रामलीला मैदान: जिन्ना से अन्ना तक

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- Author, मोहन लाल शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
यूँ तो दिल्ली का रामलीला मैदान हर साल उस समय चर्चा में आता है जब दशहरे के मौके पर रामलीला का मंचन होता है और उसके बाद रावणदहन होता है.
अजमेरी गेट और तुर्कमान गेट के बीच 10 एकड़ क्षेत्रफल में फैले इस रामलीला मैदान में एक लाख लोग खड़े हो सकते हैं पर पुलिस के मुताबिक यहाँ सिर्फ़ 25 से 30 हज़ार लोगों की क्षमता है.
कहा जाता है कि इस मैदान को अंग्रेज़ो ने 1883 में ब्रिटिश सैनिकों के शिविर के लिए तैयार करवाया था.
समय के साथ-साथ पुरानी दिल्ली के कई संगठनों ने इस मैदान में रामलीलाओं का आयोजन करना शुरु कर दिया,फलस्वरुप इसकी पहचान रामलीला मैदान के रूप में हो गई.
दिल्ली के दिल में इससे बड़ी खुली जगह और कोई नही थी इसलिए रैली जैसे बड़े आयोजनों और आम जनता से सीधे संवाद के लिए ये मैदान राजनेताओं का पंसदीदा मैंदान बन गया.
गु़लाम भारत और आज़ाद भारत के इतिहास में ऐसे मौकों की कोई कमी नही है जब रामलीला मैदान ने अपना नाम दर्ज न कराया हों.
इतिहास बदलने का गवाह

ये रामलीला मैदान देश के इतिहास के बदलने का गवाह रहा है.
आज़ादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल और दूसरे नेताओं के लिए विरोध जताने का ये सबसे पसंदीदा मैदान बन गया था.
इसी मैदान पर मोहम्मद अली जिन्ना से जवाहर लाल नेहरू तक और बाबा राम देव से लेकर अन्ना हज़ार तक सारे लोग इसी मैदान से क्रांति की शुरुआत करते रहे हैं.
कहा तो ये भी जाता है कि यही वो मैदान है जहां 1945 में हुई एक रैली में भीड़ ने जिन्ना को मौलाना की उपाधि दे दी थी. लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना ने मौलाना की इस उपाधि पर भीड़ से नाराज़गी जताई और कहा कि वो राजनीतिक नेता है न कि धार्मिक मौलाना.
इस मैदान का इस्तेमाल सरकारी रैलियों और सत्ता के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने जैसी दोनो ही परिस्थितियों में किया गया.
दिसंबर 1952 में रामलीला मैदान में जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को लेकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सत्याग्रह किया था. इससे सरकार हिल गई थी. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1956 और 57 में मैदान में विशाल जनसभाए की.

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28 जनवरी, 1961 को ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ ने रामलीला मैदान में ही एक बड़ी जनसभा को संबोधित किया था.
26 जनवरी, 1963 में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की उपस्थिति में लता मंगेश्कर ने एक कार्यक्रम पेश किया.
1965 में पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इसी मैदान पर एक विशाल जनसभा में जय जवान, जय किसान का नारा एक बार फिर दोहराया था.
1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बांग्ला देश के निर्माण और पाकिस्तान से युद्ध जीतने का जश्न मनाने के लिए इसी मैदान में एक बड़ी रैली की थी और जहां उन्हें जनता का भारी समर्थन मिला था.
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है
25 जून 1975 को इसी मैदान पर लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने विपक्षी नेताओं के साथ ये ऐलान कर दिया था कि इंदिरा गांधी की तानाशाही सरकार को उखाड़ फेंका जाए.
ओजस्वी कवि रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध पंक्तिंया "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है नारा" यहाँ गूँजा और उसके बाद विराट रैली से डरी सहमी इंदिरा गांधी सरकार ने 25 -26 जून 1975 की दरमयानी रात को आपातकाल का ऐलान कर दिया था.

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फरवरी 1977 में विपक्षी पार्टियों ने एक बार फिर इसी मैदान को अपनी आवाज़ जनता तक पहुंचाने के लिए फिर से चुना.
जनता पार्टी के बैनर तले बाबू जगजीवन राम के नेतृत्व में कांग्रेस छोड़कर आए मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह और चंद्रशेखर के साथ भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन रूप जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी इसी मैदान के मंच पर एक साथ नज़र आए.
80 और 90 के दशक के दौरान विरोध प्रदर्शनों की जगह बोट क्लब बन गई थी लेकिन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के कार्यकाल के दौरान बोट क्लब पर प्रदर्शन पर रोक की वजह से इसी मैदान को भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर आंदोलन के शंखनाद के लिए चुना.
यहां पर कांग्रेस, भाजपा सहित अन्य दलों, संगठनों व धार्मिक संगठनों के कई एतिहासिक कार्यक्रम होते रहे हैं.
ये वो ही रामलीला मैदान है जहां बाबा रामदेव ने काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना अनशन किया था लेकिन 5 जून 2011 उनके अनशन पर दिल्ली पुलिस ने लाठियां बरसा कर उन्हें वहां से हरिद्वार भेज दिया था. और अब बारी अन्ना के ऐतिहासिक आंदोलन की है.












