार छीनते हैं और फिर इन हथियारों को पुलिस और सुरक्षा बलों पर हमला करते हैं.
इन दस्तों में शामिल ज़्यादातर नौजवान बेहद ग़रीब भूमिहीन परिवार से आते हैं और उनकी शिक्षा तीसरी या चौथी कक्षा से ज़्यादा नहीं हुई है.
कुछ नौजवान इसलिए छापामार बन गए क्योंकि वो कहते हैं कि उनके माता पिता को पुलिस ने मार डाला था.
माओवादियों का बाल दस्ता
माओवादी पार्टी की 'पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी' में आम छापामार की औसत उम्र 24 से 25 वर्ष से ज़्यादा नहीं है.
लेकिन दस्ते में कुछ कम उम्र के बच्चे भी शामिल हैं.
गया ज़िले के दूर दराज़ गाँवों में मेरी मुलाक़ात 12 साल के राजूबाबू से हुई जो पिछले दो वर्षों से माओवादी दस्ते के साथ है.
ये बच्चा समाज में तिरस्कृत परिवार से संबंध रखता है.
माओवादी नेताओं का कहना है कि 'बाल दस्ता' के छापामारों को बंदूक़ नहीं दी जाती है.
































