सहायता पहुंची लेकिन पुलिस, प्रशासन में ठनी

तारमेटला

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, रायपुर

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में सुरक्षा बलों के जवानों द्वारा कथित दुर्व्यवहार किए जाने और आदिवासियों के लगभग तीन सौ घर जलाने के बाद शुक्रवार को काफी मशक्क़त के बाद प्रशासन पीड़ित परिवारों को मुआवजा और राहत सामग्री पहुंचाने में कामयाब रहा.

सुरक्षा बलों पर आरोप है कि 14 मार्च को उन्होंने चिंतलनार के इलाके में कुछ गाँव में जमकर उत्पात मचाया. आरोप हैं कि इस क्रम में जवानों नें आदिवासियों के 300 घरों को जलाया, महिलाओं के साथ दुर्वव्हार किया और कुछ ग्रामीणों की हत्या भी कर दी है.

शनिवार को नक्लसवादियों ने सुरक्षाबलों द्वारा घरों को जलाने और लोगों की कथित हत्या करने की कड़ी आलोचना की है.

कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (माओवादी) की पूर्वी बस्तर क्षेत्रीय समिति की प्रवक्ता नीति ने बीबीसी को एक बयान में बताया, “13 से 15 अप्रैल के बीच विरोध जताएंगे और उसके बाद 16 और 17 अप्रैल को दंडकारण्य बंद करेंगे.”

माओवादी प्रवक्ता ने कहा कि उनकी पार्टी सुरक्षाबलों के जवानों की आगाह करती है कि वे भविष्य इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने से बाज आएं वरना उन्हें जनता और माओवादियों की प्रतिरोधी कार्रवाईओं में भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी.

इसबीच प्रभावित गांवों के दौरे पर जा रहे सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश को सलवा जुडु़म ने रोक दिया है.

पुलिस और प्रशासन में मतभेद

इससे पहले गुरुवार को राहत ले जा रहे बस्तर संभाग के आयुक्त और दंतेवाड़ा के कलेक्टर को पुलिस के विरोध के बाद वापस लौटना पड़ा था.

इस पहल के बाद पुलिस और प्रशासन खुले तौर पर दो फाड़ नज़र आ रहे हैं. वहीं इन दोनों सरकारी महकमों के बीच जा फंसे हैं पत्रकार जिनके ख़िलाफ़ पुलिस नें मामला भी दर्ज किया है.

हालाकि पुलिस के अधिकारी घटना से इनकार करते हुए यह कह रहे हैं कि यह सिर्फ माओवादियों का प्रचार है. मगर दंतेवाड़ा के कलक्टर नें मामले की जांच के लिए एक दल का गठन किया है. कलक्टर की इस पहल से पुलिस के खासी नाराजगी देखि जा रही है.

शायद यही कारण रहा कि पहले तो पुलिस नें आयुक्त और कलक्टर को राहत सामग्री लेकर जाने से रोका और बाद में पुलिस नें अपना गुस्सा पत्रकारों पर भी निकाला.

दंतेवाड़ा के कुछ पत्रकारों पर पुलिस नें एक मामला भी थाने में दर्ज किया है.

पत्रकारों पर मामला दर्ज

मामला क्या है मैंने पूछा कलेक्टर द्वारा गठित किये गए जांच दल के सदस्य और दंतेवाड़ा से प्रकाशित अखबार बस्तर इम्पेक्ट के सम्पादक सुरेश महापात्रा से.

उन्होंने कहा, "एक गाड़ी में सवार पत्रकार घटनास्थल की तरफ जा रहे थे कि तभी एक ट्रक नें धक्का मार दिया जिससे उनके वाहन को काफी नुकसान हुआ. फिर किसी तरह वह घटनास्थल पर पहुंचे. मगर लौटने वक्त पुलिस की लगभग हर चेकपोस्ट पर उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश की गई. पत्रकारों को कहा गया है कि उनके खिलाफ ट्रक के चालाक ने मामला दर्ज किया है. पत्रकार सीधे कलेक्टर के यहाँ पहुंचे. पुलिस नें कलेक्टर के आवास परिसर से आकर वाहन को ज़प्त किया."

सुरेश महापात्रा कहते हैं कि जिस वाहन से पत्रकार घटना स्थल पर जा रहे थे दर-अ-सल वह सरकारी वाहन ही था जो जिला प्रशासन नें पत्रकारों को उपलब्ध कराया था.

उनका कहना है कि इसके बाद कलेक्टर ने मुख्यमंत्री और राज्य के आला अधिकारियों से विमर्श किया जिसके बाद सरकारी वाहन को तो छोड़ दिया गया मगर पत्रकारों पर मामला बरकरार है.

इस मामले को लेकर शुक्रवार को छत्तीसगढ़ विधानसभा में विपक्ष ने सरकार को घेरा और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाही की मांग की. कांग्रेस के विधायक कुलदीप जुनेजा कहते हैं कि बस्तर में हालात गंभीर बने हुए हैं.

'हालात गंभीर'

नारायणपुर में आग में तबाह एक गांव

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इमेज कैप्शन, पुलिस पर पिछले वर्ष नारायणपुर में भी घरों को जलाने के आरोप लगे थे.

ऐसी ख़बरें हैं कि राहत का सामन ले जा रहे वाहनों को विशेष पुलिस अधिकारियों के एक दल ने रोका और ड्राइवरों और वाहन के मालिकों के साथ मार पीट भी की.

राहत ले जा रहे एक ऐसे ही वाहन के मालिक कपूर चांद राजपूत का कहना है कि उनके साथ विशेष पुलिस अधिकारियों नें मार पीट भी की.

पूछे जाने पर बस्तर संभाग के आयुक्त के श्रीनिवासुलु का कहना था, "हम नहीं चाहते कि इस मामले को लेकर प्रशासन और पुलिस आपस में भिडें. हमारी प्राथमिकता है कि उन लोगों तक फ़ौरन राहत पहुंचे. वैसे भी इस इलाके में पुलिस और माओवादियों के बीच फंसकर आम आदमी नें काफी मुश्किलों को झेला है. हम चाहते हैं कि जिनके घर उजड़े हैं उनका पुनर्वास हो."

वही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना था कि घटना जैसे भी घटी हो मगर पीड़ित परिवारों को फ़ौरन राहत और मुआवजा मिलेगा

हालांकि मुख्यमंत्री जांच की बात कर रहे हैं मगर चिंतलनार की घटना के बाद जिस तरह कमिश्नर और कलक्टर को राहत ले जाने से रोका गया और जिस तरह पर्ताकारों के खिलाफ मामला डर किया गया उस से इतना तो समझ में आता है कि बस्तर संभाग के इस इलाके में हालत प्रशासन के हाथ से भी बेकाबू होते नज़र आ रहे हैं.